सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ४।४२ § ५२५ ] चतुर्थोऽध्यायः १९५
§ ५१८. अथैषां परा स्थितिः का इत्यत्रोच्यते—
परा पल्योपममधिकम् ॥३६॥
§ ५१९. परा उत्कृष्टा। स्थितिव्यन्तराणां पल्योपममधिकम् ।
§ ५२०. इदानीं ज्योतिष्काणां परा स्थितिर्वक्तव्येत्यत आह—
ज्योतिष्काणां च ॥४०॥
§ ५२१. 'च'शब्दः प्रकृतसमुच्चयार्थः । तेनैवमभिसंबन्धः । ज्योतिष्काणां परा स्थितिः
पल्योपममधिकमिति ।
§ ५२२. अथापरा कियतीत्यत आह—
तदष्टभागोऽपरा ॥४१॥
§ ५२३. तस्य पल्योपमस्याष्टभागो ज्योतिष्काणामपरा स्थितिरित्यर्थः ।
§ ५२४. अथ लौकान्तिकानां विशेषोक्तानां स्थितिविशेषो नोक्तः । स कियानित्यत्रोच्यते—
लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम् ॥४२॥
§ ५२५. अविशिष्टाः सर्वे ते शुक्ललेश्याः पञ्चहस्तोत्सेधशरीराः१।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
§ ५१८. अब व्यन्तरों की उत्कृष्ट स्थिति कितनी है यह बतलाने के लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
और उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है ॥३९॥
§ ५१९. पर शब्दका अर्थ उत्कृष्ट है । तात्पर्य यह है कि व्यन्तरों की उत्कृष्ट स्थिति साधिक
एक पल्य है।
§ ५२०. अब ज्योतिषियों की स्थिति कहनी चाहिए, अतः आगे का सूत्र कहते हैं—
ज्योतिषियोंकी उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है ॥४०॥
§ ५२१. सूत्रमें 'च' शब्द प्रकृतका समुच्चय करनेके लिए दिया है । इससे यह अर्थ घटित
होता है कि ज्योतिषियोंकी उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है ।
§ ५२२. ज्योतिषियोंकी जघन्य स्थिति कितनी है अब यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
ज्योतिषियोंकी जघन्य स्थिति उत्कृष्ट स्थितिका आठवां भाग है ॥४१॥
§ ५२३. इस सूत्रका यह भाव है कि उसका अर्थात् पल्यका आठवां भाग ज्योतिषियोंको
जघन्य स्थिति है ।
§ ५२४. विशेषरूपमें कहे गये लौकान्तिक देवोंकी स्थिति नहीं कही है । वह कितनी है अब
यह बतलाते हैं—
सब लौकान्तिकोंकी स्थिति आठ सागर है ॥४२॥
§ ५२५. इन सब लौकान्तिकोंकी शुक्ल लेश्या होती है । और शरीरकी ऊँचाई पाँच हाथ
होती है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामवाली तत्त्वार्थवृत्तिमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥४॥
१. शरीराः। चतुर्णिकायदेवानां स्थानं भेदः सुखादिकम् । परापरा स्थितिर्लेश्या तुर्याध्याये निरूपितम् । ३५
इति तत्त्वा०सु०, दि० १, मि० २, आ० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri