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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 558 में से

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पृष्ठ 297
  • ४।२१ § ४८३ ] चतुर्थोऽध्यायः १८५

§ ४८०. एषामधिकृतानां¹ वैमानिकानां परस्परतो विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः ॥२०॥
§ ४८१. स्वोपात्तस्यायुष उदयात्तस्मिन्भवे शरीरेण सहावस्थानं² स्थितिः । शापानुग्रह-
शक्तिः प्रभावः । सुखमिन्द्रियार्थानुभवः । शरीरवसनाभरणादिदीप्तिः द्युतिः । लेश्या उक्ता । लेश्याया
विशुद्धिलैश्याविशुद्धिः । इन्द्रियाणामवधेश्च विषय इन्द्रियावधिविषयः । ³तेभ्यस्तैर्वाऽधिका इति⁴ ५
तसिः । उपर्युपरि प्रतिकल्पं प्रतिप्रस्तारं च वैमानिकाः स्थित्यादिभिरधिका इत्यर्थः ।
§ ४८२. यथा स्थित्यादिभिरुपर्युपर्यधिका एवं गत्यादिभिरपीत्यतिप्रसङ्गे तन्निवृत्त्यर्थमाह—
गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः ॥२१॥
§ ४८३. देशाद्देशान्तरप्राप्तिहेतुर्गतिः । शरीरं वैक्रियिकमुक्तम् । लोभकषायोदयाद्विषयेषु
सङ्गः परिग्रहः । मानकषायादुत्पन्नोऽहंकारोऽभिमानः । एतैर्गत्यादिभिरुपर्युपरि हीनाः । देशान्तर- १०
विषयक्रीडारतिप्रकर्षाभावादुपर्युपरि गतिहीनाः । शरीरं सौधर्मेशानयोर्देवानां सप्तरत्निप्रमाणम् ।
धान यह है कि कल्पोपपन्नोंके बारह इन्द्र होते हैं, इसलिए उनके भेद भी बारह ही हैं पर वे रहते
हैं सोलह कल्पोंमें । यहाँ कल्पोंमें रहनेवाले देवोंके भेद नहीं गिनाये हैं । यहाँ तो उनके निवास-
स्थानोंकी परिगणना की गयी है, इसलिए दोनों कथनोंमें कोई विरोध नहीं है। शेष कथन १५
सुगम है।
§ ४८०. अब इन अधिकार प्राप्त वैमानिकोंके परस्पर विशेष ज्ञान करानेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
स्थिति, प्रभाव, सुख, द्युति, लेश्याविशुद्धि, इन्द्रियविषय और अवधिविषयकी अपेक्षा
ऊपर-ऊपरके देव अधिक हैं ॥२०॥
§ ४८१. अपने द्वारा प्राप्त हुई आयुके उदयसे उस भवमें शरीरके साथ रहना स्थिति कह- २०
लाती है। शाप और अनुग्रहरूप शक्तिको प्रभाव कहते हैं। इन्द्रियोंके विषयोंके अनुभवने करनेको
सुख कहते हैं। शरीर, वस्त्र और आभूषण आदिकी कान्तिको द्युति कहते हैं। लेश्याका कथन कर
आये। लेश्याकी विशुद्धि लेश्याविशुद्धि कहलाती है। इन्द्रिय और अवधिज्ञानका विषय इन्द्रिय-
विषय और अवधिविषय कहलाता है। इनसे या इनकी अपेक्षा वे सब देव उत्तरोत्तर अधिक-अधिक
हैं। तात्पर्य यह है कि ऊपर-ऊपर प्रत्येक कल्पमें और प्रत्येक प्रस्तारमें वैमानिक देव स्थिति आदि- २५
की अपेक्षा अधिक-अधिक हैं।
§ ४८२. जिस प्रकार ये वैमानिक देव स्थिति आदिकी अपेक्षा ऊपर-ऊपर अधिक हैं
उसी प्रकार गति आदिकी अपेक्षा भी प्राप्त हुए, अतः इसका निराकरण करनेके लिए आगे का
सूत्र कहते हैं—
गति, शरीर, परिग्रह और अभिमानकी अपेक्षा ऊपर-ऊपरके देव हीन हैं ॥२१॥ ३०
§ ४८३. एक देशसे दूसरे देशके प्राप्त करनेका जो साधन है उसे गति कहते हैं। यहाँ
शरीरसे वैक्रियिक शरीर लिया है यह पहले कह आये हैं। लोभ कषायके उदयसे विषयोंके संगको
परिग्रह कहते हैं। मानकषायके उदयसे उत्पन्न हुए अहंकारको अभिमान कहते हैं। इन गति
आदिकी अपेक्षा वैमानिक देव ऊपर-ऊपर हीन हैं। भिन्न देशमें स्थित विषयोंमें क्रीड़ा विषयक
रतिका प्रकर्ष नहीं पाया जाता इसलिए ऊपर-ऊपर गमन कम है। सौधर्म और ऐशान स्वर्गके ३५


१. -तानां परस्प- आ० । २. सह स्थानं आ०, दि० १, दि० २ । ३. 'अपादाने चाहीयरुहोः'- पा० ५,
४, ४५ । -अपादानेऽहीयरुहोः' -जैनेन्द्र ४, २, ६२ । 'आद्यादिभ्य उपसंख्यानम्'-पा० ५, ४, ४४ वार्ति० ।
'आद्यादिभ्यस्तसिः' -जैनन्द्र० ४, २, ६० । ४. इति तस्मिन्नुप- मु० ।
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