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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 293, कुल 558 में से

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पृष्ठ 293

– ४।१५ § ४७१ ] चतुर्थोऽध्यायः १८१
§ ४६९. 'तद्'ग्रहणं गतिमज्ज्योतिःप्रतिनिदेशार्थम् । न केवलया गत्या नापि केवलैर्ज्यो-
तिर्भिः कालः परिच्छिद्यते; अनुपलब्धेरपरिवर्तनाच्च । कालो द्विविधो व्यावहारिको मुख्यश्च ।
व्यावहारिकः कालविभागस्तत्कृतः समयावलिकादिः क्रियाविशेषपरिच्छिन्नोऽन्यस्यापरिच्छिन्नस्य
परिच्छेदहेतुः । मुख्योऽन्यो वक्ष्यमाणलक्षणः ।
§ ४७०. इतरत्र ज्योतिषामवस्थानप्रतिपादनार्थमाह—
बहिरवस्थिताः ॥१५॥
§ ४७१. 'बहिः' इत्युच्यते । कुतो बहिः । नृलोकात् । कथमवगम्यते । अर्थवशाद्विभक्ति-
§ ४६९. गमन करनेवाले ज्योतिषी देवोंका निर्देश करनेके लिए 'तत्' पदका ग्रहण किया
है । केवल गतिसे कालका निर्णय नहीं हो सकता क्योंकि वह पायी नहीं जाती और गतिके बिना
केवल ज्योतिसे भी कालका निर्णय नहीं हो सकता क्योंकि परिवर्तनके बिना वह सदा एक-सी
रहेगी । यही कारण है कि यहाँ 'तत्' पदके द्वारा गतिवाले ज्योतिषियोंका निर्देश किया है। काल
दो प्रकारका है—व्यावहारिककाल और मुख्यकाल । इनमें-से समय और आवलि आदि रूप व्याव-
हारिककालका विभाग गतिवाले ज्योतिषी देवोंके द्वारा किया हुआ है। यह क्रिया विशेषसे जाना
जाता है और अन्य नहीं जानी हुई वस्तुओंके जाननेका हेतु है । मुख्यकाल इससे भिन्न है जिसका
लक्षण आगे कहनेवाले हैं ।
विशेषार्थ—मनुष्य मानुषोत्तर पर्वतके भीतर पाये जाते हैं। मानुषोत्तर पर्वतके एक ओरसे
लेकर दूसरी ओर तक कुल विस्तार पैंतालीस लाख योजन है। मनुष्य इसी क्षेत्रमें पाये जाते हैं।
इसलिए यह मनुष्यलोक कहलाता है। इस लोकमें ज्योतिष्क सदा भ्रमण किया करते हैं। इनका
भ्रमण मेरुके चारों ओर होता है। मेरुके चारों ओर ग्यारहसौ इक्कीस योजन तक ज्योतिष्क
मण्डल नहीं है। इसके आगे आकाशमें सर्वत्र बिखरा हुआ है। जम्बूद्वीपमें दो सूर्य और दो चन्द्र
हैं। एक सूर्य जम्बूद्वीपकी पूरी प्रदक्षिणा दो दिन-रातमें करता है। इसका चार क्षेत्र जम्बूद्वीपमें
१८० योजन और लवण समुद्रमें ३३० ४८/६१ योजन माना गया है। सूर्यके घूमनेकी कुल गलियां १८४
हैं। इनमें यह क्षेत्र विभाजित हो जाता है। एक गलीसे दूसरी गलीमें २ योजनका अन्तर माना
गया है। इसमें सूर्यबिम्बके प्रमाणको मिला देनेपर वह २ ४८/६१ योजन होता है। इतना उदयान्तर है।
मण्डलान्तर दो योजनका ही है। चन्द्रको पूरी प्रदक्षिणा करनेमें दो दिन-रातसे कुछ अधिक समय
लगता है। चन्द्रोदयमें न्यूनाधिकता इसीसे आती है। लवण समुद्रमें चार सूर्य, चार चन्द्र, धातकी-
खण्डमें बारह सूर्य, बारह चन्द्र, कालोदधिमें ब्यालीस सूर्य, ब्यालीस चन्द्र और पुष्करार्धमें बहत्तर
सूर्य, बहत्तर चन्द्र हैं। इस प्रकार ढाई द्वीपमें एक सौ बत्तीस सूर्य और एक सौ बत्तीस चन्द्र हैं।
इन दोनोंमें चन्द्र, इन्द्र और सूर्य प्रतीन्द्र हैं। एक-एक चन्द्रका परिवार एक सूर्य, अट्ठाईस नक्षत्र,
अठासी ग्रह और छ्यासठ हजार नौ सौ कोड़ाकोड़ी तारे हैं। इन ज्योतिष्र्कोंका गमन स्वभाव है
तो भी आभियोग्य देव सूर्य आदि के विमानोंको निरन्तर ढोया करते हैं। ये देव सिंह, गज,
बैल और घोड़ेका आकार धारण किये रहते हैं। सिंहाकार देवोंका मुख पूर्व दिशाकी ओर रहता
है। तथा गजाकार देवोंका मुख दक्षिण दिशाकी ओर, वृषभाकार देवोंका मुख पश्चिमकी ओर,
और अश्वाकार देवोंका मुख उत्तर दिशाकी ओर रहता है।
§ ४७०. अब ढाई द्वीपके बाहर ज्योतिषियोंके अवस्थानका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
मनुष्य-लोकके बाहर ज्योतिषी देव स्थिर रहते हैं ॥१५॥
§ ४७१. सूत्रमें 'बहिः' पद दिया है। शंका—किससे बाहर ? समाधान—मनुष्य-लोकसे