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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

१३६ सर्वार्थसिद्धौ [ २।३३ § ३२५ -
'णिच्चिदरधादु सत्त य तरु दस वियलिंदिएसु छच्चेव ।
सुरणिरयतिरिय चउरो चोद्दस मणुए सदसहस्सा१ ॥'
§ ३२५. एवमेतस्मिन्नवयोनिभेदसंकटे त्रिविधजन्मनि सर्वप्राणभृतामनियमेन प्रसक्ते तदव-
धारणार्थमाह—
जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः ॥३३॥
§ ३२६. यज्जालवत्प्राणिपरिवरणं विततमांसशोणितं तज्जरायुः । यन्नखत्वक्सदृशमुपात्त-
काठिन्यं शुक्रशोणितपरिवरणं परिमण्डलं तदण्डम् । किंचित्परिवरणमन्तरेण परिपूर्णावयवो योनि-
निर्गतमात्र एव परिस्पन्दादिसामर्थ्योपेतः पोतः । जरायो जातां जरायुजाः । अण्डे जाता अण्डजाः ।
जरायुजाश्च अण्डजाश्च पोताश्च जरायुजाण्डजपोता गर्भोयोनयः ।
§ ३२७. यद्यमीषां जरायुजाण्डजपोतानां गर्भोऽवध्रियते, अथोपपादः केषां भवतीत्यत आह—
देवनारकाणामुपपादः ॥३४॥
देवानां नारकाणां चोपपादो जन्म वेदितव्यम् ।
§ ३२८. अथान्येषां किं जन्मेत्यत आह—
शेषाणां संमूर्च्छनम् ॥३५॥
§ ३२९. गर्भजेभ्य औपपादिकेभ्यश्चान्ये शेषाः । संमूर्च्छनं जन्मेति । एते त्रयोऽपि योगा
नियमार्थाः । उभयतो नियमश्च द्रष्टव्यः । जरायुजाण्डजपोतानामेव गर्भः । गर्भ एव च जरायु-
'नित्यनिगोद, इतरनिगोद, पृथिवीकायिक जलकायिक, अग्निकायिक, और वायुकायिक
जीवोंकी सात-सात लाख योनियां हैं । वृक्षोंको दस लाख योनियाँ हैं । विकलेन्द्रियोंकी मिलाकर
छह लाख योनियाँ हैं । देव, नारकी और तिर्यंचोंकी चार-चार लाख योनियाँ हैं तथा मनुष्योंकी
चौदह लाख योनियाँ हैं ।'
§ ३२५. इस प्रकार नौ योनियोंसे युक्त तीन जन्म सब जीवोंके अनियमसे प्राप्त हुए अतः
निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जरायुज, अण्डज और पोत जीवोंका गर्भजन्म होता है ॥३३॥
§ ३२६. जो जालके समान प्राणियोंका आवरण है और जो मांस और शोणितसे बना है
उसे जरायु कहते हैं। जो नखकी त्वचाके समान कठिन है, गोल है और जिसका आवरण शुक्र
और शोणितसे बना है उसे अण्ड कहते हैं । जिसके सब अवयव बिना आवरणके पूरे हुए हैं और
जो योनिसे निकलते ही हलन-चलन आदि सामर्थ्यसे युक्त है उसे पोत कहते हैं । इनमें जो जरसे
पैदा होते हैं वे जरायुज कहलाते हैं। जो अण्डोंसे पैदा होते हैं वे अण्डज कहलाते हैं। सूत्रमें
जरायुज, अण्डज और पोत इनका द्वन्द्व समास है । ये सब गर्भकी योनियां हैं ।
§ ३२७. यदि इन जरायुज, अण्डज और पोत जीवोंका गर्भ जन्म निर्णीत होता है तो अब
यह बतलाइए कि उपपाद जन्म किन जीवोंके होता है, अतः इस बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
देव और नारकियोंका उपपाद जन्म होता है ॥३४॥
§ ३२८. इनसे अतिरिक्त अन्य जीवोंके कौन-सा जन्म होता है । अब इस बातका ज्ञान
करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शेष सब जीवोंका सम्मूर्च्छन जन्म होता है ॥३५॥
§ ३२९. इस सूत्रमें 'शेष' पदसे वे जीव लिये गये हैं जो गर्भ और उपपाद जन्मसे नहीं
पैदा होते । इनके संमूर्च्छन जन्म होता है । ये तीनों ही सूत्र नियम करते हैं । और यह नियम
१. मूलाचा० गा० । गो० जी० गा० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

  • २।३७ § ३३३ ] द्वितीयोऽध्यायः १३७

जाण्डजपोतानाम् । देवनारकाणामेवोपपादः । उपपाद एव च देवनारकाणाम् । शेषाणामेव संमूर्च्छ-
नम् । संमूर्च्छनमेव शेषाणामिति ।
§ ३३०. तेषां पुनः संसारिणां त्रिविधजन्मनामाहितबहुविकल्पनवयोनिवेदानां शुभाशुभ-
नामकर्मविपाकनिर्वर्तितानि बन्धफलानुभवनाधिष्ठानानि शरीराणि कानीत्यत आह—
औदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसकार्मणानि शरीराणि ॥३६॥ ५
§ ३३१. विशिष्टनामकर्मोदयापादितवृत्तीनि शीर्यन्त इति शरीराणि१। औदारिकादि-
प्रकृतिविशेषोदयप्राप्तवृत्तीनि औदारिकादीनि । उदारं स्थूलम् । उदारे२ भवं उदारं प्रयोजनमस्येति
वा, औदारिकम् । अष्टगुणैश्वर्ययोगादेकानेकाणुमहच्छरीरविविधकरणं विक्रिया, सा प्रयोजनमस्येति
वैक्रियिकम् । सूक्ष्मपदार्थनिर्ज्ञानार्थमसंयमपरिजिहीर्षया वा प्रमत्तसंयतेनाह्रियते निर्वर्त्यते
तदित्याहारकम् । यत्तेजोनिमित्तं तेजसि वा भवं तत्तैजसम् । कर्मणां कार्यं कार्मणम् । सर्वेषां १०
कर्मनिमित्तत्वेऽपि रूढिवशाद्विशिष्टविषये वृत्तिरवसेया ।
§ ३३२. यथौदारिकस्येन्द्रियैरुपलब्धिस्तथेतरेषां कस्मान्न भवतीत्यत आह—
परं परं सूक्ष्मम् ॥३७॥
§ ३३३. 'पर'शब्दस्यानेकार्थवृत्तित्वेऽपि विवक्षातो व्यवस्थार्थगतिः । पृथग्भूतानां शरीराणां
सूक्ष्मगुणेन वीप्सानिर्देशः क्रियते परम्परमिति । औदारिकं स्थूलम्, ततः सूक्ष्मं वैक्रियिकम्, ततः १५
दोनों ओरसे जानना चाहिए । यथा—गर्भ जन्म जरायुज, अण्डज और पोत जीवोंका ही होता है ।
या जरायुज, अण्डज और पोत जीवों के गर्भजन्म ही होता है। उपपाद जन्म देव और नारकियों
के ही होता है या देव और नारकियोंके उपपाद जन्म ही होता है सम्मूर्च्छन जन्म शेष जीवोंके ही
होता है या शेष जीवोंके संमूर्च्छन जन्म ही होता है ।
§ ३३०. जो तीन जन्मोंसे पैदा होते हैं और जिनके अपने अवान्तर भेदोंसे युक्त नौ योनियां २०
हैं उन संसारी जीवोंके शुभ और अशुभ नामकर्मके उदयसे निष्पन्न हुए और बन्धफलके अनुभव
करनेमें आधारभूत शरीर कितने हैं । अब इसी बातको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये पाँच शरीर हैं ॥३६॥
§ ३३१. जो विशेष नामकर्मके उदयसे प्राप्त होकर शीर्यन्ते अर्थात् गलते हैं वे शरीर हैं।
इसके औदारिक आदि पाँच भेद हैं। ये औदारिक आदि प्रकृति विशेषके उदयसे होते हैं। उदार २५
और स्थूल ये एकार्थवाची शब्द हैं। उदार शब्दसे होनेरूप अर्थमें या प्रयोजनरूप अर्थमें ठक्
प्रत्यय होकर औदारिक शब्द बनता है। अणिमा आदि आठ गुणोंके ऐश्वर्यके सम्बन्धसे एक,
अनेक, छोटा, बड़ा आदि नाना प्रकारका शरीर करना विक्रिया है। यह विक्रिया जिस शरीरका
प्रयोजन है वह वैक्रियिक शरीर है। सूक्ष्म पदार्थका ज्ञान करनेके लिए या असंयमको दूर करनेकी
इच्छासे प्रमत्तसंयत जिस शरीरको रचना करता है वह आहारक शरीर है । जो दीप्तिका कारण ३०
है या तेजमें उत्पन्न होता है उसे तैजस शरीर कहते हैं। कर्मोंका कार्य कार्मण शरीर है। यद्यपि
सब शरीर कर्मके निमित्तसे होते हैं तो भी रूढ़िसे विशिष्ट शरीरको कार्मण शरीर कहा है।
§ ३३२. जिस प्रकार इन्द्रियाँ औदारिक शरीरको जानती हैं उस प्रकार इतर शरीरोंको
क्यों नहीं जानतीं ? अब इस बातको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आगे-आगेका शरीर सूक्ष्म है ॥३७॥ ३५
§ ३३३. पर शब्दके अनेक अर्थ हैं तो भी यहाँ विवक्षासे व्यवस्थारूप अर्थका ज्ञान होता
है। यद्यपि शरीर अलग-अलग हैं तो भी उनमें सूक्ष्म गुणका अन्वय है यह दिखलानेके लिए

१. 'चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ।' न्या० सू० १, १, ११ । २. उदारे भवमौदारिकम् । उदारं मु० ।
१८

[header] १३८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।३८ § ३३४ - [/header]

सूक्ष्मं आहारकम्, ततः सूक्ष्मं तैजसम्, तैजसात्कार्मणं सूक्ष्ममिति ।
§ ३३४. यदि परम्परं सूक्ष्मम्, प्रदेशतोऽपि¹ न्यूनं परम्परं हीनमिति विपरीतप्रतिपत्ति-
निवृत्त्यर्थमाह—
प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् ॥३८॥
§ ३३५. प्रदिश्यन्त इति प्रदेशाः परमाणवः । संख्यामतीतोऽसंख्येयः । असंख्येयो गुणोऽस्य
तदिदमसंख्येयगुणम् । कुतः । प्रदेशतः । नावगाहतः । परम्परमित्यनुवृत्तेरा कार्मणात्प्रसङ्गे तन्नि-
वृत्त्यर्थमाह प्राक्तैजसादिति । औदारिकादसंख्येयगुणप्रदेशं वैक्रियिकम् । वैक्रियिकादसंख्येयगुण-
प्रदेशमाहारकमिति । को गुणकारः । पल्योपमासंख्येयभागः । यद्येवम्, परम्परं महापरिमाणं
प्राप्नोति²। नैवम्; बन्धविशेषात्परिमाणभेदाभावस्तूलनिचय्यायःपिण्डवत् ।
§ ३३६. अथोत्तरयोः किं समप्रदेशत्वमुतास्ति कश्चिद्विशेष इत्यत आह--
अनन्तगुणे परे ॥३६॥
§ ३३७. प्रदेशत इत्यनुवर्तते, तेनैवमभिसंबन्धः क्रियते—आहारकात्तैजसं प्रदेशतोऽनन्त-
गुणम्, तैजसात्कार्मणं प्रदेशतोऽनन्तगुणमिति । को गुणकारः । अभव्यानामनन्तगुणः सिद्धानाम-
नन्तभागः³ ।
'परम्परम्' इस प्रकार वीप्सा निर्देश किया है । औदारिक शरीर स्थूल है । इससे वैक्रियिक शरीर
सूक्ष्म है । इससे आहारक शरीर सूक्ष्म है । इससे तैजस शरीर सूक्ष्म है और इससे कार्मण
शरीर सूक्ष्म है ।
§ ३३४. यदि ये शरीर उत्तरोत्तर सूक्ष्म हैं तो प्रदेशोंकी अपेक्षा भी उत्तरोत्तर हीन होंगे ।
इस प्रकार विपरीत ज्ञानका निराकरण करने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तैजससे पूर्व तीन शरीरोंमें आगे-आगेका शरीर प्रदेशों की अपेक्षा असंख्यातगुणा है ॥३८॥
§ ३३५. प्रदेश शब्दकी व्युत्पत्ति 'प्रदिश्यन्ते' होती है । इसका अर्थ परमाणु है । संख्यातीत-
को असंख्येय कहते हैं । जिसका गुणकार असंख्यात है वह असंख्येयगुणा कहलाता है । शंका—
किसकी अपेक्षा ? समाधान—प्रदेशोंकी अपेक्षा, अवगाहनकी अपेक्षा नहीं । पूर्व सूत्रमें 'परम्परम्'
इस पदकी अनुवृत्ति होकर असंख्येयगुणत्वका प्रसंग कार्मण शरीर तक प्राप्त होता है अतः उसकी
निवृत्तिके लिए सूत्रमें 'प्राक् तैजसात्' पद रखा है । अर्थात् तैजस शरीरसे पूर्ववर्ती शरीर तक ये
शरीर उत्तरोत्तर असंख्यातगुणे हैं । औदारिक शरीरसे वैक्रियिक शरीर असंख्यातगुणे प्रदेशवाला
हैं। शंका—गुणकारका प्रमाण क्या है ? समाधान—पल्यका असंख्यातवाँ भाग । शंका—यदि
ऐसा है तो उत्तरोत्तर एक शरीरसे दूसरा शरीर महापरिमाणवाला प्राप्त होता है ? समाधान—
यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, बन्धविशेषके कारण परिमाणमें भेद नहीं होता । जैसे रूईका ढेर
और लोहेका गोला ।
§ ३३६. आगेके दो शरीरोंके प्रदेश क्या समान हैं या उनमें भी कुछ भेद है । इस बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
परवर्ती दो शरीर प्रदेशोंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर अनन्तगुणे हैं ॥ ३९ ॥
§ ३३७. पूर्व सूत्रसे 'प्रदेशतः' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। जिससे इस प्रकार सम्बन्ध
करना चाहिए कि आहारक शरीरसे तैजस शरीरके प्रदेश अनन्तगुणे हैं और तैजस शरीरसे कार्मण
शरीरके प्रदेश अनन्तगुणे हैं । शंका—गुणकार क्या है ? समाधान—अभव्योंसे अनन्तगुणा और
सिद्धोंका अनन्तवाँ भाग गुणकार है ।

[footnotes]
१. -प्रदेशतः । परस्पर-ता०, ना० । २. प्राप्नोति । बन्ध-ता० । ३. -मनन्तो भागः ता०, ना० ।
[/footnotes]

– २४२ § ३४२ ] द्वितीयोऽध्यायः १३९
§ ३३८. तत्रैतत्स्याच्छल्यकवन्मूर्तिमद्द्रव्योपचितत्वात्संसारिणो जीवस्याभिप्रेतगतिनिरोध-
प्रसङ्ग इति । तन्न; किं कारणम् । यस्मादुभे अप्येते—
अप्रतीघाते ॥४०॥
§ ३३९. मूर्तिमतो मूर्त्यन्तरेण व्याघातः प्रतीघातः । स नास्त्यनयोरित्यप्रतीघाते; सूक्ष्म-
१परिणामात् । अयःपिण्डे तेजोऽनुप्रवेशवत्तैजसकार्मणयोर्नास्ति वज्रपटलादिषु व्याघातः । ननु च ५
वैक्रियिकाहारकयोरपि नास्ति प्रतीघातः । सर्वत्राप्रतीघातोऽत्र विवक्षितः । यथा तैजसकार्मणयोरा-
लोकान्तात् सर्वत्र नास्ति प्रतीघातः, न तथा वैक्रियिकाहारकयोः ।
§ ३४०. आह किमेतावानेव विशेषः उत कश्चिदन्योऽप्यस्तीत्याह—
अनादिसंबन्धे च ॥४१॥
§ ३४१. 'च' शब्दो विकल्पार्थः । अनादिसंबन्धे सादिसंबन्धे चेति । कार्यकारणभावसंतत्या १०
अनादिसंबन्धे, विशेषापेक्षया सादिसंबन्धे २ च बीजवृक्षवत् । यथौदारिकवैक्रियिकाहारकाणि
जीवस्य कदाचित्कानि, न तथा तैजसकार्मणे । नित्यसंबन्धिनी हि ते आ संसारक्षयात् ।
– § ३४२. त एते तैजसकार्मणे किं कस्यचिदेव भवत उताविशेषेणेत्यत आह—
सर्वस्य ॥४२॥
§ ३३८. शंका—जिस प्रकार कील आदिके लग जानेसे कोई भी प्राणी इच्छित स्थानको १५
नहीं जा सकता उसी प्रकार मूर्तिक द्रव्यसे उपचित होनेके कारण संसारी जीवकी इच्छित गतिके
निरोधका प्रसंग प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि ये दोनों शरीर—
प्रतीघातरहित हैं ॥ ४० ॥
§ ३३९. एक मूर्तिक पदार्थका दूसरे मूर्तिक पदार्थके द्वारा जो व्याघात होता है उसे
प्रतीघात कहते हैं। इन दोनों शरीरोंका इस प्रकारका प्रतीघात नहीं होता इसलिए ये प्रतीघात २०
रहित हैं। जिस प्रकार सूक्ष्म होनेसे अग्नि लोहेके गोलेमें प्रवेश कर जाती है। उसी प्रकार तैजस
और कार्मण शरीरका वज्रपटलादिकमें भी व्याघात नहीं होता । शंका—वैक्रियिक और आहारक
शरीरका भी प्रतीघात नहीं होता फिर यहाँ तैजस और कार्मण शरीरको ही अप्रतीघात क्यों
कहा ? समाधान—इस सूत्रमें सर्वत्र प्रतीघातका अभाव विवक्षित है। जिस प्रकार तैजस और
कार्मण शरीरका लोक पर्यन्त सर्वत्र प्रतीघात नहीं होता वह बात वैक्रियिक और आहारक २५
शरीरकी नहीं है।
§ ३४०. इन दोनों शरीरोंमें क्या इतना ही विशेषता है या और भी कोई विशेषता है।
इसी बातको बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
आत्माके साथ अनादि सम्बन्धवाले हैं ॥ ४१ ॥
§ ३४१. सूत्रमें 'च'शब्द विकल्पको सूचित करनेके लिए दिया है। जिससे यह अर्थ हुआ ३०
कि तैजस और कार्मण शरीरका अनादि सम्बन्ध है और सादि सम्बन्ध भी है। कार्यकारणभावकी
परम्पराकी अपेक्षा अनादि सम्बन्ध है और विशेषकी अपेक्षा सादि सम्बन्ध है। यथा बीज और
वृक्ष । जिस प्रकार औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर जीवके कदाचित् होते हैं उस प्रकार
तैजस और कार्मण शरीर नहीं हैं। संसारका क्षय होने तक उनका जीवके साथ सदा सम्बन्ध है।
§ ३४२. ये तैजस और कार्मण शरीर क्या किसी जीवके ही होते हैं या सामान्यरूपसे ३५
सबके होते हैं । इसी बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा सब संसारी जीवोंके होते हैं ॥ ४२ ॥
१. -परिमाणात् मु० । २. -सम्बन्धेऽपि च मु० ।

१४० सर्वार्थसिद्धौ [ २।४३ § ३४३ -
§ ३४३. 'सर्वं' शब्दो निरवशेषवाची । निरवशेषस्य संसारिणो जीवस्य ते द्वे अपि शरीरे
भवत इत्यर्थः ।
§ ३४४. अविशेषाभिधानात्तैरोदारिकादिभिः सर्वस्य संसारिणो यौगपद्येन संबन्धप्रसङ्गे
संभवशरीरप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते—
तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्या¹ चतुर्भ्यः ॥४३॥
§ ३४५. 'तत्' शब्दः प्रकृततैजसकार्मणप्रतिनिर्देशार्थः । ते तैजसकार्मणे आदिर्येषां तानि
तदादीनि । भाज्यानि विकल्प्यानि । आ कुतः । आ चतुर्भ्यः । युगपदेकस्यात्मनः । कस्यचिद् द्वे
तैजसकार्मणे । अपरस्य त्रीणि औदारिकतैजसकार्मणानि वैक्रियिकतैजसकार्मणानि वा । अन्यस्य
चत्वारि औदारिकाहारकतैजसकार्मणानीति विभागः क्रियते ।
§ ३४६. पुनरपि तेषां विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥
§ ३४७. अन्ते भवमन्त्यम् । किं । तत् कार्मणम् । इन्द्रियप्रणालिकया शब्दादीनामुपलब्धिरूप-
§ ३४३. यहाँ 'सर्व' शब्द निरवशेषवाची है । वे दोनों शरीर सब संसारी जीवोंके होते हैं
यह इस सूत्रका तात्पर्य है ।
§ ३४४. सामान्य कथन करनेसे उन औदारिकादि शरीरों के साथ सब संसारी जीवोंका
एक साथ सम्बन्ध प्राप्त होता है अतः एक साथ कितने शरीर सम्भव है इस बातको दिखलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
एक साथ एक जीवके तैजस और कार्मणसे लेकर चार शरीर तक विकल्पसे होते हैं ॥४३॥
§ ३४५. सूत्रमें प्रकरणप्राप्त तैजस और कार्मण शरीरका निर्देश करनेके लिए 'तत्' शब्द
दिया है । तदादि शब्दका समास लभ्य अर्थ है—तैजस और कार्मण शरीर जिनके आदिमें हैं वे ।
भाज्य और विकल्प्य ये पर्यायवाची नाम हैं । तात्पर्य यह है कि एक साथ एक आत्माके पूर्वोक्त
दो शरीरसे लेकर चार शरीर तक विकल्पसे होते हैं । किसीके तैजस और कार्मण ये दो शरीर
होते हैं । अन्यके औदारिक तैजस और कार्मण या वैक्रियिक, तैजस और कार्मण ये तीन शरीर होते
हैं । किसी दूसरेके औदारिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये चार शरीर होते हैं । इस प्रकार यह
विभाग यहाँ किया गया है ।
विशेषार्थ—आगे ४७वें सूत्रमें तपोविशेषके बलसे वैक्रियिक शरीरकी उत्पत्तिका निर्देश
किया है इसलिए प्रश्न होता है कि किसी ऋद्धिधारी साधुके एक साथ पाँच शरीरका सद्भाव
माननेमें क्या हानि है ? समाधान यह है कि एक साथ वैक्रियिक और आहारक ऋद्धिकी प्रवृत्ति
नहीं होती इसलिए एक तो एक साथ आहारक शरीरके साथ वैक्रियिक शरीरका अवस्थान नहीं
बन सकता । दूसरे तपोविशेषसे जो विक्रिया प्राप्त होती है वह औदारिक शरीर सम्बन्धी ही
विक्रिया है । उसे स्वतन्त्र वैक्रियिक शरीर मानना उचित नहीं है । कर्मसाहित्यमें वैक्रियिक शरीर
नामकर्मके उदयसे जो शरीर प्राप्त होता है उसकी परिगणना ही वैक्रियिक शरीरमें की गयी है ।
इसलिए अधिकारी भेद होनेसे औदारिक और आहारक शरीरके साथ वैक्रियिक शरीर नहीं बन
सकता । यही कारण है कि एक साथ अधिकसे अधिक चार शरीर बतलाये हैं ।
§ ३४६. फिर भी उन शरीरोंका विशेष ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अन्तिम शरीर उपभोगरहित है ॥४४॥
§ ३४७. जो अन्तमें होता है वह अन्त्य कहलाता है । शंका—अन्तका शरीर कौन है ?
१. -देकस्मिन्ना च-म० ।

  • २४५ § ३५० ] द्वितीयोऽध्यायः १४१
    भोगः । तदभावान्निरुपभोगम् । विग्रहगतौ सत्यामपि इन्द्रियलब्धौ द्रव्येन्द्रियनिर्वृत्त्यभावाच्छब्दा-
    द्युपभोगाभाव इति । ननु तैजसमपि निरुपभोगम् । तत्र किमुच्यते निरुपभोगमन्त्यमिति । तैजसं
    शरीरं योगनिमित्तमपि न भवति, ततोऽस्योपभोगविचारेऽनधिकारः ।१
    § ३४८. एवं तत्रोक्तलक्षणेषु जन्मसु अमूनि शरीराणि प्रादुर्भावमापद्यमानानि किमविशेषेण
    भवन्ति, उत कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आह—
    गर्भसंमूर्च्छनजमाद्यम् ॥४५॥
    § ३४९. सूत्रक्रमापेक्षया आदौ भवमाद्यम् । औदारिकमित्यर्थः । यद् गर्भजं यच्च संमूर्च्छनजं
    तत्सर्वमौदारिकं द्रष्टव्यम् ।
    § ३५०. तदनन्तरं यन्निर्दिष्टं तत्कस्मिन् जन्मनीत्यत आह—
    समाधान—कार्मण । इन्द्रियरूप नालियोंके द्वारा शब्दादिके ग्रहण करनेको उपभोग कहते हैं। यह
    बात अन्तके शरीरमें नहीं पायी जाती; अतः वह निरुपभोग है । विग्रहगतिमें लब्धिरूप भावेन्द्रिय-
    के रहते हुए भो वहाँ द्रव्येन्द्रियको रचना न होनेसे शब्दादिकका उपभोग नहीं होता । शंका—
    तैजस शरीर भी निरुपभोग है इसलिए वहाँ यह क्यों कहते हो कि अन्तका शरीर निरुपभोग है ?
    समाधान—तैजस शरीर योगमें निमित्त भी नहीं होता, इसलिए इसका उपभोगके विचारमें
    अधिकार नहीं है ।
    विशेषार्थ—औदारिक, वैक्रियिक और आहारक इन तीन शरीरोंमें इन्द्रियोंकी रचना
    होकर उन द्वारा अपने-अपने विषयोंका ग्रहण होता है इसलिए ये तीनों शरीर सोपभोग माने
    गये हैं । यद्यपि कार्मण काययोग केवली जिनके प्रतर और लोकपूरण समुद्घातके समय तथा
    विग्रहगतिमें होता है । पर इनमें-से प्रतर और लोकपूरण समुद्घातके समय केवलज्ञान होनेसे वहाँ
    उपभोगका प्रश्न ही नहीं उठता । मात्र विग्रहगतिमें कार्मण काययोगके रहते हुए उपभोग होता है
    या नहीं यह प्रश्न होता है और इसी प्रश्नका उत्तर देनेके लिए 'निरुपभोगमन्त्यम्' यह सूत्र रचा
    गया है । अन्तका शरीर उपभोगरहित क्यों है इस बातका खुलासा करते हुए बतलाया है कि
    विग्रहगतिमें भावेन्द्रियाँ तो होती हैं पर द्रव्येन्द्रियाँ नहीं होतीं इसलिए यहाँ शब्दादि विषयोंका
    ग्रहण नहीं होता । यही कारण है कि अन्तके शरीरको निरुपभोग कहा है । रहा तैजस शरीर सो
    अन्य चार शरीरोंके समान इसका स्वतन्त्र अधिकार नहीं है। अनिःसृत तैजस शरीर सब संसारी
    जीवोंके सदा होता है और निःसृत तैजस शरीर कादाचित्क होता है । इस प्रकार तैजस शरीर
    पाया तो जाता है सब संसारी जीवोंके, पर आत्मप्रदेश परिस्पन्दमें यह शरीर कारण नहीं है इस-
    लिए इन्द्रियों-द्वारा विषयोंके ग्रहण करनेमें इस शरीरको उपयोगी नहीं माना गया है। यही कारण
    है कि तैजस शरीर निरुपभोग है कि सोपभोग यह प्रश्न ही नहीं उठता ।
    § ३४८. इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षणवाले इन जन्मोंमें क्या सामान्यसे सब शरीर उत्पन्न होते
    हैं या इसमें कुछ विशेषता है । इस बातको बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
    पहला शरीर गर्भ और संमूर्च्छन जन्मसे पैदा होता है ॥ ४५ ॥
    § ३४९. सूत्रमें जिस क्रमसे निर्देश किया है तदनुसार यहाँ आद्यपदसे औदारिक शरीरका
    ग्रहण करना चाहिए। जो शरीर गर्भजन्मसे और संमूर्च्छन जन्मसे उत्पन्न होता है वह सब औदा-
    रिक शरीर है यह इस सूत्रका तात्पर्य है ।
    § ३५०. इसके अनन्तर जिस शरीरका निर्देश किया है उसकी उत्पत्ति किस जन्मसे होती
    है अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    १. -नधिकारः । तत्रोक्त-ता०, ना० ।

१४२ ] सर्वार्थसिद्धौ [ २।४६ § ३५१ –

औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥४६॥
§ ३५१. उपपादे भवमौपपादिकम् । तत्सर्वं वैक्रियिकं वेदितव्यम् ।
§ ३५२. यद्यौपपादिकं वैक्रियिकम्, अनौपपादिकस्य वैक्रियिकत्वाभाव इत्यत आह—
लब्धिप्रत्ययं च ॥४७॥
§ ३५३. ‘च’ शब्देन वैक्रियिकमभिसंबध्यते । तपोविशेषादृद्धिप्राप्तिर्लब्धिः । लब्धिः प्रत्ययः
कारणमस्य लब्धिप्रत्ययम् । वैक्रियिकं लब्धिप्रत्ययं च भवतीत्यभिसंबध्यते ।
§ ३५४. किमेतदेव लब्ध्यपेक्षमुतान्यदप्यस्तीत्यत आह—
तैजमपि ॥४८॥
§ ३५५. ‘अपि’शब्देन लब्धिप्रत्ययमभिसंबध्यते । तैजमपि लब्धिप्रत्ययं भवतीति ।
§ ३५६. वैक्रियिकानन्तरं यदुपदिष्टं तस्य स्वरूपनिर्धारणार्थं स्वामिनिर्देशार्थं चाह—
शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥४६॥
§ ३५७. शुभकारणत्वाच्छुभव्यपदेशः । शुभकर्मण आहारककाययोगस्य कारणत्वाच्छुभ-
मित्युच्यते अन्नस्य प्राणव्यपदेशवत् । विशुद्धकार्यत्वाद्विशुद्धव्यपदेशः । विशुद्धस्य १पुण्यकर्मणः


वैक्रियिक शरीर उपपाद जन्मसे पैदा होता है ॥ ४६ ॥
§ ३५१. जो उपपादमें होता है उसे औपपादिक कहते हैं । इस प्रकार उपपाद जन्मसे पैदा
होनेवाले शरीरको वैक्रियिक जानना चाहिए ।
§ ३५२. यदि जो शरीर उपपाद जन्मसे पैदा होता है वह वैक्रियिक है तो जो शरीर उप-
पाद जन्मसे नहीं पैदा होता उसमें वैक्रियिकपन नहीं बन सकता । अब इसी बातका स्पष्टीकरण
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा लब्धिसे भी पैदा होता है ॥ ४७ ॥
§ ३५३. सूत्रमें ‘च’ शब्द आया है । उससे वैक्रियिक शरीरका सम्बन्ध करना चाहिए ।
तपविशेषसे प्राप्त होनेवाली ऋद्धिको लब्धि कहते हैं । इस प्रकारको लब्धिसे जो शरीर उत्पन्न होता
है वह लब्धिप्रत्यय कहलाता है । वैक्रियिक शरीर लब्धिप्रत्यय भी होता है ऐसा यहाँ सम्बन्ध
करना चाहिए ।
§ ३५४. क्या यही शरीर लब्धिकी अपेक्षासे होता है या दूसरा शरीर भी होता है। अब
इसी बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तैजस शरीर भी लब्धिसे पैदा होता है ॥ ४८ ॥
§ ३५५. सूत्रमें ‘अपि’ शब्द आया है । उससे ‘लब्धिप्रत्ययम्’ पदका ग्रहण होता है । तैजस
शरीर भी लब्धिप्रत्यय होता है यह इस सूत्रका भाव है ।
§ ३५६. वैक्रियिक शरीरके पश्चात् जिस शरीरका उपदेश दिया है उसके स्वरूपका निश्चय
करनेके लिए और उसके स्वामीका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आहारक शरीर शुभ, विशुद्ध और व्याघात रहित है और वह प्रमत्तसंयतके ही होता है ॥४९॥
§ ३५७. शुभकर्मका कारण होनेसे इसे शुभ कहा है । यह शरीर आहारक काययोग रूप
शुभकर्मका कारण है, इसलिए आहारक शरीर शुभ कहलाता है । यहाँ कारणमें कार्यका उपचार
है । जैसे अन्नमें प्राणका उपचार करके अन्नको प्राण कहते हैं । विशुद्ध कर्मका कार्य होनेसे आहारक
शरीरको विशुद्ध कहा है । तात्पर्य यह है कि जो चित्र-विचित्र न होकर निर्दोष है ऐसे विशुद्ध


१. पुण्यस्य कर्मणः मु० ।

  • २५० § ३५९ ] द्वितीयोऽध्यायः १४३
    अशबलस्य निरवद्यस्य कार्यत्वाद्विशुद्धमित्युच्यते तन्तूनां कार्पासव्यपदेशवत् । उभयतो व्याघाता-
    भावादव्याघाति । न ह्याहारकशरीरेणान्यस्य व्याघातः । नाप्यन्येनाहारकस्येति । तस्य प्रयोजन-
    समुच्चयार्थः 'च'शब्दः क्रियते । तद्यथा—कदाचिल्लब्धिविशेषसद्भावज्ञापनार्थं कदाचित्सूक्ष्म-
    पदार्थावधारणार्थं संयमपरिपालनार्थं च । आहारकमिति प्रागुक्तस्य प्रत्याम्नायः । यदाहारकशरीरं
    निर्वर्तयितुमारभते तदा प्रमत्तो भवतीति 'प्रमत्तसंयतस्य' इत्युच्यते । इष्टतोऽवधारणार्थं 'एव'कारो- ५
    पादानम् । यथैवं विज्ञायेत प्रमत्तसंयतस्यैवाहारकं नान्यस्येति । मैवं विज्ञायि प्रमत्तसंयतस्याहार-
    कमेवेति । मा भूदौदारिकादिनिवृत्तिरिति ।
    § ३५८. एवं विभक्तानि शरीराणि बिभ्रतां संसारिणां प्रतिगति किं त्रिलिङ्गसंनिधानं
    उत लिङ्गनियमः कश्चिदस्तीत्यत आह—
    नारकसंमूर्च्छिनो नपुंसकानि ॥५०॥ १०
    § ३५९. नरकाणि वक्ष्यन्ते । नरकेषु भवा नारकाः । संमूर्छनं संमूर्च्छः स येषामस्ति१ ते
    संमूर्च्छिनः। नारकाश्च संमूर्च्छिनश्च नारकसंमूर्च्छिनः । चारित्रमोहविकल्पनोकषायभेदस्य नपुंसक-
    वेदस्याशुभनाम्नश्चोदयान्न स्त्रियो न पुमांस इति नपुंसकानि भवन्ति । नारकसंमूर्च्छिनो नपुंस-
    कान्येवेति नियमः । तत्र हि स्त्रीपुंसविषयमनोज्ञशब्दगन्धरूपरसस्पर्शसंबन्धनिमित्ता स्वल्पापि
    सुखमात्रा नास्ति । १५
    अर्थात् पुण्यकर्मका कार्य होनेसे आहारक शरीरको भी विशुद्ध कहते हैं। यहाँ कार्यमें कारणका
    उपचार है। जैसे तन्तुओंमें कपासका उपचार करके तन्तुओंको कपास कहते हैं। दोनों ओरसे
    व्याघात नहीं होता इसलिए यह अव्याघाती है। तात्पर्य यह है कि आहारक शरीरसे अन्य पदार्थ-
    का व्याघात नहीं होता और अन्य पदार्थसे आहारक शरीरका व्याघात नहीं होता । आहारक
    शरीरके प्रयोजनका समुच्चय करनेके लिए सूत्रमें 'च' शब्द दिया है। यथा—आहारक शरीर २०
    कदाचित् लब्धि-विशेषके सद्भावको जतानेके लिए, कदाचित् सूक्ष्म पदार्थका निश्चय करनेके लिए
    और संयमकी रक्षा करनेके लिए उत्पन्न होता है। सूत्रमें 'आहारक' पद आया है उससे पूर्वमें कहे
    गये आहारक शरीरको दुहराया है। जिस समय जीव आहारक शरीरकी रचनाका आरम्भ करता
    है उस समय वह प्रमत्त हो जाता है इसलिए सूत्रमें प्रमत्तसंयतके ही आहारक शरीर होता है यह
    कहा है। इष्ट अर्थके निश्चय करनेके लिए सूत्रमें 'एवकार' पदको ग्रहण किया है। जिससे यह २५
    जाना जाय कि आहारक शरीर प्रमत्तसंयतके ही होता है अन्यके नहीं। किन्तु यह न जाना जाय
    कि प्रमत्तसंयतके आहारक ही होता है। तात्पर्य यह है कि प्रमत्तसंयतके औदारिक आदि
    शरीरोंका निराकरण न हो इसलिए प्रमत्तसंयत पदके साथ ही एवकार पद लगाया है ।
    § ३५८. इस प्रकार इन शरीरोंको धारण करनेवाले संसारी जीवोंके प्रत्येक गतिमें क्या
    तीनों लिंग होते हैं या लिंगका कोई स्वतन्त्र नियम है। अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगे- ३०
    का सूत्र कहते हैं—
    नारक और सम्मूर्च्छिन नपुंसक होते हैं ॥ ५० ॥
    § ३५९. नरकोंका कथन आगे करेंगे । जो नरकोंमें उत्पन्न होते हैं वे नारकी कहलाते हैं ।
    जो सम्मूर्च्छन जन्मसे पैदा होते हैं वे सम्मूर्च्छिन कहलाते हैं। सूत्रमें नारक और सम्मूर्च्छिन इन
    दोनों पदोंका द्वन्द्वसमास है । चारित्रमोहके दो भेद हैं—कषाय और नोकषाय । इनमेंसे नोकषायके ३५
    भेद नपुंसकवेदके उदयसे और अशुभ नामकर्मके उदयसे उक्त जीव स्त्री और पुरुष न होकर नपुंसक
    होते हैं। यहाँ ऐसा नियम जानना कि नारक और सम्मूर्च्छिन नपुंसक ही होते हैं। इन जीवोंके
    १. -मस्तीति सम्मू-मु० ।

१४४ सर्वार्थसिद्धौ [ २।५१ § ३६० -
§ ३६०. यद्येवमवध्रियते, अर्थादापन्नमेतदुक्तेभ्योऽन्ये संसारिणस्त्रिलिङ्गा इति यत्रात्यन्तं¹
नपुंसकलिङ्गस्याभावस्तत्प्रतिपादनार्थमाह—
न देवाः ॥५१॥
§ ३६१. स्त्रैणं पौंस्नं च यन्निरतिशयसुखं² शुभगतिनामोदयापेक्षं तद्देवा अनुभवन्तीति न
५ तेषु नपुंसकानि³ सन्ति ।
§ ३६२. अथेतरे कियल्लिङ्गा इत्यत आह—
शेषास्त्रिवेदाः ॥५२॥
§ ३६३. त्रयो वेदा येषां ते त्रिवेदाः । के पुनस्ते वेदाः । स्त्रीत्वं पुंस्त्वं नपुंसकत्वमिति ।
कथं तेषां सिद्धिः । वेद्यत इति वेदः । लिङ्गमित्यर्थः । तद् द्विविधं द्रव्यलिङ्गं भावलिङ्गं चेति ।
१० द्रव्यलिङ्गं योनिमेहनादि नामकर्मोदयनिर्वर्तितम् । नोकषायोदयापादितवृत्ति भावलिङ्गम् । स्त्री-
वेदोदयात् स्त्यायत्यस्यां गर्भ इति स्त्री । पुंवेदोदयात् सूते जनयत्यपत्यमिति पुमान्⁴ । नपुंसकवेदो-
दयात्तदुभयशक्तिविकलं नपुंसकम् । रूढिशब्दाश्चैते । रूढिषु च क्रिया व्युत्पत्त्यर्थं च । यथा गच्छ-
तीति गौरिति । इतरथा हि गर्भधारणादिक्रियाप्राधान्ये बालवृद्धानां तिर्यङ्मनुष्याणां देवानां
कार्मणकाययोगस्थानां च तदभावात्स्त्रीत्वादिव्यपदेशो न स्यात् । त एते त्रयो वेदाः शेषाणां गर्भ-
१५ जानां भवन्ति ।
मनोज्ञ शब्द, गन्ध, रूप, रस और स्पर्शके सम्बन्धसे उत्पन्न हुआ स्त्री-पुरुष विषयक थोड़ा भी सुख
नहीं पाया जाता है।
§ ३६०. यदि उक्त जीवोंके नपुंसकवेद निश्चित होता है तो यह अर्थात् सिद्ध है कि इनसे
अतिरिक्त अन्य संसारी जीव तीन वेदवाले होते हैं। इसमें भी जिनके नपुंसकवेदका अत्यन्त अभाव
२० है उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
देव नपुंसक नहीं होते ॥ ५१ ॥
§ ३६१. शुभगति नामकर्मके उदयसे स्त्री और पुरुषसम्बन्धी जो निरतिशय सुख है उसका
देव अनुभव करते हैं इसलिए उनमें नपुंसक नहीं होते ।
§ ३६२. इनसे अतिरिक्त शेष जीव कितने लिंगवाले होते हैं, इस बातको बतलानेके लिए
२५ आगेका सूत्र कहते हैं—
शेषके सब जीव तीन वेदवाले होते हैं ॥ ५२ ॥
§ ३६३. जिनके तीन वेद होते हैं वे तीन वेदवाले कहलाते हैं। शंका—वे तीन वेद कौन
हैं ? समाधान—स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद । शंका—इसकी सिद्धि कैसे होती है ?
समाधान—जो वेदा जाता है उसे वेद कहते हैं। इसीका दूसरा नाम लिंग है। इसके दो भेद हैं—
३० द्रव्यलिंग और भावलिंग । जो योनि मेहन आदि नामकर्मके उदयसे रचा जाता है वह द्रव्यलिंग है
और जिसकी स्थिति नोकषायके उदयसे प्राप्त होती है वह भावलिंग है। स्त्रीवेदके उदयसे जिसमें
गर्भ रहता है वह स्त्री है। पुंवेदके उदयसे जो अपत्यको जनता है वह पुरुष है और नपुंसकवेदके
उदयसे जो उक्त दोनों प्रकारकी शक्तिसे रहित है वह नपुंसक है। वास्तवमें ये तीनों रूढ़िक शब्द
हैं और रूढ़िमें क्रिया व्युत्पत्तिके लिए ही होती है। यथा जो गमन करती है वह गाय है। यदि
३५ ऐसा न माना जाय और इसका अर्थ गर्भधारण आदि क्रियाप्रधान लिया जाय तो बालक और
वृद्धोंके, तिर्यंच और मनुष्योंके, देवोंके तथा कार्मणकाययोगमें स्थित जीवोंके गर्भधारण आदि
१. -त्यन्तनपुं-आ०, दि० १ । -न्यन्तिकनपुं-दि० २ । २. -शयं सुखं गति-मु० । ३. नपुंसकलिङ्गानि सन्ति
मु० । ४. पुमान् । तदुभय-आ०, दि० १- दि० २ ।
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  • २५३ § ३६५ ] द्वितीयोऽध्यायः १४५

§ ३६४. य इमे जन्मयोनिशरीरलिङ्गसंबन्धाहितविशेषाः प्राणिनो निर्दिश्यन्ते देवादयो
विचित्रधर्माधर्मवशोपकृताश्चतसृषु गतिषु शरीराणि धारयन्तस्ते किं यथाकालमुपभुक्तायुषो मृत्यन्तर-
राण्यास्कन्दन्ति उतायथाकालमपीत्यत आह—
औपपादिकचरमोत्तमदेहा संख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥५३॥
§ ३६५. औपपादिका व्याख्याता देवनारका इति । चरमशब्दोऽन्त्यवाची । उत्तम उत्कृष्टः ।
चरम उत्तमो देहो येषां ते चरमोत्तमदेहाः । १परीतसंसारास्तज्जन्मनिर्वाणार्हा २इत्यर्थः । असंख्येय-
मतीतसंख्यानमुपमाप्रमाणेण पल्यादिना गम्यमायुर्येषां त इमे असंख्येयवर्षायुषस्तिर्यङ्मनुष्या
उत्तरकुर्वादिषु प्रसूताः । औपपादिकाश्च चरमोत्तमदेहाश्च असंख्येयवर्षायुषश्च औपपादिकचरमो-
त्तमदेहा संख्येयवर्षायुषः । बाह्यस्योपघातनिमित्तस्य विषशस्त्रादेः सति संनिधाने ह्रस्वं भवतीत्य-
पवत्र्यंम् । अपवर्त्यमायुर्येषां त इमे अपवर्त्यायुषः । न अपवर्त्यायुषः अनपवर्त्यायुषः । न ह्येषामौप-
क्रियाका अभाव होनेसे स्त्री आदि संज्ञा नहीं बन सकती.है। ये तीनों वेद शेष जीवोंके अर्थात्
गर्भजोंके होते हैं।
विशेषार्थ—इसी अध्यायमें औदयिक भावोंका निर्देश करते समय उनमें तीन लिंग भी
गिनाये हैं। ये तीनों लिंग वेदके पर्यायवाची हैं जो वेदनाकषायके उदयसे होते हैं। यहाँ किन
जीवोंके कौन लिंग होता है इसका विचार हो रहा है। इसी प्रसंगसे आचार्य पूज्यपादने लिंगके दो
भेद बतलाये हैं—द्रव्यलिंग और भावलिंग। प्रश्न यह है कि लिंगके ये दो भेद सूत्रोंसे फलित होते
हैं या विशेष जानकारीके लिए मात्र टीकाकारने इनका निर्देश किया है। उत्तर स्पष्ट है कि मूल
सूत्रोंमें मात्र वेद नोकषायके उदयसे होनेवाले वेदोंका ही निर्देश किया है जैसा कि इसी अध्यायके
६वें सूत्रसे ज्ञात होता है।
§ ३६४. जो ये देवादिक प्राणी जन्म, योनि, शरीर और लिंगके सम्बन्धसे अनेक प्रकारके
बतलाये हैं वे विचित्र पुण्य और पापके वशीभूत होकर चारों गतियोंमें शरीरको धारण करते हुए
यथाकाल आयुको भोगकर अन्य शरीरको धारण करते हैं या आयुको पूरा न करके भी अन्य
शरीरको धारण करते हैं? अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उपपादजन्मवाले, चरमोत्तमदेहवाले और असंख्यात वर्षकी आयुवाले जीव अनपवर्त्य
आयुवाले होते हैं ॥ ५३ ॥
§ ३६५. उपपादजन्मवाले देव और नारकी हैं यह व्याख्यान कर आये । चरम शब्द अन्त्य-
वाची है। उत्तम शब्दका अर्थ उत्कृष्ट है। जिनका शरीर चरम और उत्तम है वे चरमोत्तम
देहवाले कहे जाते हैं। जिनका संसार निकट है अर्थात् उसी भवसे मोक्षको प्राप्त होनेवाले जीव
चरमोत्तम देहवाले कहलाते हैं। असंख्येय परिमाण विशेष है जो संख्यातसे परे है। तात्पर्य यह है
कि पल्य आदि उपमा प्रमाणके द्वारा जिनकी आयु जानी जाती है वे उत्तरकुरु आदिमें उत्पन्न हुए
तिर्यंच और मनुष्य असंख्यात वर्षकी आयुवाले कहलाते हैं। उपघातके निमित्त विष शस्त्रादिक
बाह्य निमित्तोंके मिलनेपर जो आयु घट जाती है वह अपवर्त्य आयु कहलाती है। इस प्रकार
जिनकी आयु घट जातो है वे अपवर्त्य आयुवाले कहलाते हैं और जिनकी आयु नहीं घटती वे
अनपवर्त्य आयुवाले कहलाते हैं। इन औपपादिक आदि जीवोंकी आयु बाह्य निमित्तसे नहीं घटती
यह नियम है तथा इनसे अतिरिक्त शेष जीवोंका ऐसा कोई नियम नहीं है। सूत्रमें जो उत्तम
विशेषण दिया है वह चरम शरोरके उत्कृष्टपनको दिखलानेके लिए दिया है। यहाँ इसका और कोई
विशेष अर्थ नहीं है। अथवा 'चरमोत्तमदेहा' पाठके स्थानमें 'चरमदेह' यह पाठ भी मिलता है।
१. -देहाः । विपरीत-मु० । २. इत्यर्थः । अतीतसंख्यान-ता० ना० ।
१९
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पादिकादीनां बाह्यनिमित्तवशादायुरपवर्त्यते, इत्ययं नियमः । इतरेषामनियमः । चरमस्य देहस्यो-
त्कृष्टत्वप्रदर्शनार्थमुत्तमग्रहणं नार्थान्तरविशेषोऽस्ति । चरमदेहा इति वा पाठः¹ ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञाकायां द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥
विशेषार्थ—भुज्यमान आयुका उत्कर्षण नहीं होता केवल उदीरणा होकर आयु घट सकती
है, इसलिए प्रश्न होता है कि क्या सब संसारी जीवोंकी आयुका ह्रास होता है या इसका भी कोई
अपवाद है। इसी प्रश्नके उत्तर स्वरूप प्रकृत सूत्रकी रचना हुई है। इसमें बतलाया है कि उपपाद-
जन्मवाले देव ओर नारकी, तद्भवमोक्षगामी मनुष्य और असंख्यात वर्षकी आयुवाले तिर्यंच और
मनुष्य इनकी आयुका ह्रास नहीं होता। इन्हें जो आयु प्राप्त होती है उसका पूरा भोग होकर ही
उस पर्यायका अन्त होता है। यह विशेष नियम करनेका कारण यह है कि कर्मशास्त्रके अनुसार
कोई भी अधिक स्थितिवाला कर्म कारणविशेषके मिलनेपर अल्पकालमें भोगा जा सकता है।
भुज्यमान आयुपर भी यह नियम लागू होता है, इसलिए इस सूत्र-द्वारा यह व्यवस्था दी

अथ तृतीयोऽध्यायः
§ ३६६. 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इत्यादिषु नारकाः श्रुतास्ततः पृच्छति के ते
नारका इति । तत्प्रतिपादनार्थं तदधिकरणनिर्देशः क्रियते—
रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतममोमहातमःप्रभा भूमयो
घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोधः ॥१॥ ५
§ ३६७. रत्नं च शर्करा च वालुका च पङ्कश्च धूमश्च तमश्च महातमश्च रत्नशर्करावालु-
कापङ्कधूमतममोमहातमांसि । 'प्रभा' शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । साहचर्यात्ताच्छब्द्यम् । चित्रादि-
रत्नप्रभासहचरिता भूमिः रत्नप्रभा, शर्कराप्रभासहचरिता भूमिः शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभासह-
चरिता भूमिर्वालुकाप्रभा, पङ्कप्रभासहचरिता भूमिः पङ्कप्रभा, धूमप्रभासहचरिता भूमिर्धूमप्रभा,
तमःप्रभासहचरिता भूमिस्तमःप्रभा, महातमःप्रभासहचरिता भूमिर्महातमःप्रभा इति । एताः संज्ञा १०
अनेनोपायेन व्युत्पाद्यन्ते । 'भूमि'ग्रहणमधिकरणविशेषप्रतिपत्त्यर्थम् । यथा स्वर्गपटलानि भूमिमना-
श्रित्य व्यवस्थितानि न तथा नारकावासाः । किं र्तहि। भूमिमाश्रिता इति¹ । आसां भूमीनामा-
लम्बननिर्ज्ञानार्थं घनाम्बुवातादिग्रहणं क्रियते । घनाम्बु च वातश्च आकाशं च घनाम्बुवाता-
काशानि । तानि प्रतिष्ठा आश्रयो यासां ता घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः² । सर्वा एता भूमयो घनो-
§ ३६६. 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इत्यादिक सूत्रोंमें नारक शब्द सुना है इसलिए १५
पूछते हैं कि वे नारकी कौन हैं ? अतः नारकियोंका कथन करनेके लिए उनकी आधारभूत पृथि-
वियोंका निर्देश करते हैं—
रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा और महातमःप्रभा ये
सात भूमियाँ घनाम्बु, वात और आकाशके सहारे स्थित हैं तथा क्रमसे नीचे-नीचे हैं ॥१॥
§ ३६७. 'रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतममोमहातमाः' इसमें सब पदोंका परस्पर द्वन्द्व समास २०
है । प्रभा शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । पृथिवियोंकी प्रभा क्रमसे रत्न आदिके
समान होनेसे इनके रत्नप्रभा आदि नाम पड़े हैं । यथा—जिसकी प्रभा चित्र आदि रत्नोंकी प्रभाके
समान है वह रत्नप्रभा भूमि है। जिसकी प्रभा शर्कराके समान है वह शर्कराप्रभा भूमि है । जिसकी
प्रभा बालुकाकी प्रभाके समान है वह वालुकाप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा कीचड़के समान है वह
पंकप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा धुँवाके समान है वह धूमप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा अन्धकारके २५
समान है वह तमःप्रभा भूमि है और जिसकी प्रभा गाढ अन्धकारके समान है वह महातमःप्रभा
भूमि है । इस प्रकार इन नामोंकी व्युत्पत्ति कर लेनी चाहिए । सूत्रमें भूमि पदका ग्रहण अधिकरण
विशेषका ज्ञान करानेके लिए किया है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्वर्गपटल भूमिके बिना
स्थित है उस प्रकार नारकियोंके निवासस्थान नहीं हैं । किन्तु वे भूमिके आश्रयसे अवस्थित हैं ।
इन भूमियोंके आलम्बनका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें 'घनाम्बुवात' आदि पदका ग्रहण किया है । ३०
अभिप्राय यह है कि ये भूमियाँ क्रमसे घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुवातवलय और आकाश-
के आश्रयसे स्थित हैं इस बातके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः' पद दिया है ।
१. -इति । तासां भूमी-मु०, ता०, ना० । २. प्रतिष्ठाः । घनं च घनो मन्दो महान् आयत, इत्यर्थः । अम्बु
च जलम् उदकमित्यर्थः । वात-शब्दोऽन्त्यदीपकः । तत एवं संबन्धनीयः । घनो घनवातः । अम्बु अम्बुवातः ।
वातस्तनुवातः । इति महदपेक्षया तनुरिति सामर्थ्यगम्यः । अन्यः पाठः । सिद्धान्तपाठस्तु घनाम्बु च वातश्चेति । ३५
वातशब्दः सोपस्क्रियते । वातस्तनुवात इति वा । सर्वा एता मु०, ता०, ना० ।

दधिवलयप्रतिष्ठाः । घनोदधिवलयं घनवातवलयप्रतिष्ठम् । घनवातवलयं तनुवातवलयप्रतिष्ठम् ।
तनुवातवलयमाकाशप्रतिष्ठम् । आकाशमात्मप्रतिष्ठं, तस्यैवाधाराधेयत्वात् । त्रीण्यप्येतानि वलयानि
प्रत्येकं विंशतियोजनसहस्रबाहुल्यानि । 'सप्त'ग्रहणं संख्यान्तरनिवृत्त्यर्थम् । सप्त भूमयो नाष्टौ न नव
चेति 'अधोऽधः'वचनं तिर्यक्प्रचयनिवृत्त्यर्थम् ।
§ ३६८. किं ता भूमयो नारकाणां सर्वत्रावासा आहोस्वित्क्वचित्क्वचिदिति तन्निर्धार-
णार्थमाह—
तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि
पञ्च चैव यथाक्रमम् ॥२॥
य सब भूमियाँ घनोदधिवातवलयके आश्रयसे स्थित हैं । घनोदधिवातवलय घनवातवलयके आधार-
से स्थित है। घनवातवलय तनुवातवलयके आश्रयसे स्थित है। तनुवातवलय आकाशके आश्रयसे
स्थित है और आकाश स्वयं अपने आधारसे स्थित है; क्योंकि वह आधार और आधेय दोनों है ।
ये तीनों वातवलय प्रत्येक बीस-बीस हजार योजन मोटे हैं । सूत्रमें 'सप्त' पदका ग्रहण दूसरी
संख्याके निराकरण करनेके लिए किया है। भूमियाँ सात ही हैं, न आठ हैं और न नौ । ये भूमियाँ
तिर्यक् रूपसे अवस्थित नहीं हैं। इस बातको दिखानेके लिए सूत्रमें 'अधोऽधः' यह वचन दिया है।
विशेषार्थ—आकाशके दो भेद हैं—अलोकाकाश और लोकाकाश । लोकाकाश अलोका-
काशके बीचोबीच अवस्थित है । यह अकृत्रिम, अनादिनिधन स्वभावसे निर्मित और छह द्रव्योंसे
व्यास है। यह उत्तर-दक्षिण अधोभागसे लेकर ऊर्ध्वभाग तक विस्तारकी अपेक्षा सर्वत्र सात राजु
है। पूर्व पश्चिम नीचे सात राजु चौड़ा है। फिर दोनों ओरसे घटते-घटते सात राजुकी ऊँचाईपर
एक राजु चौड़ा है। फिर दोनों ओर बढ़ते-बढ़ते साढ़े दस राजुकी ऊँचाईपर पाँच राजु चौड़ा है।
फिर दोनों ओर घटते-घटते चौदह राजुकी ऊँचाईपर एक राजु चौड़ा है। पूर्व पश्चिमकी ओरसे
लोकका आकार कटिपर दोनों हाथ रखकर और पैरोंको फैलाकर खड़े हुए मनुष्यके आकारका
प्रतीत होता है । इससे अधोभाग वेतके आसनके समान, मध्यभाग झालरके समान और ऊर्ध्वभाग
मृदंगके समान दिखाई देता है। इसके तीन भाग हैं—अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक ।
मध्यलोकके बीचोबीच मेरु पर्वत है जो एक लाख चालीस योजन ऊँचा है । उसके नीचेका भाग
अधोलोक, ऊपरका भाग ऊर्ध्वलोक और बराबर रेखामें तिरछा फैला हुआ मध्यलोक है। मध्य-
लोकका तिरछा विस्तार अधिक होनेसे इसे तिर्यग्लोक भी कहते हैं। प्रकृत सूत्रमें अधोलोकका
विचार किया गया है। इसमें सात भूमियाँ हैं जो उत्तरोत्तर नीचे-नीचे हैं पर आपसमें
भिड़कर नहीं हैं। किन्तु एक दूसरी भूमिके बीचमें असंख्य योजनोंका अन्तर है। इन भूमियोंके
नाम सूत्रमें क्रमसे दिये ही हैं। ये इनके गुणनाम हैं । घम्मा, वंशा, मेघा, अंजना, अरिष्टा,
मघवा और माधवी ये इनके रौढिक नाम हैं। पहली पृथिवी एक लाख अस्सी हजार योजन
मोटी है। दूसरी बत्तीस हजार योजन मोटी है, तीसरी अट्ठाईस हजार योजन मोटी है, चौथी
चौबीस हजार योजन मोटी है, पाँचवीं बीस हजार योजन मोटो है, छठी सोलह हजार
योजन मोटी है, और सातवीं आठ हजार योजन मोटी है । ये सातों भूमियाँ घनोदधि, घनवात,
तनुवात और आकाशके आधारसे स्थित हैं। अर्थात् प्रत्येक पृथिवी घनोदधिके आधारसे स्थित है,
घनोदधि घनवातके आधारसे स्थित है, घनवात तनुवातके आधारसे स्थित है, तनुवात आकाशके
आधारसे स्थित है और आकाश अपने आधारसे स्थित है ।
§ ३६८. क्या इन भूमियोंमें सर्वत्र नारकियोंके निवास-स्थान हैं या कहीं-कहीं, इस बातका
निश्चय करनेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
उन भूमियोंमें क्रमसे तीस लाख, पचीस लाख, पन्द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पाँच
कम एक लाख और पाँच नरक हैं ॥२॥

§ ३६९. तासु रत्नप्रभादिषु भूमिषु नरकाण्यनेन संख्यायन्ते यथाक्रमम् । रत्नप्रभायां
त्रिंशन्नरकशतसहस्राणि, शर्कराप्रभायां पञ्चविंशतिर्नरकतसहस्राणि, वालुकाप्रभायां पञ्चदश
नरकशतसहस्राणि, पङ्कप्रभायां दश नरकशतसहस्राणि, धूमप्रभायां त्रीणि नरकशतसहस्राणि,
तमःप्रभायां पञ्चोनमेकं नरकशतसहस्रं, महातमःप्रभायां पञ्च नरकाणि । रत्नप्रभायां नरकप्रस्ता-
रास्त्रयोदश । ततोऽध आ सप्तम्या द्वौ¹ द्वौ नरकप्रस्तारौ² हीनौ । इतरो विशेषो लोकानुयोगतो
वेदितव्यः ।
§ ३७०. अथ तासु भूमिषु नारकाणां कः प्रतिविशेष इत्यत आह—
नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥३॥
§ ३७१. लेश्यादयो व्याख्यातार्थाः । अशुभतरा इति प्रकर्षनिर्देशः तिर्यग्गतिविषयाशुभ-
लेश्याद्यपेक्षया, अधोऽधः स्वगत्यपेक्षया च वेदितव्यः । 'नित्य'शब्द³ आभीक्ष्ण्यवचनः । नित्य-
§ ३६९. उन रत्नप्रभा आदि भूमियोंमें, इस सूत्र-द्वारा क्रमसे नरकोंकी संख्या बतलायी
गयी है । रत्नप्रभामें तीस लाख नरक हैं। शर्कराप्रभामें पचीस लाख नरक हैं । वालुकाप्रभामें
पन्द्रह लाख नरक हैं। पंकप्रभामें दश लाख नरक हैं। धूमप्रभामें तीन लाख नरक हैं। तमःप्रभामें
पाँच कम एक लाख नरक हैं और महातमःप्रभामें पाँच नरक हैं। रत्नप्रभामें तेरह नरक पटल हैं ।
इससे आगे सातवीं भूमि तक दो-दो नरक पटल कम हैं। इसके अतिरिक्त और विशेषता लोकानु-
योगसे जान लेनी चाहिए।
विशेषाथ—पहले सात पृथिवियोंका निर्देश किया ही है। उनमेंसे पहली पृथिवीके तीन
भाग हैं—खरभाग, पंकभाग और अब्बहुल भाग । खर भाग सबसे ऊपर है। इसमें रत्नोंकी
बहुतायत है और यह सोलह हजार योजन मोटा है। दूसरा पंकभाग है, इसकी मोटाई चौरासी
हजार योजन है। तथा तीसरा अब्बहुल भाग है। इसकी मोटाई अस्सी हजार योजन है।
नारकियोंके रहनेके आवासको नरक कहते हैं। रत्नप्रभा भूमिके प्रथम भाग और दूसरे भाग
में नरक नहीं हैं। तीसरे भागमें हैं। इस प्रकार प्रथम भूमिके तीसरे भागकी और शेष छह भूमियों
को जितनी-जितनी मोटाई बतलायी है उसमें से ऊपर और नीचे एक-एक हजार योजन भूमिको
छोड़कर सातों भूमियोंके बाकीके मध्य भागमें नरक हैं। इनका आकार विविध प्रकारका है। कोई
गोल हैं, कोई त्रिकोण हैं, कोई चौकोण हैं और कोई अनिश्चित आकारवाले हैं। ये सब नरकपटल
क्रमसे अवस्थित हैं। जिस प्रकार पत्थर या मिट्टीके एक थरपर दूसरा थर अवस्थित होता है उसी
प्रकार ये पटल हैं। पहली भूमिमें ये पटल तेरह हैं और आगेकी भूमियोंमें दो-दो पटल कम होते
गये हैं। एक पटल दूसरे पटलसे सटा हुआ है। इनमें नरक हैं। नरक जमीनके भीतर कुएँके
समान पोलका नाम है। यह ऊपर, नीचे, चारों ओर जमीनसे घिरी रहती है। इन्हीं नरकोंमें
नारकी जीव अपनी आयुके अन्तिम समय तक रहते हैं और वहां नाना प्रकारके दुःख भोगते हैं।
§ ३७०. उन भूमियोंमें रहनेवाले नारकियोंमें क्या विशेषता है इस बातको बतलानेके लिए
अब आगे का सूत्र कहते हैं—
नारकी निरन्तर अशुभतर लेश्या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रियावाले हैं ॥३॥
§ ३७१. लेश्यादिकका पहले व्याख्यान कर आये हैं। 'अशुभतर' इस पद के द्वारा तिर्यंचगति-
में प्राप्त होनेवाली अशुभ लेश्या आदिककी अपेक्षा और नीचे-नीचे अपनी गतिकी अपेक्षा लेश्यादिक-
१. –सप्तम्या द्वं द्वं नरक-आ० दि० १, दि० २ । २. -प्रस्तारा हीनाः । इतरो आ०, दि० १, दि० २ ।
२. लोकनियोगतो दि० १, दि० २। ३. 'अर्थ खलु नित्यशब्दो नावश्यं कूटस्थेष्वविचालिषु भावेषु वर्तते ।
किं तर्हि ? आभीक्ष्ण्येऽपि वर्तते । तद्यथा-नित्यप्रहसितो नित्यप्रजल्पित इति ।' पा० म० भा०, पृ० ५७ ।

१५० सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३ § ३७१ -
मशुभतरा लेश्यादयो येषां ते नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रिया नारकाः । प्रथमा-
द्वितीययोः कापोती लेश्या, तृतीयायामुपरिष्टात्कापोती अधो नीला, चतुर्थ्यां नीला, पञ्चम्यामुपरि
नीला अधः कृष्णा, षष्ठ्यां कृष्णा, सप्तम्यां परमकृष्णा । स्वायुः१प्रमाणावधृता२ द्रव्यलेश्या उक्ताः ।
भावलेश्यास्तु अन्तर्मुहूर्तपरिवर्तिन्यः । परिणामाः स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दाः क्षेत्रविशेषनिमित्तवशादति-
दुःखहेतवोऽशुभतराः । देहाश्च तेषामशुभनामकर्मोदयादत्यन्ताशुभतरा विकृताकृतयो हुण्डसंस्थाना४
दुर्दर्शनाः । तेषामुत्सेधः प्रथमायां सप्त धनूंषि त्रयो हस्ताः षडङ्गुलयः । अधोऽधो—द्विगुणद्विगुणं ५
उत्सेधः । अभ्यन्तरासद्वेद्योदये सति अनादिपारिणामिकशीतोष्णबाह्यनिमित्तजनिता६ अतितीव्रा
वेदना भवन्ति नारकाणाम् । प्रथमाद्वितीयातृतीयाचतुर्थीषु उष्णवेदनान्येव नरकाणि । पञ्चम्यामू-
परि उष्णवेदने द्वे नरकशतसहस्रे । अधः शीतवेदनेमेकं७ शतसहस्रम् । षष्ठीसप्तम्योः शीतवेदनान्येव ।
शुभं८ विकरिष्याम इति अशुभतरमेव विकुर्वन्ति, सुखहेतूनुत्पादयाम इति दुःखहेतूनेवोत्पादयन्ति ।
त एते भावा अधोऽधोऽशुभतरा वेदितव्याः ।
की प्रकर्षता बतलायी गयी है। अर्थात् तिर्यंचोंमें जो लेश्यादिक हैं उनसे प्रथम नरकके नारकियोंके
अधिक अशुभ हैं आदि । नित्य शब्द आभीक्ष्ण्य अर्थात् निरन्तरवाची है । तात्पर्य यह है कि नार-
कियोंकी लेश्या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रिया निरन्तर अशुभ होती है। यथा, प्रथम और
दूसरी पृथिवीमें कापोत लेश्या है। तीसरी पृथिवीमें ऊपरके भागमें कापोत लेश्या है और नीचेके
भागमें नील लेश्या है। चौथी पृथिवीमें नील लेश्या है। पांचवीं पृथिवीमें ऊपरके भागमें नील
लेश्या है और नीचेके भागमें कृष्ण लेश्या है। छठी पृथिवीमें कृष्ण लेश्या है। और सातवीं पृथिवी
में परम कृष्ण लेश्या है। द्रव्य लेश्याएँ अपनी आयु तक एक सी कही गयी हैं। किन्तु भावलेश्याएँ
अन्तर्मुहूर्तमें बदलती रहती हैं। परिणामसे यहाँ स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द लिये गये हैं।
ये क्षेत्रविशेषके निमित्तसे अत्यन्त दुःखके कारण अशुभतर हैं। नारकियोंके शरीर अशुभ नामकर्मके
उदयसे होनेके कारण उत्तरोत्तर अशुभ हैं। उनकी विकृत आकृति है, हुंड संस्थान है और देखनेमें
बुरे लगते हैं। उनकी ऊँचाई प्रथम पृथिवीमें सात धनुष, तीन हाथ और छह अंगुल है। तथा
नीचे-नीचे प्रत्येक पृथिवीमें वह दूनी-दूनी है। नारकियोंके अभ्यन्तर कारण असाता वेदनीयका
उदय रहते हुए अनादिकालीन शीत और उष्णरूप बाह्य निमित्तसे उत्पन्न हुई अति तीव्र वेदना
होती है। पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी पृथिवीमें मात्र उष्ण वेदनावाले नरक हैं। पाँचवीं
पृथिवीमें ऊपरके दो लाख नरक उष्ण वेदनावाले हैं। और नीचेके एक लाख नरक शीत वेदनावाले
हैं। तथा छठी और सातवीं पृथिवीके नरक शीत वेदनावाले ही हैं। नारकी 'शुभ विक्रिया करेंगे'
ऐसा विचार करते हैं पर उत्तरोत्तर अशुभ विक्रियाको ही करते हैं। 'सुखकर हेतुओंको उत्पन्न
करेंगे' ऐसा विचार करते हैं परन्तु वे दुःखकर हेतुओंको ही उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार ये भाव
नीचे-नीचे अशुभतर जानने चाहिए।
विशेषार्थ—यहाँ टीकामें लेश्याके दो भेद करके भावलेश्या अन्तर्मुहूर्तमें बदलती रहती है
यह कहा है। सो इसका तात्पर्य यह है कि जहाँ जो भावलेश्या कही है उसमें परिवर्तन नहीं होता।
मात्र उसमें योग और कषायके अनुसार तरतमभाव होता रहता है; क्योंकि प्रत्येक नारकीके वही
योग और वही कषाय रहनी चाहिए ऐसा नियम नहीं है। किन्तु अपने-अपने जघन्य, मध्यम या
उत्कृष्ट कालके अनुसार योग और कषायका परिवर्तन नियमसे होता है। यतः कषायानुरंजित
१. स्वायुधः प्रभा-मु०, ता०, ना० । २.-माणेऽववृता आ०, दि० १, दि० २। ३. नामोदया-आ०, दि०१,
दि० २ । ४. संस्थापना । तेषां० आ०, दि० १, दि० २ । ५. द्विगुणो द्विगुण आ०, दि० १, दि० २ । ६.
जनिताः सुतीव्रा मु०, दि० १, दि० २, आ०, ता० । ७. -वेदनानामेकं आ०, दि० १, दि० २ । ८. शुभं
करि-मु०, आ०, दि० १, दि० २ ।

  • ३५५ § ३७५ ] तृतीयोऽध्यायः १५१
    § ३७२. किमेतेषां नारकाणां शीतोष्णजनितमेव दुःखमुतान्यथापि भवतीत्यत आह—
    परस्परोदीरितदुःखाः ॥४॥
    § ३७३. कथं परस्परोदीरितदुःखत्वम् । नारकाः¹ भवप्रत्ययेनावधिना मिथ्यादर्शनोदयाद्वि-
    भङ्गव्यपदेशभाजा च दूरादेव दुःखहेतूनवगम्योत्पन्नदुःखाः प्रत्यासत्तौ परस्परालोकनाच्च प्रज्वलित-
    कोपाग्नयः पूर्वभवानुस्मरणाच्चातितीव्रानुबद्धवैराश्च श्वशृगालादिवत्स्वाभिघाते प्रवर्तमानाः ५
    स्वविक्रियाकृतासिवासीपरशुभिण्डिमालशक्तितोमरकुन्तायोधनादिभिरायुधैः स्वकरचरणदशनैश्च
    छेदनभेदनतक्षणदंशनादिभिः परस्परस्यातितीव्रं दुःखमुत्पादयन्ति ।
    § ३७४. किमेतावानेव दुःखोत्पत्तिकारणप्रकार उतान्योऽपि कश्चिदस्तीत्यत आह—
    संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः ॥५॥
    § ३७५. देवगतिनामकर्मविकल्पस्यासुरत्वसंवर्तकस्य कर्मण उदयादस्यन्ति परानित्यसुराः । १०
    पूर्वजन्मनि² भावितेनातितीव्रेण संक्लेशपरिणामेन यदुपार्जितं पापकर्म तस्योदयात्सततं क्लिष्टाः³
    संक्लिष्टाः, संक्लिष्टा असुराः, संक्लिष्टासुराः । संक्लिष्टा इति विशेषणान्न सर्वे असुरा नारकाणां
    दुःखमुत्पादयन्ति । किं तर्हि । अम्बावरीषादय एव केचनेति । अवधिप्रदर्शनार्थं 'प्राक्चतुर्थ्याः' इति
    योगप्रवृत्तिका नाम लेश्या है अतः योग और कषायके बदलनेसे वह भी बदल जाती है । मात्र जहाँ
    कापोत लेश्याका जघन्य अंश कहां है वहाँ वही रहता है वह बदलकर कापोत लेश्याका मध्यम १५
    और उत्कृष्ट अंश नहीं होता या जहाँ परम कृष्ण लेश्या कही है वहाँ वही रहती है वह बदल कर
    अन्य लेश्या नहीं होती । शेष कथन सुगम है ।
    § ३७२. क्या इन नारकियोंके शीतोष्णजनित ही दुःख है या दूसरे प्रकारका भी दुःख है, इस
    बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    तथा वे परस्पर उत्पन्न किये गये दुःखवाले होते हैं ॥ ४ ॥ २०
    § ३७३. शंका—नारकी परस्पर एक-दूसरेको कैसे दुःख उत्पन्न करते हैं ? समाधान—नार-
    कियोंके भवप्रत्यय अवधिज्ञान है जिसे मिथ्यादर्शनके उदयसे विभंगज्ञान कहते हैं । इस ज्ञानके कारण
    दूरसे ही दुःखके कारणोंको जानकर उनको दुःख उत्पन्न हो जाता है और समीपमें आनेपर एक-
    दूसरेको देखनेसे उनकी क्रोधाग्नि भभक उठती है । तथा पूर्वभवका स्मरण होनेसे उनकी वैरकी गांठ
    और दृढ़तर हो जाती है । जिससे वे कुत्ता और गीदड़के समान एक-दूसरे का घात करनेके लिए २५
    प्रवृत्त होते हैं। वे अपनी विक्रियासे तलवार, बसूला, फरसा, हाथसे चलानेका तीर, बर्छी, तोमर
    नामका अस्त्र विशेष, बरछा और हथोड़ा आदि अस्त्र-शस्त्र बनाकर उनसे तथा अपने हाथ, पांव
    और दांतोंसे छेदना, भेदना, छीलना और काटना आदिके द्वारा परस्पर अतितीव्र दुःखको उत्पन्न
    करते हैं ।
    § ३७४. जिन कारणोंसे दुःख उत्पन्न होता है वे इतने ही हैं या और भी हैं ? अब इस बात- ३०
    का ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    और चौथी भूमिसे पहले तक वे संक्लिष्ट असुरोंके द्वारा उत्पन्न किये गये दुःखवाले भी
    होते हैं ॥५॥
    § ३७५. देवगति नामक नामकर्मके भेदोंमें एक असुर नामकर्म है जिसके उदयसे 'परान्
    अस्यन्ति' जो दूसरोंको फेंकते हैं उन्हें असुर कहते हैं। पूर्व जन्ममें किये गये अतितीव्र संक्लेशरूप ३५
    परिणामोंसे इन्होंने जो पापकर्म उपार्जित किया उसके उदयसे ये निरन्तर क्लिष्ट रहते हैं इसलिए
    संक्लिष्ट असुर कहलाते हैं। सूत्रमें यद्यपि असुरोंको संक्लिष्ट विशेषण दिया है पर इसका यह अर्थ
    १. नारकाणाम् ? भव-मु०, ता०, ना० । २. जन्मनि संभावि-मु० । ३. क्लिष्टाः संक्लिष्टा असुराः मु० ।

१५२ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।६ § ३७६ –
विशेषणम्। उपरि तिसृषु पृथिवीषु संक्लिष्टासुरा बाधाहेतवो नातः परमिति प्रदर्शनार्थम्। ‘च’-
शब्दः पूर्वोक्तदुःखहेतुसमुच्चयार्थः। सुतप्तायोरसपायननिष्ठप्तायस्तम्भालिङ्गनकूटशाल्मल्यारोहणाव-
तरणायोधनाभिघातवासीक्षुरतक्षणक्षारतप्ततैलावसेचनायःकुम्भीपाकाम्बरीषभर्जनवैतरणीमज्जन -
यन्त्रनिष्पीडनादिभिर्नारकाणां दुःखमुत्पादयन्ति। एवं छेदनभेदनादिभिः शकलीकृतमूर्तीनामपि तेषां
न मरणमकाले भवति। कुतः। अनपवर्त्यायुष्कत्वात् १।
§ ३७६. यद्येवं, तदेव तावदुच्यतां नारकाणामायुःपरिमाणमित्यत आह—
तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां
परा स्थितिः ॥६॥
§ ३७७. यथाक्रममित्यनुवर्तते । तेषु नरकेषु भूमिक्रमेण यथासंख्यमेकादयः स्थितयोऽभि-
संबध्यन्ते। रत्नप्रभायामुत्कृष्टा स्थितिरेकसागरोपमा। शर्कराप्रभायां त्रिसागरोपमा। वालुका-
प्रभायां सप्तसागरोपमा। पङ्कप्रभायां दशसागरोपमा। धूमप्रभायां सप्तदशसागरोपमा। तमःप्रभायां
नहीं कि सब असुर नारकियोंको दुःख उत्पन्न कराते हैं। किन्तु अम्बावरीष आदि कुछ असुर ही
दुःख उत्पन्न कराते हैं। मर्यादाके दिखलानेके लिए सूत्रमें ‘प्राक् चतुर्थ्याः' यह विशेषण दिया है।
इससे यह दिखलाया है कि ऊपरकी तीन पृथिवियोंमें ही संक्लिष्ट असुर बाधाके कारण हैं इससे
आगे नहीं। सूत्रमें ‘च’ शब्द पूर्वोक्त दुःखके कारणोंका समुच्चय करनेके लिए दिया है। परस्पर
खूब तपाया हुआ लोहेका रस पिलाना, अत्यन्त तपाये गये लौहस्तम्भका आलिंगन, कूट और
सेमरके वृक्षपर चढ़ाना-उतारना, लोहेके घनसे मारना, वसूला और छुरासे तरासना, तपाये गये
खारे तेलसे सींचना, तेलकी कढ़ाईमें पकाना, भाड़में भूंजना, वैतरणीमें डुबाना, यन्त्रसे पेलना
आदिके द्वारा नारकियोंके परस्पर दुःख उत्पन्न कराते हैं। इस प्रकार छेदन, भेदन आदिके द्वारा
उनका शरीर खण्ड-खण्ड हो जाता है तो भी उनका अकालमें मरण नहीं होता है, क्योंकि उनको
आयु घटती नहीं।
विशेषार्थ—नारक जीव स्वभावसे क्रूर स्वभाववाले होते हैं। एक-दूसरेको देखते ही उनका
क्रोध भभक उठता है और वे एक-दूसरेको मारने काटने लगते हैं। उनका शरीर वैक्रियिक होता है
इसलिए उससे वे नाना प्रकारके आयुध आदिका आकार धारण कर उनसे दूसरे नारकियोंको पीड़ा
पहुँचाते हैं। तीसरे नरक तक देवोंका भी गमन होता है, इसलिए ये भी कुतूहल वश उन्हें आपसमें
भिड़ा देते हैं और उनका घात-प्रत्याघात देखकर मजा लूटते हैं। पर यह काम सब देव नहीं करते
किन्तु अम्बावरीष आदि जातिके कुछ ही असुर कुमार देव करते हैं। इतना सब होते हुए भी उन
नारकियोंका अकाल मरण नहीं होता इतना यहाँ विशेष जानना चाहिए।
§ ३७६. यदि ऐसा है तो यह कहिए कि उन नारकियोंकी कितनी आयु है ? इसी बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन नरकोंमें जीवोंकी उत्कृष्ट स्थिति क्रमसे एक, तीन, सात, दस, सत्रह, बाईस और
तैंतीस सागर है ॥६॥
§ ३७७. इस सूत्रमें ‘यथाक्रमम्’ इस पदकी अनुवृत्ति होती है। जिससे उन नरकोंमें भूमिके क्रमसे
एक सागर आदि स्थितियोंका क्रमसे सम्बन्ध हो जाता है। रत्नप्रभामें एक सागर उत्कृष्ट स्थिति
है। शर्कराप्रभामें तीन सागर उत्कृष्ट स्थिति है। वालुकाप्रभामें सात सागर उत्कृष्ट स्थिति है।
पंकप्रभामें दस सागर उत्कृष्ट स्थिति है। धूमप्रभामें सत्रह सागर उत्कृष्ट स्थिति है। तमःप्रभामें
१. –युषत्वात् आ० दि० १, दि० २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

द्वाविंशतिसागरोपमा । महातमःप्रभायां त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा इति । परा उत्कृष्टेत्यर्थः । 'सत्त्वानाम्'
इति वचनं भूमिनिवृत्त्यर्थम् । भूमिषु सत्त्वानामिदं स्थितिः, न भूमीनामिति ।
§ ३७८. उक्तः सप्तभूमिविस्तीर्णोऽधोलोकः । इदानीं तिर्यग्लोको वक्तव्यः । कथं पुनस्तिर्य-
ग्लोकः । यतोऽसंख्येयाः स्वयंभूरमणपर्यन्तास्तिर्यक्प्रचयविशेषेणावस्थिता द्वीपसमुद्रास्ततस्तिर्यग्लोक
इति । के¹ पुनस्तिर्यग्व्यवस्थिता इत्यत आह—
जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥
§ ३७९. जम्बूद्वीपाद‌यो द्वीपाः । लवणोदादयः समुद्राः । यानि लोके शुभानि नामानि
तन्नामानस्ते । तद्यथा—जम्बूद्वीपो द्वीपः । लवणोदः समुद्रः । घातकीखण्डो द्वीपः । कालोदः समुद्रः ।
पुष्करवरो द्वीपः । पुष्करवरः समुद्रः । ' वारुणीवरो द्वीपः । वारुणीवरः समुद्रः । क्षीरवरो द्वीपः ।
क्षीरवरः समुद्रः । घृतवरो द्वीपः । घृतवरः समुद्रः । इक्षुवरो द्वीपः । इक्षुवरः समुद्रः । नन्दीश्वरवरो
द्वीपः । नन्दीश्वरवरः समुद्रः । ' अरुणवरो द्वीपः । अरुणवरः समुद्रः । इत्येवमसंख्येया द्वीपसमुद्राः
स्वयंभूरमणपर्यन्ता वेदितव्याः ।
§ ३८०. अमीषां विष्कम्भसंनिवेशसंस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः ॥८॥
§ ३८१. द्विर्द्विरिति ²वीप्साभ्यावृत्तिवचनं विष्कम्भद्विगुणत्वव्याप्त्यर्थम् । आद्यस्य द्वीपस्य
यो विष्कम्भः तद्द्विगुणविष्कम्भो लवणजलधिः । तद्द्विगुणविष्कम्भो द्वितीयो द्वीपः । तद्द्विगुण-
बाईस सागर उत्कृष्ट स्थिति है और महातमःप्रभामें तैंतीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । 'परा' शब्द-
का अर्थ 'उत्कृष्ट' है । और 'सत्त्वानाम्' पद भूमियोंके निराकरण करनेके लिए दिया है । अभिप्राय
यह है कि भूमियोंमें जीवोंकी यह स्थिति है भूमियोंकी नहीं ।
§ ३७८. सात भूमियोंमें बंटे हुए अधोलोकका वर्णन किया । अब तिर्यग्लोकका कथन
करना चाहिए । शंका—तिर्यग्लोक यह संज्ञा क्यों है ? समाधान—चूँकि स्वयम्भूरमण समुद्र पर्यन्त
असंख्यात द्वीप-समुद्र तिर्यक् प्रचयविशेषरूपसे अवस्थित हैं इसलिए तिर्यग्लोक संज्ञा है । वे तिर्यक्
रूपसे अवस्थित क्या हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जम्बूद्वीप आदि शुभ नामवाले द्वीप और लवणोद आदि शुभ नामवाले समुद्र हैं ॥७॥
§ ३७९. जम्बूद्वीप आदिक द्वीप हैं और लवणोद आदिक समुद्र हैं। तात्पर्य यह है कि
लोकमें जितने शुभ नाम हैं उन नामवाले वे द्वीप समुद्र हैं। यथा-जम्बूद्वीप नामक द्वीप, लवणोद
समुद्र, घातकीखण्ड द्वीप, कालोद समुद्र, पुष्करवर द्वीप, पुष्करवर समुद्र, वारुणोवर द्वीप, वारुणी-
वर समुद्र, क्षीरवर द्वीप, क्षीरवर समुद्र, घृतवर द्वीप, घृतवर समुद्र, इक्षुवर द्वीप, इक्षुवर समुद्र,
नन्दीश्वरवर द्वीप, नन्दीश्वरवर समुद्र, अरुणवर द्वीप और अरुणवर समुद्र, इस प्रकार स्वयंभूरमण
पर्यन्त असंख्यात द्वीप-समुद्र जानने चाहिए ।
§ ३८०. अब इन द्वीप-समुद्रोंके विस्तार, रचना और आकारविशेषका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
वे सभी द्वीप और समुद्र दूने-दूने व्यासवाले, पूर्व-पूर्व द्वीप और समुद्रको वेष्टित करनेवाले
और चूड़ीके आकारवाले हैं ॥ ८ ॥
§ ३८१. द्वीप-समुद्रोंका विस्तार दूना-दूना है इस बातको दिखलानेके लिए सूत्रमें 'द्विर्द्विः'
इस प्रकार वीप्सा अर्थमें अभ्यावृत्ति वचन है । प्रथम द्वीपका जो विस्तार है लवणसमुद्रका विस्तार
१. के पुनस्ते तिर्य-आ०, दि० १ । २. वीप्सायां वृत्तिवचनं आ०, दि० १, दि० २, मु० ।
२०

विष्कम्भो द्वितीयो जलधिरिति । द्विद्विविष्कम्भो येषां ते द्विद्विविष्कम्भाः । पूर्वपूर्वपरिक्षेपिवचनं
ग्रामनगरादिवद्विनिवेशो मा विज्ञायीति । वलयाकृतिवचनं चतुरस्रादिसंस्थानान्तरनिवृत्त्यर्थम् ।
§ ३८२. अत्राह, जम्बूद्वीपस्य प्रदेशसंस्थानविष्कम्भा वक्तव्यास्तन्मूलत्वादितरविष्कम्भा-
दिविज्ञानस्येत्युच्यते—
तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥६॥
§ ३८३. तेषां मध्ये तन्मध्ये । केषाम् । पूर्वोक्तानां द्वीपसमुद्राणाम् । नाभिरिव नाभिः२ ।
मेरुर्नाभिर्यस्य स मेरुनाभिः । वृत्त आदित्यमण्डलोपमानः । शतानां सहस्रं शतसहस्रम् । योजनानां
शतसहस्रं, योजनशतसहस्रम् । योजनशतसहस्रं विष्कम्भो यस्य सोऽयं योजनशतसहस्रविष्कम्भः ।
कोऽसौ । जम्बूद्वीपः । कथं जम्बूद्वीपः । जम्बूवृक्षोपलक्षितत्वात् । उत्तरकुरूणां मध्ये जम्बूवृक्षोऽना-
दिनिधनः पृथिवीपरिणामो ३ऽकृत्रिमः सपरिवारस्तदुपलक्षितोऽयं द्वीपः ।
उससे दूना है । तथा दूसरे द्वीपका विस्तार इससे दूना है और दूसरे समुद्रका इससे दूना है । इस
प्रकार उत्तरोत्तर दूना-दूना विस्तार है । तात्पर्य यह है कि इन द्वीप-समुद्रोंका विस्तार दूना-दूना
है इसलिए सूत्रमें उन्हें दूने-दूने विस्तारवाला कहा है । ग्राम और नगरादिकके समान इन द्वीप-
समुद्रोंकी रचना न समझी जाये इस बातके बतलानेके लिए सूत्रमें ‘पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणः’ यह वचन
दिया है । अर्थात् वे द्वीप और समुद्र उत्तरोत्तर एक दूसरेको घेरे हुए हैं । सूत्रमें जो ‘वलयाकृतयः’
वचन दिया है वह चौकोर आदि आकारोंके निराकरण करनेके लिए दिया है ।
§ ३८२. अब पहले जम्बू द्वीपका आकार और विस्तार कहना चाहिए, क्योंकि दूसरे द्वीप
समुद्रोंका विस्तार आदि तन्मूलक है, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन सबके बीचमें गोल और एक लाख योजन विष्कम्भवाला जम्बूद्वीप है । जिसके मध्य-
में मेरु पर्वत है ॥ ९ ॥
§ ३८३. ‘तन्मध्ये’ पदका अर्थ है ‘उनके बीचमें’ । शंका—किनके बीचमें ? समाधान—
पूर्वोक्त द्वीप समुद्रोंके बीचमें । नाभिस्थानीय होनेसे नाभि कहा है । जिसका अर्थ मध्य है । अभि-
प्राय यह है कि जिसके मध्यमें मेरु पर्वत है, जो सूर्यके मण्डलके समान गोल है और जिसका एक
लाख योजन विस्तार है ऐसा यह जम्बूद्वीप है । शंका—इसे जम्बूद्वीप क्यों कहते हैं ? समाधान—
जम्बूवृक्षसे उपलक्षित होनेके कारण इसे जम्बूद्वीप कहते हैं । उत्तरकुरुमें अनादिनिधन, पृथिवी
से बना हुआ, अकृत्रिम और परिवार वृक्षोंसे युक्त जम्बूवृक्ष है जिसके कारण यह जम्बूद्वीप
कहलाता है ।
विशेषार्थ—अधोलोकका विवेचन कर आये हैं इसके बाद मध्यलोक है । यह रत्नप्रभा
पृथिवीके ऊपरी भागपर अवस्थित है । इसमें गोल आकारको लिये हुए और एकके बाद एकको
घेरे हुए असंख्यात द्वीप और समुद्र हैं । इन सबके बीचमें जम्बूद्वीप है । इसके बीचमें और दूसरा
द्वीप समुद्र नहीं है । यद्यपि गोल तो सब द्वीप और समुद्र हैं पर वे सब चूड़ीके समान गोल हैं और
यह थालीके समान गोल है । इसका व्यास एक लाख योजन है । इसके ठीक बीचमें मेरु पर्वत है ।
यह एक लाख चालीस योजन ऊँचा है । इसमेंसे एक हजार योजन जमीनमें है । चालीस योजनकी
आखीरमें चोटी है और शेष निन्यानबे हजार योजनका समतलसे चूलिका तक है । प्रारम्भमें
जमीनपर मेरु पर्वतका व्यास दस हजार योजन है । ऊपर क्रमसे घटता गया है । जिस हिसाबसे
ऊपर घटा है उसी हिसाबसे जमीनमें उसका व्यास बढ़ा है । मेरु पर्वतके तीन काण्ड हैं । पहला
काण्ड जमीनसे पाँच सौ योजनका, दूसरा साढ़े बासठ हजार योजनका और तीसरा छत्तीस हजार
१. पूर्वोक्तद्वीप—आ०, दि० १, दि० २, मु० । २. नाभिर्मध्यम । मेरु-आ०, दि० १, दि० २, मु० ।
३. परिणामोऽकृ-मु० ।

  • ३।१० § ३८६ ] तृतीयोऽध्यायः १५५
    § ३८४. तत्र जम्बूद्वीपे षड्भिः कुलपर्वतैर्विभक्तानि सप्त क्षेत्राणि कानि तानीत्यत आह—
    भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि १॥१०॥
    § ३८५. भरतादयः संज्ञा अनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्ताः । तत्र भरतवर्षः क्व संनिविष्टः ।
    दक्षिणदिग्भागे हिमवतोऽद्रेस्त्रयाणां २ समुद्राणां मध्ये आरोपितचापाकारो भरतवर्षः । विजयार्द्धेन
    गङ्गासिन्धुभ्यां च विभक्तः ३ स षट्खण्डः । क्षुद्रहिमवन्तमुत्तरेण दक्षिणेन महाहिमवन्तं पूर्वापर- ५
    समुद्रयोर्मध्ये हैमवतवर्षः । निषधस्य दक्षिणतो महाहिमवत उत्तरतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तराले
    हरिवर्षः । निषधस्योत्तरान्नीलतो दक्षिणतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तरे विदेहस्य संनिवेशो द्रष्टव्यः ।
    नीलत ४ उत्तरात् ५ (द्) रुक्मिणो दक्षिणात् पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये रम्यकवर्षः । रुक्मिण उत्तराच्छिख-
    रिणो दक्षिणात्पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये संनिवेशी ६ हैरण्यवतवर्षः । शिखरिण उत्तरतस्त्रयाणां समुद्राणां
    मध्ये ऐरावतवर्षः। विजयार्द्धेन रक्तारक्तोदाभ्यां च विभक्तः ७ स षट्खण्डः । १०
    § ३८६. षट् कुलपर्वता इत्युक्तं के पुनस्ते कथं वा व्यवस्थिता इत्यत आह—
    योजनका है। प्रत्येक काण्डके अन्तमें एक-एक कटनी है। जिसका एक ओरका व्यास पाँचसौ
    योजन है। अन्तिम कटनीका व्यास मात्र छह योजन कम है। एक जमीनपर और तीन इन तीन
    कटनियोंपर इस प्रकार यह चार वनोंसे सुशोभित है। इनके क्रमसे भद्रसाल, नन्दन, सौमनस और
    पाण्डुक ये नाम हैं। पहली और दूसरी कटनीके बाद मेरु पर्वत सीधा गया है फिर क्रमसे घटने १५
    लगता है। इसके चारों वनोंमें चारों दिशाओंमें एक-एक वनमें चार-चार इस हिसाबसे सोलह
    चैत्यालय हैं। पाण्डुक वनमें चारों दिशाओंमें चार पाण्डुक शिलाएँ हैं। जिनपर उस-उस दिशाके
    क्षेत्रोंमें उत्पन्न हुए तीर्थंकरोंका अभिषेक होता है। इसका रंग पीला है।
    § ३८४. इस जम्बूद्वीप में छह कुलपर्वतोंसे विभाजित होकर जो सात क्षेत्र हैं वे कौन-से हैं?
    इसी बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
    भरतवर्ष, हैमवतवर्ष, हरिवर्ष, विदेहवर्ष, रम्यकवर्ष, हैरण्यवतवर्ष और ऐरावतवर्ष ये
    सात क्षेत्र हैं ॥ १० ॥
    § ३८५. क्षेत्रोंकी भरत आदि संज्ञाएँ अनादि कालसे चली आ रही हैं और अनिमित्त हैं।
    इनमें-से भरत क्षेत्र कहाँ स्थित है ? हिमवान् पर्वतके दक्षिणमें और तीन समुद्रोंके बीचमें चढ़े हुए
    धनुषके आकारवाला भरत क्षेत्र है जो विजयार्ध और गंगा सिन्धुसे विभाजित होकर छह खण्डोंमें २५
    बँटा हुआ है। क्षुद्र हिमवान्के उत्तरमें और महाहिमवान्के दक्षिणमें तथा पूर्व पश्चिम समुद्रके बीच-
    में हैमवत क्षेत्र है। निषधके दक्षिणमें और महाहिमवान्के उत्तरमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके
    बीचमें हरिक्षेत्र है। निषधके उत्तरमें और नीलके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीचमें
    विदेह क्षेत्रकी रचना है। नीलके उत्तरमें और रुक्मीके दक्षिणमें तथा पूर्व पश्चिम समुद्रके बीचमें
    रम्यक क्षेत्र है। रुक्मीके उत्तरमें और शिखरीके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीचमें ३०
    हैरण्यवत क्षेत्र है। शिखरीके उत्तरमें और तीन समुद्रोंके बीचमें ऐरावत क्षेत्र है। जो विजयार्ध
    और रक्ता रक्तोदासे विभाजित होकर छह खण्डोंमें बँटा हुआ है।
    § ३८६. कुलपर्वत छह हैं यह पहले कह आये हैं परन्तु वे कौन हैं और कहाँ स्थित हैं यह
    बतलाना शेष है अतः आगेका सूत्र कहते हैं—
    १. क्षेत्राणि ।।१०।। भिन्न-भिन्नानि भरता-। आ० । २. -याणां च समु-मु० । ३. विभक्तः षट्-मु० । ४. ३५
    नीलवत उत्त-आ०, दि० १, दि० २ । ५. उत्तरः रुक्मिणो दक्षिणः मु० । ६. संनिवेशो हैर-मु० ।
    ७. -विभक्तः षट्- मु० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri