सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० सर्वार्थसिद्धौ [ ४।२७ § ४९४ -
§ ४९४. आह, जीवस्यौदयिकेषु भावेषु तिर्यग्योनिगतिरौदयिकीत्युक्तं, पुनश्च स्थितौ
'तिर्यग्योनिजानां च' इति । तत्र न ज्ञायते के तिर्यग्योनयः । इत्यत्रोच्यते-
औपपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः ॥२७॥
§ ४९५. औपपादिका उक्ता देवनारकाः । मनुष्याश्च निर्दिष्टाः 'प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः'
५ इति । एभ्योऽन्ये संसारिणो जीवाः शेषास्ते' तिर्यग्योनयो वेदितव्याः । तेषां तिरश्चां देवादीनामिव
क्षेत्रविभागः पुनर्निर्देष्टव्यः । सर्वलोकव्यापित्वात्तेषां क्षेत्रविभागो नोक्तः ।
§ ४९६. आह, स्थितिरुक्ता नारकाणां मनुष्याणां तिरश्चां च । देवानां नोक्ता । तस्यां
वक्तव्यायामादावुद्दिष्टानां भवनवासिनां स्थितिप्रतिपादनार्थमाह-
स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिता ॥२८॥
१० § ४९७. असुरादीनां सागरोपमादिभिर्यथाक्रममत्राभिसंबन्धो वेदितव्यः । इयं स्थितिरुत्कृष्टा।
जघन्याप्युत्तरत्र वक्ष्यते । तद्यथा असुराणां सागरोपमा स्थितिः । नागानां त्रिपल्योपमानि२ स्थितिः ।
सुपर्णानामर्द्धतृतीयानि । द्वीपानां द्वे । शेषाणां षण्णामध्यर्द्धपल्योपमम् ।
तीन भव हो जाते हैं । इसलिए मनुष्य भवकी अपेक्षा द्विचचरमपना नहीं ठहरता ? इसका समाधान
यह है कि विजयादिकसे तो दो बार ही मनुष्य जन्म लेना पड़ता है, इसलिए पूर्वोक्त कथन बन
१५ जाता है। ऐसा जीव यद्यपि मध्यमें एक बार अन्य कल्पमें हो आया है, पर सूत्रकारने यहाँ उसकी
विवक्षा नहीं की है । उनकी दृष्टि यही बतलानेकी रही है कि विजयादिकसे अधिकसे अधिक
कितनी बार मनुष्य होकर जीव मोक्ष जाता है।
§ ४९४. जीवके औदयिक भावोंको बतलाते हुए तिर्यंचगति औदयिकी कही है। पुनः
स्थितिका कथन करते समय 'तिर्यग्योनिजानां च' यह सूत्र कहा है। पर यह न जान सके कि
२० तिर्यंच कौन हैं इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं-
उपपाद जन्मवाले और मनुष्योंके सिवा शेष सब जीव तिर्यंचयोनिवाले हैं ॥२७॥
§ ४९५. औपपादिक देव और नारकी हैं यह पहले कह आये । 'प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः'
इसका व्याख्यान करते समय मनुष्योंका भी कथन कर आये । इनसे अन्य जितने संसारी जीव हैं
उनका यहाँ शेष पदके द्वारा ग्रहण किया है। वे सब तिर्यंच जानना चाहिए। शंका - जिस प्रकार
२५ देवादिकका पृथक्-पृथक् क्षेत्र बतलाया है उसी प्रकार इनका क्षेत्र बतलाना चाहिए ? समाधान -
तिर्यंच सब लोकमें रहते हैं अतः उनका अलगसे क्षेत्र नहीं कहा ।
§ ४९६. नारकी, मनुष्य और तिर्यंचोंकी स्थिति पहले कही जा चुकी है। परन्तु अभी तक
देवोंकी स्थिति नहीं कही है। अतः उसका कथन करते हुए सर्वप्रथम प्रारम्भमें कहे गये भवन-
वासियोंकी स्थितिका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
३० असुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार और शेष भवनवासियोंकी उत्कृष्ट स्थिति
क्रमसे एक सागर, तीन पल्य, ढाई पल्य, दो पल्य और डेढ़ पल्य प्रमाण है ॥२८॥
§ ४९७. यहाँ सागरोपम आदि शब्दोंके साथ असुरकुमार आदि शब्दोंका क्रमसे सम्बन्ध
जान लेना चाहिए । यह उत्कृष्ट स्थिति है । जघन्य स्थिति भी आगे कहेंगे। वह उत्कृष्ट स्थिति
इस प्रकार है-असुरोंकी स्थिति एक सागर है । सागरोंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य है। सुपर्णोंकी
३५ उत्कृष्ट स्थिति ढाई पल्य है। द्वीपोंकी उत्कृष्ट स्थिति दो पल्य है। और शेष छह कुमारोंकी उत्कृष्ट
स्थिति डेढ़ पल्य है।
१. शेषास्तिर्य-मु०, दि० २ । २. -पमा स्थितिः मु० ।
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