सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 289, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें– ४१८ § ४५७ ] चतुर्थोऽध्यायः १७७
§ ४५४. अथैषां देवानां सुखं कीदृशमित्युक्ते सुखावबोधनार्थमाह—
कायप्रवीचारा आ ऐशानात् ॥७॥
§ ४५५. प्रवीचारो मैथुनोपसेवनम् । कायेन प्रवीचारो येषां ते कायप्रवीचाराः । आङ्
अभिविध्यर्थः । असंहितया निर्देशः असंदेहार्थः । एते भवनवास्यादय ऐशानान्ताः संक्लिष्टकर्म-
त्वान्मनुष्यवत्स्त्रीविषयसुखमनुभवन्तीत्यर्थः ।
§ ४५६. अवधिग्रहणादितरेषां सुखविभागेऽनिश्चिते तत्प्रतिपादनार्थमाह—
शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः ॥८॥
§ ४५७. उक्तावशिष्टग्रहणार्थं 'शेष' ग्रहणम् । के पुनरुक्तावशिष्टाः । कल्पवासिनः । स्पर्शश्च
रूपं च शब्दश्च मनश्च स्पर्शरूपशब्दमनांसि, तेषु प्रवीचारो येषां ते स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः ।
कथमभिसंबन्धः । आर्षाविरोधेन । कुतः पुनः 'प्रवीचार'ग्रहणम् । इष्टसंप्रत्ययार्थमिति । कः
पुनरिष्टोऽभिसंबन्धः । आर्षाविरोधी—सानत्कुमारमाहेन्द्रयोर्देवा देवाङ्गनाङ्गस्पर्शमात्रादेव परां
प्रीतिमुपलभन्ते, तथा देव्योऽपि । ब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठेषु देवा दिव्याङ्गनानां शृङ्गाराकार-
विलासचतुरमनोज्ञवेषरूपावलोकनमात्रादेव परमसौख्यमाप्नुवन्ति । शुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेषु देवा
देववनितानां मधुरसंगीतमुद्धसितललितकथितभूषणरवश्रवणमात्रादेव परां प्रीतिमास्कन्दन्ति ।
आनतप्राणतारणाच्युतकल्पेषु देवा स्वाङ्गनामनःसंकल्पमात्रादेव परं सुखमाप्नुवन्ति ।
§ ४५४. इन देवोंका सुख किस प्रकारका होता है ऐसा पूछने पर सुखका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ऐशान तकके देव कायप्रवीचार अर्थात् शरीरसे विषय-सुख भोगनेवाले होते हैं ॥७॥
§ ४५५. मैथुनके उपसेवनको प्रवीचार कहते हैं । जिनका कायसे प्रवीचार है वे कायप्रवी-
चारवाले कहे जाते हैं । कहां तक कायसे प्रवीचारकी व्याप्ति है इस बातके बतलानेके लिए सूत्रमें
‘आङ्’ का निर्देश किया है । सन्देह न हो इसलिए ‘आ ऐशानात्’ इस प्रकार सन्धिके बिना निर्देश
किया है । तात्पर्य यह है कि ऐशान स्वर्ग पर्यन्त ये भवनवासी आदि देव संक्लिष्ट कर्मवाले होनेके
कारण मनुष्योंके समान स्त्रीविषयक सुखका अनुभव करते हैं ।
§ ४५६. ऊपरके सूत्रमें कायसे प्रवीचारकी मर्यादा कर दी है इसलिए इतर देवोंके सुखका
विभाग नहीं ज्ञात होता है, अतः इसके प्रतिपादन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शेष देव स्पर्श, रूप, शब्द और मनसे विषय-सुख भोगनेवाले होते हैं ॥८॥
§ ४५७. पहले जिन देवोंका प्रवीचार कहा है उनसे अतिरिक्त देवोंके ग्रहण करनेके लिए
'शेष' पदका ग्रहण किया है । शंका—उक्त देवोंसे अवशिष्ट और कौन देव हैं ? समाधान—
कल्पवासी । यहाँ स्पर्श, रूप, शब्द और मन इनका परस्पर द्वन्द्व समास करके अनन्तर प्रवीचार
शब्दके साथ बहुव्रीहि समास किया है । शंका—इनमें-से किन देवोंके कौन-सा प्रवीचार है इसका
सम्बन्ध कैसे करना चाहिए ? समाधान—इसका सम्बन्ध जिस प्रकार आर्षमें विरोध न आवे उस
प्रकार कर लेना चाहिए । शंका—पुनः ‘प्रवीचार' शब्दका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान—
इष्ट अर्थका ज्ञान करानेके लिए । शंका—जिसमें आर्षसे विरोध न आवे ऐसा वह इष्ट अर्थ क्या है ?
समाधान—सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गके देव देवांगनाओंके स्पर्श मात्रसे परम प्रीतिको प्राप्त
होते हैं और इसी प्रकार वहाँकी देवियां भी । ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव और कापिष्ठ स्वर्गके देव
देवांगनाओंके शृंगार, आकृति, विलास, चतुर और मनोज्ञ वेष तथा मनोज्ञ रूपके देखने मात्रसे ही
परम सुखको प्राप्त होते हैं । शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्रार स्वर्गके देव देवांगनाओंके मधुर
१. ‘आङ् मर्यादाभिविध्योः ।’ पा० २, १, १३ । २. -ङ्गाकास्पर्श-मु० ।
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