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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 558 में से

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पृष्ठ 300

१८८ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।२४ § ४८८ -
§ ४८८. लौकान्तिका देवा वैमानिकाः सन्तः क्व गृह्यन्ते । कल्पोपपन्नेषु । कथमिति
चेदुच्यते-
ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः ॥२४॥
§ ४८९. एत्य तस्मिन् लीयन्त इति आलय आवासः । ब्रह्मलोक आलयो येषां ते ब्रह्मलो-
कालया लौकान्तिका देवा वेदितव्याः । यद्येवं सर्वेषां ब्रह्मलोकालयानां देवानां लौकान्तिकत्वं
प्रसक्तम् । अन्वर्थसंज्ञाग्रहणाददोषः ब्रह्मलोको लोकः, तस्यान्तो लोकान्तः, तस्मिन्भवा लौकान्तिका
इति न सर्वेषां ग्रहणम् । तेषां हि विमानानि ब्रह्मलोकस्यान्तेषु स्थितानि । अथवा जन्मजरामरणा-
कीर्णो लोकः संसारः, तस्यान्तो लोकान्तः । लोकान्ते भवा लौकान्तिकाः । ते सर्वे परीतसंसाराः,
ततश्च्युता एकं गर्भवासं प्राप्य परिनिर्वास्यन्तीति ।
§ ४९०. तेषां सामान्येनोपदिष्टानां भेदप्रदर्शनार्थमाह-
सारस्वतादित्यवह्न्यरुणगर्दतोयतुषिताव्याबाधारिष्टाश्च ॥२५॥
§ ४९१. क्व इमे सारस्वतादयः । अष्टास्वपि पूर्वोत्तरादिषु दिक्षु यथाक्रममेते सारस्वतादयो
देवगणा वेदितव्याः । तद्यथा-पूर्वोत्तरकोणे सारस्वतविमानम्, पूर्वस्यां दिशि आदित्यविमानम्,
पूर्वदक्षिणस्यां दिशि वह्निविमानम्, दक्षिणस्यां दिशि अरुणविमानम्, दक्षिणापरकोणे गर्दतोय-
विमानम्, अपरस्यां दिशि तुषितविमानम्, उत्तरापरस्यां दिशि अव्याबाधविमानम्, उत्तरस्यां दिशि
अरिष्टविमानम् । 'च'शब्दसमुच्चितास्तेषामन्तरेषु द्वौ देवगणौ । तद्यथा-सारस्वतादित्यान्तरे
§ ४८८. लौकान्तिक देव वैमानिक हैं उनका किनमें समावेश होता है ? वैमानिकोंमें ।
कैसे ? अब इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
लौकान्तिक देवोंका ब्रह्मलोक निवासस्थान है ॥२४॥
§ ४८९. आकर जिसमें लयको प्राप्त होते हैं वह आलय या आवास कहलाता है । ब्रह्मलोक
जिनका घर है वे ब्रह्मलोकमें रहनेवाले लौकान्तिक देव जानना चाहिए । शंका-यदि ऐसा है तो
ब्रह्मलोकमें रहनेवाले सब देव लौकान्तिक हुए ? समाधान - सार्थक संज्ञाके ग्रहण करनेसे यह दोष
नहीं रहता । लौकान्तिक शब्दमें जो लोक शब्द है उससे ब्रह्मलोक लिया है और उसका अन्त
अर्थात् प्रान्तभाग लोकान्त कहलाया । वहाँ जो होते हैं वे लौकान्तिक कहलाते हैं इसलिए
ब्रह्मलोकमें रहनेवाले सब देवोंका ग्रहण नहीं होता है। इन लौकान्तिक देवोंके विमान ब्रह्मलोकके
प्रान्तभागमें स्थित हैं। अथवा जन्म, जरा और मरणसे व्याप्त संसार लोक कहलाता है और उसका
अन्त लोकान्त कहलाता है। इस प्रकार संसारके अन्तमें जो होते हैं वे लौकान्तिक हैं, क्योंकि
ये सब संसारको प्राप्त हो गये हैं। वहाँसे च्युत होकर और एक बार गर्भमें रहकर निर्वाणको
प्राप्त होंगे ।
§ ४९०. सामान्यसे कहे गये उन लौकान्तिक देवोंके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं-
सारस्वत, आदित्य, वह्नि, अरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्याबाध और अरिष्ट ये लौकान्तिक
देव हैं ॥२५॥
§ ४९१. शंका-ये सारस्वत आदिक कहां रहते हैं ? समाधान-पूर्व-उत्तर आदि आठों ही
दिशाओंमें क्रमसे ये सारस्वत आदि देवगण रहते हैं ऐसा जानना चाहिए । यथा - पूर्वोत्तर कोणमें
सारस्वतोंके विमान हैं। पूर्व दिशामें आदित्योंके विमान हैं। पूर्व-दक्षिण दिशामें वह्निदेवोंके विमान
हैं। दक्षिण दिशामें अरुण विमान हैं। दक्षिण-पश्चिम कोनेमें गर्दतोयविमान हैं। पश्चिम दिशामें
तुषितविमान हैं। उत्तर-पश्चिम दिशामें अव्याबाधविमान हैं। और उत्तर दिशामें अरिष्टविमान हैं।