सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७८ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।९ § ४५८ -
§ ४५८. अथोत्तरेषां किंप्रकारं सुखमित्युक्ते तन्निश्चयार्थमाह—
परेऽप्रवीचाराः ॥६॥
§ ४५९. 'पर'ग्रहणमितराशेषसंग्रहार्थम् । 'अप्रवीचार'ग्रहणं परमसुखप्रतिपत्त्यर्थम् ।
प्रवीचारो हि वेदनाप्रतिकारः । तदभावे तेषां परमसुखमनावरतं भवति ।
§ ४६०. उक्ता ये आदिनिकायदेवा दशविकल्पा इति तेषां सामान्यविशेषसंज्ञाविज्ञापनार्थ-
मिदमुच्यते—
भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोदधिद्वीप दिक्कुमाराः ॥१०॥
§ ४६१. भवनेषु वसन्तीत्येवंशीला भवनवासिनः । आदिनिकायस्येयं सामान्यसंज्ञा ।
असुरादयो विशेषसंज्ञा विशिष्टनामकर्मोदयापादितवृत्तयः सर्वेषां देवानामनवस्थितवयःस्वभावत्वेऽपि
वेषभूषायुधयानवाहनक्रीडनादिकुमारवद्वेषामाभासत इति भवनवासिषु कुमारव्यपदेशो रूढः । स
प्रत्येकं परिसमाप्यते असुरकुमारा इत्येवमादि । क्व तेषां भवनानीति चेत् । उच्यते—रत्नप्रभायाः
पङ्कबहुलभागेऽसुरकुमाराणां भवनानि । खरपृथिवीभागे उपर्यधश्च एकैकयोजनसहस्रं वर्जयित्वा
शेषनवानां कुमाराणामावासाः ।
§ ४६२. द्वितीय निकायस्य सामान्यविशेषसंज्ञावधारणार्थमाह—
संगीत, कोमल हास्य, ललित कथा और भूषणोंके कोमल शब्दोंके सुननेमात्रसे ही परम प्रीतिको
प्राप्त होते हैं। तथा आनत, प्राणत, आरण और अच्युत कल्पके देव अपनी अंगनाका मनमें संकल्प
करनेमात्रसे ही परम सुखको प्राप्त होते हैं ।
§ ४५८. अब आगेके देवोंका किस प्रकारका सुख है ऐसा प्रश्न करनेपर उसका निश्चय
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बाकीके सब देव विषय-सुख से रहित होते हैं ॥९॥
§ ४५९. शेष सब देवोंका संग्रह करनेके लिए सूत्रमें 'पर' शब्दका ग्रहण किया है। परम
सुखका ज्ञान करानेके लिए अप्रवीचार पदका ग्रहण किया है। प्रवीचार वेद