सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० सर्वार्थसिद्धौ [ ४।१३ § ४६६ -
ततस्त्रीणि योजनान्युत्पत्य शनैश्चराश्चरन्ति । स एष ज्योतिर्गणगोचरो नभोऽवकाशो दशाधिक-
योजनशतबहलस्तिर्यगसंख्यातद्वीपसमुद्रप्रमाणो घनोदधिपर्यन्तः । उक्तं च—
“णउदुत्तरसत्तसया दससीदो१ चदुगं तियचउक्कं ।
तारारविससिरिक्खा बुहभग्गवगुरुअंगिरारसणी२ ॥”
§ ४६६. ज्योतिष्काणां गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥१३॥
§ ४६७. मेरोः प्रदक्षिणा मेरुप्रदक्षिणाः । 'मेरुप्रदक्षिणाः' इति वचनं गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थ-
विपरीता गतिर्मा विज्ञायीति । 'नित्यगतयः' इति विशेषणमनुपरतक्रियाप्रतिपादनार्थम् । 'नृलोक'-
ग्रहणं विषयार्थम् । अर्धतृतीयेषु द्वीपेषु द्वयोश्च समुद्रयोर्ज्योतिष्का नित्यगतयो नान्यत्रेति । ज्यो-
तिष्कविमानानां गतिहेत्वभावात्तद्वृत्त्यभाव इति चेत् । न; असिद्धत्वात्, गतिरताभियोग्यदेवप्रेरित-
गतिपरिणामात्मकर्मविपाकस्य वैचित्र्यात् । तेषां हि गतिमुखेनैव कर्म विपच्यत इति । एकादशभियों-
जनशतैरेकविंशैर्मेरुमप्राप्य ज्योतिष्काः प्रदक्षिणाश्चरन्ति ।
§ ४६८. गतिमज्ज्योतिस्संबन्धेन व्यवहारकालप्रतिपत्त्यर्थमाह—
तत्कृतः कालविभागः ॥१४॥
जाकर शनीचर हैं। यह ज्योतिषियोंसे व्याप्त नभःप्रदेश एक सौ दस योजन मोटा और घनोदधि-
पर्यन्त असंख्यात द्वीप समुद्रप्रमाण लम्बा है। कहा भी है—
'इस पृथिवी तलसे सात सौ नब्बे योजन ऊपर जाकर ताराएं हैं। पुनः दस योजन ऊपर
जाकर सूर्य हैं। पुनः अस्सी योजन ऊपर जाकर चन्द्रमा हैं। पुनः चार योजन ऊपर जाकर नक्षत्र
और चार योजन ऊपर जाकर बुध हैं। पुनः चार बार तीन योजन ऊपर जाकर अर्थात् तीन-तीन
योजन ऊपर जाकर क्रमसे शुक्र, गुरु, मंगल और शनि हैं ॥'
§ ४६६. अब ज्योतिषी देवोंकी गतिविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ज्योतिषी देव मनुष्यलोकमें मेरुकी प्रदक्षिणा करनेवाले और निरन्तर गतिशील हैं ॥१३॥
§ ४६७. 'मेरुप्रदक्षिणा' इस पदमें षष्ठी तत्पुरुष समास है। 'मेरुप्रदक्षिणा' यह वचन
गतिविशेषका ज्ञान करानेके लिए और कोई विपरीत गति न समझ बैठे इसके लिए दिया है। वे
निरन्तर गतिरूप क्रिया युक्त हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए 'नित्यगतयः' पद दिया है। इस
प्रकारके ज्योतिषी देवोंका क्षेत्र बतलानेके लिए 'नृलोक' पदका ग्रहण किया है। तात्पर्य यह है कि
ढाई द्वीप और दो समुद्रोंमें ज्योतिषी देव निरन्तर गमन करते रहते हैं अन्यत्र नहीं। शंका—
ज्योतिषी देवोंके विमानोंकी गतिका कारण नहीं पाया जाता, अतः उनका गमन नहीं बन सकता ?
समाधान—नहीं, क्योंकि यह हेतु असिद्ध है। बात यह है कि गमन करनेमें रत जो आभियोग्य
जातिके देव हैं उनसे प्रेरित होकर ज्योतिषी देवोंके विमानोंका गमन होता रहता है। यदि कहा
जाय कि आभियोग्य जातिके देव निरन्तर गतिमें ही क्यों रत रहते हैं तो उसका उत्तर यह है कि
यह कर्मके परिपाककी विचित्रता है। उनका कर्म गतिरूप से ही फलता है। यही कारण है
कि वे निरन्तर गमन करनेमें ही रत रहते हैं। यद्यपि ज्योतिषी देव मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा करते
हैं तो भी वे मेरु पर्वतसे ग्यारह सौ इक्कीस योजन दूर रह कर ही विचरण करते हैं।
§ ४६८. अब गमन करनेवाले ज्योतिषियोंके सम्बन्धसे व्यवहार-कालका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन गमन करनेवाले ज्योतिषियोंके द्वारा किया हुआ कालविभाग है ॥१४॥
१. –सीदिं चदुतियं दुगचउक्कं । तारा-ता०, ना०, तत्त्वा० । २. 'णउदुत्तरसत्तसए दस सीदी चदुदुगे तिय-
चउक्के । तारिणससिरिक्खबुहा सुक्कगुरुंगारमंदगदी।'-ति०, सा०, गा० ३३२ ।