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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 558 में से

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पृष्ठ 301

अग्न्याभसूर्याभाः । आदित्यस्य च वह्नेश्चान्तरे चन्द्राभसत्याभाः । वह््न्यरुणान्तराले श्रेयस्करक्षेमं-
कराः । अरुणगर्दतोयान्तराले वृषभैष्टकामचाराः । गर्दतोयतुषितमध्ये निर्माणरजोदिगन्तरक्षिताः ।
तुषिताव्याबाधमध्ये आत्मरक्षितसर्वरक्षिताः । अव्याबाधारिष्टान्तराले मरुद्वसवः । अरिष्टसार-
स्वतान्तराले अश्वविश्ववाः । सर्वे एते स्वतन्त्राः, हीनाधिकत्वाभावात्, विषयरतिविरहाद्देवर्षयः,
इतरेषां देवानामर्र्चनीयाः, चतुर्दशपूर्वधराः तीर्थकरनिष्क्रमणप्रतिबोधनपरा वेदितव्याः। ५
§ ४९२. आह, उक्ता लौकान्तिकास्ततश्च्युता एकं गर्भवासमवाप्य निर्वा्स्यन्तीत्युक्ताः ।
किमेवमन्येष्वपि निर्वाणप्राप्तिकालविभागो विद्यते । इत्यत आह—
विजयादिषु द्विचरमाः ॥२६॥
§ ४९३. 'आदि'शब्दः प्रकारार्थे वर्तते, तेन विजयवैजयन्तजयन्तापराजितानुदिशविमाना-
नामिष्टानां ग्रहणं सिद्धं भवति । कः पुनरत्र प्रकारः । अहमिन्द्रत्वे सति सम्यग्दृष्ट्युपपादः । १०
सर्वार्थसिद्धिप्रसङ्ग इति चेत् । न; तेषां, परमोत्कृष्टत्वात्, अन्वर्थसंज्ञात एकचरमत्वसिद्धेः । चरमत्वं
देहस्य मनुष्यभवापेक्षया । द्वौ चरमौ देहौ येषां ते द्विचरमाः । विजयादिभ्यश्च्युता अप्रतिपतित-
सम्यक्त्वा मनुष्येषूत्पद्य संयममाराध्य पुनर्विजयादिषूत्पद्य ततश्च्युताः पुनर्मनुष्यभवमवाप्य सिद्ध्य-
न्तीति द्विचरमदेहत्वम् ।
सूत्रमें 'च' शब्द है उससे इनके मध्यमें दो दो देवगण और हैं इसका समुच्चय होता है । यथा— १५
सारस्वत और आदित्यके मध्यमें अग्न्याभ और सूर्याभ हैं। आदित्य और वह्निके मध्यमें चन्द्राभ
और सत्याभ हैं। वह्नि और अरुणके मध्यमें श्रेयस्कर और क्षेमंकर हैं। अरुण और गर्दतोयके
मध्यमें वृषभैष्ट और कामचार हैं। गर्दतोय और तुषितके मध्यमें निर्माणरजस् और दिगन्तरक्षित
हैं। तुषित और अव्याबाधके मध्यमें आत्मरक्षित और सर्वरक्षित हैं। अव्याबाध और अरिष्टके
मध्यमें मरुत् और वसु हैं। अरिष्ट और सारस्वतके मध्यमें अश्व और विश्व हैं। ये सब देव स्वतन्त्र २०
हैं, क्योंकि इनमें हीनाधिकता नहीं पायी जाती । विषय-रतिसे रहित होनेके कारण देवऋषि हैं।
दूसरे देव इनकी अर्चा करते हैं। चौदह पूर्वोंके ज्ञाता हैं और वैराग्य कल्याणकके समय तीर्थंकरको
संबोधन करनेमें तत्पर हैं।
§ ४९२. लौकान्तिक देवोंका कथन किया और वहाँसे च्युत होकर तथा एक गर्भको धारण
करके निर्वाणको प्राप्त होंगे यह भी कहा। क्या इसी प्रकार अन्य देवोंमें भी निर्वाणको प्राप्त होनेके २५
कालमें भेद है ? अब इसी बातका ज्ञान कराने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विजयादिकमें दो चरमवाले देव होते हैं ॥२६॥
§ ४९३. यहाँ आदि शब्द प्रकारवाची है। इससे विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और
नौ अनुदिशोंका ग्रहण सिद्ध हो जाता है। शंका—यहाँ कौन-सा प्रकार लिया है ? समाधान—
अहमिन्द्र होते हुए सम्यग्दृष्टियोंका उत्पन्न होना, यह प्रकार यहाँ लिया गया है। शंका—इससे ३०
सर्वार्थसिद्धिका भी ग्रहण प्राप्त होता है ? समाधान—नहीं, क्योंकि वे परम उत्कृष्ट हैं। उनका
सर्वार्थसिद्धि यह सार्थक नाम है इसलिए वे एक भवावतारी होते हैं। देहका चरमपना मनुष्य भवकी
अपेक्षा लिया है। जिसके दो चरम भव होते हैं वे द्विचरम कहलाते हैं। जो विजयादिकसे च्युत
होकर और सम्यक्त्वको न छोड़कर मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं और संयमकी आराधना कर पुनः
मनुष्य भवको प्राप्त करके सिद्ध होते हैं। इस प्रकार यहाँ मनुष्य भवकी अपेक्षा द्विचरमपना है। ३५
विशेषार्थ—कोई-कोई विजयादिकके देव मनुष्य होते हैं। अनन्तर सौधर्म और ईशान कल्पमें
देव होते हैं। अनन्तर मनुष्य होते हैं। फिर विजयादिकमें देव होते हैं और अन्तमें वहाँसे च्युत
होकर मनुष्य होते हैं। तब कहीं मोक्ष जाते हैं। इस प्रकार इस विधिसे विचार करनेपर मनुष्यके