सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ४।३५ § ५१० ] चतुर्थोऽध्यायः १९३
§ ५०६. निर्दिष्टोत्कृष्टस्थितिकेषु देवेषु जघन्यस्थितिप्रतिपादनार्थमाह—
अपरा पल्योपममधिकम् ॥३३॥
§ ५०७. पल्योपमं व्याख्यातम् । अपरा जघन्या१ स्थितिः । पल्योपमं साधिकम् । केषाम् ।
सौधर्मेशानीयानाम् । कथं गम्यते । 'परतः परतः' इत्युत्तरत्र वक्ष्यमाणत्वात् ।
§ ५०८. तत ऊर्ध्वं जघन्यस्थितिप्रतिपादनार्थमाह—
परतः परतः पूर्वापूर्वानन्तरा ॥३४॥
§ ५०९. परस्मिन्देशे परतः । वीप्सायां द्वित्वम् । 'पूर्व'शब्दस्यापि । 'अधिक'ग्रहणमनुवर्तते ।
तेनैवमभिसंबन्धः क्रियते—सौधर्मेशानयोद्वे सागरोपमे साधिके उक्ते, ते साधिके सानत्कुमारमाहेन्द्र-
योर्जघन्या स्थितिः । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः परा स्थितिः सप्तसागरोपमाणि साधिकानि, २तानि
साधिकानि ब्रह्मब्रह्मोत्तरयोर्जघन्या स्थितिरित्यादि ।
§ ५१०. नारकाणामुत्कृष्टा स्थितिरुक्ता । जघन्यां सूत्रेऽनुपात्तामप्रकृतामपि लघुनोपायेन
प्रतिपादयितुमिच्छन्नाह—
नारकाणां च द्वितीयादिषु ॥३५॥
§ ५०६. जिनमें उत्कृष्ट स्थिति कह आये हैं उनमें जघन्य स्थिति का कथन करने के लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
सौधर्म और ऐशान कल्पमें जघन्य स्थिति साधिक एक पल्य है ॥३३॥
§ ५०७. पल्योपमका व्याख्यान कर आये । यहाँ 'अपरा' पदसे जघन्य स्थिति ली गयी है ।
जो साधिक एक पल्य है । शंका—यह जघन्य स्थिति किनकी है । समाधान—सौधर्म और ऐशान
कल्पके देवोंकी । शंका—कैसे जाना जाता है ? समाधान—जो पूर्व-पूर्व देवों की उत्कृष्ट स्थिति है
वह अगले-अगले देवों की जघन्य स्थिति है यह आगे कहनेवाले हैं इससे जाना जाता कि यह
सौधर्म और ऐशान कल्पके देवों की जघन्य स्थिति है ।
§ ५०८. अब सौधर्म और ऐशान कल्पसे आगेके देवोंकी जघन्य स्थितिका प्रतिपादन करनेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आगे-आगे पूर्व-पूर्वकी उत्कृष्ट स्थिति अनन्तर-अनन्तरकी जघन्य स्थिति है ॥३४॥
§ ५०९. यहाँ 'परतः' पदका अर्थ 'पर स्थानमें' लिया गया है । तथा द्वित्व वीप्सा रूप
अर्थमें आया है । इसी प्रकार 'पूर्व' शब्द को भी वीप्सा अर्थमें द्वित्व किया है । अधिक पदकी यहाँ
अनुवृत्ति होती है । इसलिए इस प्रकार सम्बन्ध करना चाहिए कि सौधर्म और ऐशान कल्पमें जो
साधिक दो सागर उत्कृष्ट स्थिति कही है उसमें एक समय मिला देने पर सानत्कुमार और माहेन्द्र-
कल्पमें जघन्य स्थिति होती है । सानत्कुमार और माहेन्द्रमें जो साधिक सात सागर उत्कृष्ट स्थिति
कही है उसमें एक समय मिला देने पर ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर में जघन्य स्थिति होती है इत्यादि ।
§ ५१०. नारकियोंकी उत्कृष्ट स्थिति कह आये हैं पर सूत्र-द्वारा अभी जघन्य स्थिति नहीं
कही है । यद्यपि उसका प्रकरण नहीं है तो भी यहाँ उसका थोड़ेमें कथन हो सकता है इस इच्छासे
आचार्यने आगेका सूत्र कहा है—
दूसरी आदि भूमियोंमें नारकोंकी पूर्व-पूर्वकी उत्कृष्ट स्थिति ही अनन्तर-अनन्तरकी जघन्य
स्थिति है ॥३५॥
१. जघन्यस्थितिः मु० । २. तानि ब्रह्म-मु०, ता० ।
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CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri