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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 558 में से

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पृष्ठ 295
  • ४।१९ § ४७९ ] चतुर्थोऽध्यायः १८३
    § ४७६. तेषामवस्थानविशेषनिर्ज्ञानार्थमाह-
    उपर्युपरि ॥१८॥
    § ४७७. किमर्थमिदमुच्यते । तिर्यगवस्थितिप्रतिषेधार्थमुच्यते । न. ज्योतिष्कवत्तिर्यगव-
    स्थिताः । न व्यन्तरवदसमावस्थितयः । 'उपर्युपरि' इत्युच्यन्ते । के ते । कल्पाः । ५
    § ४७८. यद्येवं, कियत्सु कल्पविमानेषु ते देवा भवन्तीत्यत आह-
    सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठशुक्रमहाशुक्रशतारसह-
    स्रारेष्वानतप्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयकेषु विजयवैजयन्तजयन्ताप-
    राजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥१९॥
    § ४७९. कथमेषां सौधर्मादिशब्दानां कल्पाभिधानम् । चातुरर्थिकेनाणा स्वभावतो वा कल्प-
    स्याभिधानं भवति । अथ कथमिन्द्राभिधानम् । स्वभावतः साहचर्याद्वा । तत्कथमिति चेत् । १०
    उच्यते-सुधर्मा नाम सभा, साऽस्मिन्नस्तीति सौधर्मः कल्पः । "तदस्मिन्नस्तीति¹" अण् । तत्कल्प-
    साहचर्यादिन्द्रोऽपि सौधर्मः । ईशानो नाम इन्द्रः स्वभावतः । ईशानस्य निवासः कल्प ऐशानः ।
    "तस्य निवासः²" इत्यण् । तत्साहचर्यादिन्द्रोऽप्यैशानः । सनत्कुमारो नाम इन्द्रः स्वभावतः ।
    "तस्य निवासः" इत्यण् । सानत्कुमारः कल्पः । तत्साहचर्यादिन्द्रोऽपि सानत्कुमारः । महेन्द्रो
    § ४७६. अब उनके अवस्थान विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं- १५
    वे ऊपर-ऊपर रहते हैं ॥१८॥
    § ४७७. शंका - यह सूत्र किसलिए कहा है ? समाधान-ये कल्पोपपन्न और कल्पातीत
    वैमानिक तिरछे रूपसे रहते हैं इसका निषेध करनेके लिए कहा है । ये ज्योतिषियोंके समान तिरछे
    रूपसे नहीं रहते हैं। उसी प्रकार व्यन्तरोंके समान विषमरूपसे नहीं रहते हैं। किन्तु ऊपर-ऊपर
    हैं। शंका - वे ऊपर-ऊपर क्या हैं ? समाधान-कल्प । २०
    § ४७८. यदि ऐसा है तो कितने कल्प विमानोंमें वे देव निवास करते हैं, इस बातके बत-
    लानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं-
    सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव, कापिष्ठ, शुक्र, महाशुक्र,
    शतार और सहस्रार तथा आनत-प्राणत, आरण-अच्युत, नौ ग्रैवेयक और विजय, वैजयन्त, जयन्त
    अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धिमें वे निवास करते हैं ॥१९॥ २५
    § ४७९. शंका-इन सौधर्मादिक शब्दोंको कल्प संज्ञा किस निमित्तसे मिली है ? समा-
    धान - व्याकरणमें चार अर्थमें 'अण्' प्रत्यय होता है उससे सौधर्म आदि शब्दोंकी कल्पसंज्ञा है या
    स्वभावसे ही वे कल्प कहलाते हैं। शंका-सौधर्म आदि शब्द इन्द्रके वाची कैसे हैं ? समाधान -
    स्वभावसे या साहचर्यसे । शंका - कैसे ? समाधान-सुधर्मा नामकी सभा है वह जहाँ है उस
    कल्पका नाम सौधर्म है। यहाँ 'तदस्मिन्नस्ति' इससे 'अण्' प्रत्यय हुआ है। और इस कल्पके ३०
    सम्बन्धसे वहाँका इन्द्र भी सौधर्म कहलाता है। इन्द्रका ईशान यह नाम स्वभावसे है। वह इन्द्र
    जिस कल्पमें रहता है उसका नाम ऐशान कल्प है। यहाँ 'तस्य निवासः' इस सूत्रसे 'अण्' प्रत्यय
    हुआ है। तथा इस कल्पके सम्बन्धसे इन्द्र भी ऐशान कहलाता है। इन्द्रका सनत्कुमार नाम
    स्वभावसे है। यहाँ 'तस्य निवासः' इस सूत्रसे 'अण्' प्रत्यय हुआ है इससे कल्पका नाम सानत्कुमार
    १. 'तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि'-पा० ४, २, ६७ । 'तदस्मिन्नन्नं प्राये खौ'-जैनेन्द्र ४, १, २५ । २. 'तस्य ३५
    निवासः'-पा० ४, २, ६९, । तस्य निवासादूरभवौ'-जैनेन्द्र० ३, २, ८६ ।