सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।३२ § ५०४ -
णार्थः । किं विशिनष्टि । 'अधिक' शब्दोऽनुवर्तमानश्चतुर्भिरेभिसंबध्यते¹ नोत्तराभ्यामित्ययमर्थो
विशिष्यते । तेनायमर्थो भवति—ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरयोर्दशसागरोपमाणि साधिकानि । लान्तवका-
पिष्ठयोश्चतुर्दशसागरोपमाणि साधिकानि । शुक्क्रमहाशुक्रयोः षोडशसागरोपमाणि साधिकानि ।
शतारसहस्रारयोरष्टादशसागरोपमाणि साधिकानि । आनतप्राणतयोर्विंशतिसागरोपमाणि ।
आरणाच्युतयोर्द्वाविंशतिसागरोपमाणि ।
§ ५०४. तत ऊर्ध्वं स्थितिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकैकेन नवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥३२॥
§ ५०५. 'अधिक' ग्रहणमनुवर्तते । तेनेहाभिसंबन्धो वेदितव्यः । एकैकेनाधिकानीति ।
'नव' ग्रहणं किमर्थम् । प्रत्येकमेकैकमधिकमिति ज्ञापनार्थम् । इतरथा हि ग्रैवेयकेष्वेकमेवाधिकं
स्यात् । विजयादिष्विति 'आदि' शब्दस्य प्रकारार्थत्वादनुदिशानमपि ग्रहणम् । सर्वार्थसिद्धेस्तु
पृथग्ग्रहणं जघन्याभावप्रतिपादनार्थम् । तेनायमर्थः, अधोग्रैवेयकेषु प्रथमे त्रयोविंशतिः, द्वितीये
चतुर्विंशतिः, तृतीये पञ्चविंशतिः । मध्यमग्रैवेयकेषु प्रथमे षड्विंशतिः द्वितीये सप्तविंशतिः
तृतीयेऽष्टाविंशतिः । उपरिग्रैवेयकेषु प्रथमे एकोनत्रिंशद् द्वितीये त्रिंशत् तृतीये एकत्रिंशत् ।
अनुदिशविमानेषु द्वात्रिंशत् । विजयादिषु त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्युत्कृष्टा स्थितिः । सर्वार्थसिद्धौ²
त्रयस्त्रिंशदेवेति ।
के लिए आया है । शंका—इससे क्या विशेषता मालूम पड़ती है ? समाधान—इससे यहाँ यह
विशेषता मालूम पड़ती है कि अधिक शब्दकी अनुवृत्ति होकर उसका सम्बन्ध त्रि आदि चार शब्दों-
से ही होता है, अन्तके दो स्थितिविकल्पोंसे नहीं । इससे यहाँ यह अर्थ प्राप्त हो जाता है, ब्रह्मलोक
और ब्रह्मोत्तरमें साधिक दस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । लान्तव और कापिष्ठमें साधिक चौदह-
सागर उत्कृष्ट स्थिति है । शुक्र और महाशुक्रमें साधिक सोलह सागर उत्कृष्ट स्थिति है । शतार
और सहस्रारमें साधिक अठारह सागर उत्कृष्ट स्थिति है । आनत और प्राणतमें बीस सागर
उत्कृष्ट स्थिति है । तथा आरण और अच्युतमें बाईस सागर उत्कृष्ट स्थिति है ।
§ ५०४. अब इसके आगेके विमानोंमें स्थितिविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
आरण-अच्युतके ऊपर नौ ग्रैवेयकमें-से प्रत्येकमें नौ अनुदिशमें, चार विजयादिकमें एक-एक
सागर अधिक उत्कृष्ट स्थिति है । तथा सर्वार्थसिद्धिमें पूरी तैंतीस सागर स्थिति है । ॥३२॥
§ ५०५. पूर्व सूत्रसे अधिक पदकी अनुवृत्ति होती है, इसलिए यहाँ इस प्रकार सम्बन्ध
करना चाहिए कि एक-एक सागर अधिक है । शंका—सूत्रमें 'नव' पदका ग्रहण किसलिए किया ?
समाधान—प्रत्येक ग्रैवेयकमें एक-एक सागर अधिक उत्कृष्ट स्थिति है इस बातका ज्ञान करानेके
लिए 'नव' पदका अलगसे ग्रहण किया है । यदि ऐसा न करते तो सब ग्रैवेयकोंमें एक सागर
अधिक स्थिति ही प्राप्त होती । 'विजयादिषु' में आदि शब्द प्रकारवाची है जिससे अनुदिशोंका ग्रहण
हो जाता है । सर्वार्थसिद्धिमें जघन्य आयु नहीं है यह बतलानेके लिए 'सर्वार्थसिद्धि' पदका अलगसे
ग्रहण किया है । इससे यह अर्थ प्राप्त हुआ कि अधोग्रैवेयकमें-से प्रथममें तेईस सागर, दूसरेमें
चौबीस सागर और तीसरेमें पच्चीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । मध्यम ग्रैवेयकमें-से प्रथममें छब्बीस
सागर, दूसरेमें सत्ताईस सागर और तीसरेमें अट्ठाईस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । उपरिम ग्रैवेयकमें-से
पहलेमें उनतीस सागर, दूसरेमें तीस सागर और तीसरेमें इकतीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है ।
अनुदिश विमानोंमें बत्तीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है और सर्वार्थसिद्धिमें तैंतीस सागर ही स्थिति है ।
यहाँ उत्कृष्ट और जघन्यका भेद नहीं है ।
१. -तुर्भिरिह सम्ब-भा० १, दि० २ । २. जघन्यस्थितिः मु० ।