सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ४।२३ § ४८७ ] चतुर्थोऽध्यायः १८७
तेषामिव लेश्या येषां ते पीतपद्मशुक्ललेश्याः । तत्र कस्य का लेश्या इति । अत्रोच्यते—सौधर्मै-
शानयोः पीतलेश्याः । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः पीतपद्मलेश्याः । ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठेषु
पद्मलेश्याः । शुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेषु पद्मशुक्ललेश्याः । आनतादिषु शुक्ललेश्याः । तत्राप्यनु-
दिशानुत्तरेषु परमशुक्ललेश्याः । सूत्रेऽनभिहितं कथं मिश्रग्रहणम् । साहचर्याल्लोकवत् । तद्यथा—
छत्रिणो गच्छन्ति इति अच्छत्रिषु छत्रव्यवहारः । एवमिहापि मिश्रयोरन्यतरग्रहणं भवति । अयमर्थः ९
सूत्रतः कथं गम्यते इति चेत् । उच्यते—एवमभिसंबन्धः क्रियते, द्वयोः कल्पयुगलयोः पीतलेश्या;
सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः पद्मलेश्याया अविवक्षातः ब्रह्मलोकादिषु त्रिषु कल्पयुगलेषु पद्मलेश्या;
शुक्रमहाशुकयोः शुक्ललेश्याया अविवक्षातः । शेषेषु शतारादिषु शुक्ललेश्या; पद्मलेश्याया अवि-
वक्षातः । इति नास्ति दोषः ।
§ ४८६. आह कल्पोपपन्ना इत्युक्तं तत्रेदं न ज्ञायते के कल्पा इत्यत्रोच्यते— १०
प्राग्ग्रैवेयकेभ्यः कल्पाः ॥२३॥
§ ४८७. इदं न ज्ञायते इत आरभ्य कल्पा भवन्तीति सौधर्मादिग्रहणमनुवर्तते । तेनायमर्थो
लभ्यते—सौधर्मादयः प्राग्ग्रैवेयकेभ्यः कल्पा इति । पारिशेष्यादितरे कल्पातीता इति ।
करण करनेपर मध्यमा और विलम्बितावृत्तिमें उसका उपसंख्यान होता है इसके अनुसार यहाँ
'मध्यमा' शब्दमें औत्तरपदिक ह्रस्व हुआ है। उसी प्रकार प्रकृतमें भी औत्तरपदिक ह्रस्व जानना १५
चाहिए। अथवा यहाँ पीता, पद्मा और शुक्ला शब्द न लेकर पीत, पद्म और शुक्ल वर्णवाले
पदार्थ लेने चाहिए । जिनके इन वर्णोंके समान लेश्याएँ पायी जाती हैं वे पीत, पद्म और शुक्ल
लेश्यावाले जीव हैं। इस प्रकार यहाँ पीत, पद्म और शुक्ल ये तीन शब्द ह्रस्व ही समझना
चाहिए। अब किसके कौन लेश्या है यह बतलाते हैं—सौधर्म और ऐशान कल्पमें पीत लेश्या है।
सानत्कुमार और माहेन्द्रकल्पमें पीत और पद्म दोनों लेश्याएँ हैं। ब्रह्मलोक, ब्रह्मोत्तर, लान्तव २०
और कापिष्ठ कल्पोंमें पद्मलेश्या है। शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्रार कल्पमें पद्म और
शुक्ल ये दो लेश्याएँ हैं। तथा आनतादिकमें शुक्ल लेश्या है। उसमें भी अनुदिश और अनुत्तर
विमानोंमें परम शुक्ल लेश्या है। शंका—सूत्रमें तो मिश्र लेश्याएँ नहीं कही हैं फिर उनका कैसे
ग्रहण होता है ? समाधान—सम्बन्धसे मिश्र लेश्याओंका ग्रहण होता है, लोकके समान । जैसे,
'छत्री जाते हैं' ऐसा कथन करने पर अच्छत्रियोंमें भी छत्री व्यवहार होता है उसी प्रकार यहाँ भी २५
दोनों मिश्र लेश्याओंमें से किसी एकका ग्रहण होता है। शंका—यह अर्थ सूत्रसे कैसे जाना जाता
है ? समाधान—यहाँ ऐसा सम्बन्ध करना चाहिए कि दो कल्प युगलोंमें पीत लेश्या है। यहाँ
सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पमें पद्मलेश्याकी विवक्षा नहीं की। ब्रह्मलोक आदि तीन कल्प-
युगलोंमें पद्म लेश्या है। शुक्र और महाशुक्रमें शुक्ल लेश्याकी विवक्षा नहीं की। शेष शतार
आदिमें शुक्ललेश्या है। पद्म लेश्याकी विवक्षा नहीं की। इसलिए कोई दोष नहीं है। ३०
§ ४८६. कल्पोपपन्न देव हैं यह कह आये पर यह नहीं ज्ञात हुआ कि कल्प कौन हैं, इस-
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ग्रैवेयकोंसे पहले तक कल्प हैं ॥२३॥
§ ४८७. यह नहीं मालूम होता कि यहाँसे लेकर कल्प है इसलिए सौधर्म आदि पदकी
अनुवृत्ति होती है। इससे यह अर्थ प्राप्त होता है कि सौधर्मसे लेकर और नौ ग्रैवेयकसे पूर्वंतक कल्प ३५
हैं। परिशेष न्यायसे यह भी ज्ञात हो जाता है कि शेष सब कल्पातीत हैं।