सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– ४।१२ § ४६५ ] चतुर्थोऽध्यायः १७९
व्यन्तराः किंनरकिंपुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचाः ॥११॥
§ ४६३. विविधदेशान्तराणि येषां निवासास्ते 'व्यन्तराः' इत्यन्वर्था सामान्यसंज्ञेयमष्टा-
नामपि विकल्पानाम् । तेषां व्यन्तराणामष्टौ विकल्पाः किंनरादयो वेदितव्या नामकर्मोदयविशेषा-
पादिताः । क्व पुनस्तेषामावासा इति चेत् । उच्यते—अस्माज्जम्बूद्वीपादसंख्येयान् द्वीपसमुद्रानतीत्य
उपरिष्टे¹ खरपृथिवीभागे सप्तानां व्यन्तराणांवासाः । राक्षसानां पङ्कबहुलभागे ।
§ ४६४. तृतीयस्य निकायस्य सामान्यविशेषसंज्ञासंकीर्तनार्थमाह—
ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥१२॥
§ ४६५. ज्योतिस्स्वभावत्वादेषां पञ्चानामपि 'ज्योतिष्काः' इति सामान्यसंज्ञा अन्वर्था ।
सूर्यादयस्तद्विशेषसंज्ञा नामकर्मोदयप्रत्ययाः । 'सूर्याचन्द्रमसौ' इति पृथग्ग्रहणं प्राधान्यख्यापनार्थम् ।
किंकृतं पुनः प्राधान्यम् । प्रभावादिकृतम् । क्व पुनस्तेषामावासाः । इत्यत्रोच्यते, अस्मात्समाद्
भूमिभागादूर्ध्वं सप्तयोजनशतानि नवत्युत्तराणि² उत्पत्य सर्वज्योतिषामधोभागविन्यस्तास्तारका-
श्चरन्ति । ततो दशयोजनान्युत्पत्य सूर्यश्चरन्ति । ततोऽशीतियोजनान्युत्पत्य चन्द्रमसो भ्रमन्ति ।
ततै³श्चत्वारि योजनान्युत्पत्य नक्षत्राणि । ततश्च⁴त्वारि योजनान्युत्पत्य बुधाः । ततस्त्रीणि योजना-
न्युत्पत्य शुक्राः । ततै⁵स्त्रीणि योजनान्युत्पत्य बृहस्पतयः । ततस्त्रीणि⁶ योजनान्युत्पत्याङ्गारकाः ।
व्यन्तर देव आठ प्रकारके हैं—किन्नर, किम्पुरुष, महोरग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और
पिशाच ॥११॥
§ ४६३. जिनका नानाप्रकारके देशोंमें निवास है वे व्यन्तर देव कहलाते हैं। यह सामान्य
संज्ञा सार्थक है जो अपने आठों ही भेदोंमें लागू है। इन व्यन्तरोंके किन्नरादिक आठों भेद विशेष
नामकर्मके उदयसे प्राप्त होते हैं ऐसा जानना चाहिए। शंका—इन व्यन्तरोंके आवास कहां हैं ?
समाधान—इस जम्बूद्वीपसे असंख्यात द्वीप और समुद्र लांघकर ऊपरके खर पृथिवी भागमें सात
प्रकारके व्यन्तरोंके आवास हैं। तथा पंकबहुल भागमें राक्षसोंके आवास हैं।
§ ४६४. अब तीसरे निकायकी सामान्य और विशेष संज्ञाका कथन करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
ज्योतिषी देव पांच प्रकारके हैं—सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और प्रकीर्णक तारे ॥१२॥
§ ४६५. ये सब पांचों प्रकारके देव ज्योतिर्मय हैं इसलिए इनकी ज्योतिषी यह सामान्य
संज्ञा सार्थक है। तथा सूर्य आदि विशेष संज्ञाएं विशेष नामकर्मके उदयसे प्राप्त होती हैं। सूर्य और
चन्द्रमाकी प्रधानताको दिखलानेके लिए 'सूर्याचन्द्रमसौ' इस प्रकार इन दोनोंका अलगसे ग्रहण
किया है। शंका—इनमें प्रधानता किस निमित्तसे प्राप्त होती है ? समाधान—इनमें प्रभाव आदिक-
की अपेक्षा प्रधानता प्राप्त होती है। शंका—इनका आवास कहांपर है ? समाधान—इस समान
भूमिभागसे सातसौ नब्बे योजन ऊपर जाकर तारकाएं विचरण करती हैं जो सब ज्योतिषियोंके
अधोभागमें स्थित हैं। इससे दस योजन ऊपर जाकर सूर्य विचरण करते हैं। इससे अस्सी योजन
ऊपर जाकर चन्द्रमा परिभ्रमण करते हैं। इससे चार योजन ऊपर जाकर नक्षत्र हैं। इससे चार
योजन ऊपर जाकर बुध हैं। इससे तीन योजन ऊपर जाकर शुक्र हैं। इससे तीन योजन ऊपर
जाकर बृहस्पति हैं। इससे तीन योजन ऊपर जाकर मंगल हैं। इससे तीन योजन ऊपर
१. -तीत्य परिष्टे आ०, ता०, ना०, दि० १, दि० २ । २. -त्तराणि ७९० उत्प-मु० । ३. ततस्त्रीणि
योज-ता०, ना०, । तत्त्वा० । ४. ततस्त्रीणि योज-ता०, ना०, तत्त्वा० । ५. ततश्चत्वारि योज-ता०, ना०,
तत्त्वा० । ६. ततश्चत्वारि योज-ता०, ना०, तत्त्वा० ।