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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 288, कुल 558 में से

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पृष्ठ 288

१७६ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।५ § ४५१ -
त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्या व्यन्तरज्योतिष्काः ॥५॥
§ ४५१. व्यन्तरेषु ज्योतिष्केषु च त्रायस्त्रिंशांल्लोकपालांश्च वर्जयित्वा इतरेऽष्टौ विकल्पा
द्रष्टव्याः ।
§ ४५२. अथ तेषु निकायेषु किमेकैक इन्द्र उतान्यः प्रतिनियमः कश्चिदस्तीत्यत आह—
पूर्वयोर्द्वीन्द्राः ॥६॥
§ ४५३. पूर्वयोर्निकाययोर्भवनवासिव्यन्तरनिकाययोः । कथं द्वितीयस्य पूर्वत्वम् । सामी-
प्यात्पूर्वत्वमुपचर्योक्तम् । ‘द्वीन्द्राः’ इति अन्तर्नीतवीप्सार्थः । द्वौ द्वौ इन्द्रौ येषां ते द्वीन्द्रा इति ।
यथा सप्तपर्णोऽष्टापद इति । तद्यथा—भवनवासिषु तावदसुरकुमाराणां द्वाविन्द्रौ चमरौ वैरोचनश्च ।
नागकुमाराणां धरणो भूतानन्दश्च । विद्युत्कुमाराणां हरिसिंहो हरिकान्तश्च । सुपर्णकुमाराणां
वेणुदेवो वेणुधारी च । अग्निकुमाराणामग्निशिखोऽग्निमाणवश्च । वातकुमाराणां वैलम्बः
प्रभञ्जनश्च । स्तनितकुमाराणां सुघोषो महाघोषश्च । उदधिकुमाराणां जलकान्तो जलप्रभश्च ।
द्वीपकुमाराणां पूर्णो वसिष्ठश्च । दिक्कुमाराणाममितगतिरमितवाहनश्चेति । व्यन्तरेष्वपि
किन्नराणां द्वाविन्द्रौ किन्नरः किम्पुरुषश्च । किम्पुरुषाणां सत्पुरुषो महापुरुषश्च २। महोरगाणा-
मतिकायो महाकायश्च । गन्धर्वाणां गीतरतिर्गीतयशश्च । यक्षाणां पूर्णभद्रो मणिभद्रश्च ।
राक्षसानां भीमो महाभीमश्च । भूतानां प्रतिरूपोऽप्रतिरूपश्च । पिशाचानां कालो महाकालश्च ।
किन्तु व्यन्तर और ज्योतिष्क देव त्रायस्त्रिंश और लोकपाल इन दो भेदों से रहित हैं ॥५॥
§ ४५१. व्यन्तर और ज्योतिषियोंमें त्रायस्त्रिंश और लोकपाल इन दो भेदोंके सिवा शेष
आठ भेद जानना चाहिए ।
§ ४५२. उन निकायोंमें क्या एक-एक इन्द्र है या और दूसरा कोई नियम है, इस बातके
बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं ।
प्रथम दो निकायोंमें दो दो इन्द्र हैं ॥६॥
§ ४५३. पूर्व दो निकायोंसे भवनवासी और व्यन्तर ये दो निकाय लेना चाहिए । शंका—
दूसरे निकायको पूर्व कैसे कहा जा सकता है ? समाधान—प्रथमके समीपवर्ती होनेसे दूसरे निकाय
को उपचारसे पूर्व कहा है । ‘द्वीन्द्राः’ इस पदमें वीप्सा रूप अर्थ गर्भित है अतः इसका विग्रह इस
प्रकार हुआ कि ‘द्वौ द्वौ इन्द्रौ येषां ते द्वीन्द्राः’ जैसे सप्तपर्ण और अष्टापद । तात्पर्य यह है जिस प्रकार
सप्तपर्ण और अष्टापद इन पदोंमें वीप्सारूप अर्थ गर्भित है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए ।
खुलासा इस प्रकार है—भवनवासियोंमें असुरकुमारोंके चमर और वैरोचन ये दो इन्द्र हैं । नाग
कुमारोंके धरण और भूतानन्द ये दो इन्द्र हैं । विद्युत्कुमारोंके हरिसिंह और हरिकान्त ये दो इन्द्र हैं ।
सुपर्णकुमारोंके वेणुदेव और वेणुधारी ये दो इन्द्र हैं । अग्निकुमारोंके अग्निशिख और अग्निमाणव ये
दो इन्द्र हैं । वातकुमारोंके वैलम्ब और प्रभंजन ये दो इन्द्र हैं । स्तनितकुमारोंके सुघोष और महा-
घोष ये दो इन्द्र हैं । उदधिकुमारोंके जलकान्त और जलप्रभ ये दो इन्द्र हैं । द्वीपकुमारोंके पूर्ण और
विशिष्ट ये दो इन्द्र हैं । तथा दिक्कुमारोंके अमितगति और अमितवाहन ये दो इन्द्र हैं । व्यन्तरोंमें
भी किन्नरोंके किन्नर और किम्पुरुष ये दो इन्द्र हैं । किम्पुरुषोंके सत्पुरुष और महापुरुष ये दो
इन्द्र हैं । महोरगोंके अतिकाय और महाकाय ये दो इन्द्र हैं । गन्धर्वों के गीतरति और गीतयश
ये दो इन्द्र हैं । यक्षोंके पूर्णभद्र और मणिभद्र ये दो इन्द्र हैं । राक्षसोंके भीम और महाभीम ये
दो इन्द्र हैं । भूतोंके प्रतिरूप और अप्रतिरूप ये दो इन्द्र हैं । तथा पिशाचोंके काल और महाकाल
ये दो इन्द्र हैं ।
१. -वर्ज्या व्य- ता०, ना०, । २. - रुषश्चेति महो-मु० ।