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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 558 में से

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पृष्ठ 303
  • ४।३१ § ५०३ ] चतुर्थोऽध्यायः १९१
    § ४९८. आद्यदेवनिकायस्थित्यभिधानादनन्तरं व्यन्तरज्योतिष्कस्थितिवचने क्रमप्राप्ते सति
    तदुल्लङ्घ्य वैमानिकानां स्थितिरुच्यते । कुतः। तयोरुत्तरत्र लघुनोपायेन स्थितिवचनात् । तेषु
    चादावुद्दिष्टयोः कल्पयोः स्थितिविधानार्थमाह—
    सौधर्मेशानयोः सागरोपमे अधिके ॥२९॥
    § ४९९. 'सागरोपमे' इति द्विवचननिर्देशाद् द्वित्वगतिः । 'अधिके' इत्ययमधिकारः । आ ५
    कुतः । आ सहस्रारात् । इदं तु कुतो ज्ञायते । उत्तरत्र 'तु' शब्दग्रहणात् । तेन सौधर्मेशानयोर्देवानां
    द्वे सागरोपमे सातिरेके प्रत्येतव्ये ।
    § ५००. उत्तरयोः स्थितिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
    सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त ॥३०॥
    § ५०१. अनयोः कल्पयोर्देवानां सप्तसागरोपमाणि साधिकानि उत्कृष्टा स्थितिः । १०
    § ५०२. ब्रह्मलोकादिष्वच्युतावसानेषु स्थितिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
    त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु ॥३१॥
    § ५०३. 'सप्त'ग्रहणं प्रकृतम् । तस्येह त्र्यादिभिर्निर्दिष्टैरभिसंबन्धो वेदितव्यः । सप्त
    त्रिभिरधिकानि, सप्त सप्तभिरधिकानीत्यादिः । द्वयोर्द्वयोरभिसंबन्धो वेदितव्यः । 'तु'शब्दो विशेष-
    § ४९८. देवोंके प्रथम निकायकी स्थिति कहनेके पश्चात् व्यन्तर और ज्योतिषियोंकी स्थिति १५
    क्रमप्राप्त है किन्तु उसे छोड़कर वैमानिकोंकी स्थिति कहते हैं; क्योंकि व्यन्तर और ज्योतिषियोंकी
    स्थिति आगे थोड़ेमें कही जा सकेगी । वैमानिकोंमें आदिमें कहे गये दो कल्पोंकी स्थितिका कथन
    करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    सौधर्म और ऐशान कल्पमें दो सागरसे कुछ अधिक उत्कृष्ट स्थिति है ॥२९॥
    § ४९९. सूत्रमें 'सागरोपमे' यह द्विवचन प्रयोग दिया है उससे दो सागरोंका ज्ञान होता है । २०
    'अधिके' यह अधिकार वचन है । शंका—इसका कहां तक अधिकार है ? समाधान—सहस्रार कल्प
    तक । शंका—यह कैसे जाना जाता है ? समाधान—अगले सूत्रमें जो 'तु' पद दिया है उससे
    जाना जाता है ।
    § ५००. इससे यह निश्चित होता है कि सौधर्म और ऐशान कल्पमें दो सागरसे कुछ
    अधिक स्थिति है। अब आगेके दो कल्पोंमें स्थिति विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगे का सूत्र २५
    कहते हैं—
    सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पमें सात सागरसे कुछ अधिक उत्कृष्ट स्थिति है ॥३०॥
    § ५०१. इन दो कल्पोंमें देवोंकी साधिक सात सागर उत्कृष्ट स्थिति है ।
    § ५०२. अब ब्रह्मलोकसे लेकर अच्युत पर्यन्त कल्पोंमें स्थिति विशेषका ज्ञान करानेके लिए
    आगेका सूत्र कहते हैं— ३०
    ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर युगलसे लेकर प्रत्येक युगलमें आरण-अच्युत तक क्रमसे साधिक तीनसे
    अधिक सात सागरोपम, साधिक सातसे अधिक सात सागरोपम, साधिक नौसे अधिक सात
    सागरोपम, साधिक ग्यारहसे अधिक सात सागरोपम, तेरहसे अधिक सात सागरोपम और पन्द्रह-
    से अधिक सात सागरोपम उत्कृष्ट स्थिति है ॥३१॥
    § ५०३. यहाँ पिछले सूत्रसे 'सप्त' पदका ग्रहण होता है । उसका यहाँ तीन आदि निर्दिष्ट ३५
    शब्दोंके साथ सम्बन्ध जानना चाहिए । यथा—तीन अधिक सात, सात अधिक सात आदि । तथा
    इनका क्रमसे दो दो कल्पोंके साथ सम्बन्ध जानना चाहिए । सूत्रमें 'तु' शब्द विशेषताके दिखलाने-