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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 558 में से

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पृष्ठ 294

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१८२ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।१६ § ४७२ –
परिणामो भवति । ननु च नृलोके 'नित्यगति'वचनादन्यत्रावस्थानं ज्योतिष्काणां सिद्धम् । अतो
बहिरवस्थिता इति वचनमनर्थकमिति । तन्न; किं कारणम् । नृलोकादन्यत्र^१ हि ज्योतिषामस्तित्व-
मवस्थानं चासिद्धम् । अतस्तदुभयसिद्धयर्थं बहिरवस्थिता इत्युच्यते । विपरीतगतिनिवृत्त्यर्थं
कादाचित्कगतिनिवृत्त्यर्थं च सूत्रमारब्धम् ।
५ § ४७२. तुरीयस्य निकायस्य सामान्यसंज्ञासंकीर्तनार्थमाह—
वैमानिकाः ॥१६॥
§ ४७३. 'वैमानिक'ग्रहणमधिकारार्थम् । इत उत्तरं ये वक्ष्यन्ते तेषां वैमानिकसंप्रत्ययो
यथा स्यादिति अधिकारः क्रियते । विशेषेणात्मस्थान् सुकृतिनो मानयन्तीति विमानानि । विमानेषु
भवा वैमानिकाः । तानि विमानानि^२ त्रिविधानि–इन्द्रकश्रेणीपुष्पप्रकीर्णकभेदेन । तत्र इन्द्रकविमा-
१० नानि इन्द्रवन्मध्येऽवस्थितानि^३ । तेषां चतसृषु दिक्षु आकाशप्रदेशश्रेणिवदवस्थानात् श्रेणीविमानानि ।
विदिक्षु प्रकीर्णपुष्पवदवस्थानात्पुष्पप्रकीर्णकानि ।
§ ४७४. तेषां वैमानिकानां भेदावबोधनार्थमाह—
कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च ॥१७॥
§ ४७५. कल्पेषूपपन्नाः कल्पोपपन्नाः—कल्पानतीताः कल्पातीताश्चेति द्विविधा वैमानिकाः ।
१५ बाहर । शंका-यह कैसे जाना जाता है ? समाधान - पिछले सूत्रमें 'नृलोके' पद आया है । अर्थके
अनुसार उसकी विभक्ति बदल जाती है, जिससे यह जाना जाता है कि यहां 'बहिः' पदसे मनुष्य-
लोकके बाहर यह अर्थ इष्ट है । शंका - मनुष्य-लोकमें ज्योतिषी निरन्तर गमन करते हैं यह पिछले
सूत्रमें कहा ही है अतः अन्यत्र ज्योतिषियोंका अवस्थान सुतरां सिद्ध है । इसलिए 'बहिरवस्थिताः'
यह सूत्रवचन निरर्थक है ? समाधान - यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि मनुष्यलोकके बाहर
२० ज्योतिषियोंका अस्तित्व और अवस्थान ये दोनों असिद्ध हैं । अतः इन दोनोंकी सिद्धिके लिए
'बहिरवस्थिताः' यह सूत्रवचन कहा है । दूसरे विपरीत गतिके निराकरण करनेके लिए और
कादाचित्क गतिके निराकरण करनेके लिए यह सूत्र रचा है। अतः यह सूत्रवचन अनर्थक
नहीं है ।
§ ४७२. अब चौथे निकायकी सामान्य संज्ञाके कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
२५ चौथे निकायके देव वैमानिक हैं ॥१६॥
§ ४७३. वैमानिकोंका अधिकार है यह बतलानेके लिए 'वैमानिक' पदका ग्रहण किया है ।
आगे जिनका कथन करनेवाले हैं वे वैमानिक हैं । इनका ज्ञान जैसे हो इसके लिए यह अधिकार
वचन है । जो विशेषतः अपनेमें रहनेवाले जीवोंको पुण्यात्मा मानते हैं वे विमान हैं और जो उन
विमानोंमें होते हैं वे वैमानिक हैं । इन्द्रक, श्रेणिबद्ध और पुष्पप्रकीर्णकके भेदसे विमान अनेक
३० प्रकारके हैं । उनमें से इन्द्रक विमान इन्द्रके समान मध्यमें स्थित हैं । उनके चारों ओर आकाशके
प्रदेशोंकी पंक्तिके समान जो स्थित हैं वे श्रेणिविमान हैं । तथा बिखरे हुए फूलोंके समान विदिशाओं-
में जो विमान अवस्थित हैं वे पुष्पप्रकीर्णक विमान हैं ।
§ ४७४ उन वैमानिकोंके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
वे दो प्रकारके हैं-कल्पोपपन्न और कल्पातीत ॥१७॥
३५ § ४७५. जो कल्पोंमें उत्पन्न होते हैं वे कल्पोपपन्न कहलाते हैं। और जो कल्पोंके परे हैं वे
कल्पातीत कहलाते हैं । इस प्रकार वैमानिक दो प्रकारके हैं ।
१. ॰न्यत्र बहिर्ज्यो-मु० । २. -नानि विविधा-मु० । ३. मध्ये व्यव- मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri