सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- २५० § ३५९ ] द्वितीयोऽध्यायः १४३
अशबलस्य निरवद्यस्य कार्यत्वाद्विशुद्धमित्युच्यते तन्तूनां कार्पासव्यपदेशवत् । उभयतो व्याघाता-
भावादव्याघाति । न ह्याहारकशरीरेणान्यस्य व्याघातः । नाप्यन्येनाहारकस्येति । तस्य प्रयोजन-
समुच्चयार्थः 'च'शब्दः क्रियते । तद्यथा—कदाचिल्लब्धिविशेषसद्भावज्ञापनार्थं कदाचित्सूक्ष्म-
पदार्थावधारणार्थं संयमपरिपालनार्थं च । आहारकमिति प्रागुक्तस्य प्रत्याम्नायः । यदाहारकशरीरं
निर्वर्तयितुमारभते तदा प्रमत्तो भवतीति 'प्रमत्तसंयतस्य' इत्युच्यते । इष्टतोऽवधारणार्थं 'एव'कारो- ५
पादानम् । यथैवं विज्ञायेत प्रमत्तसंयतस्यैवाहारकं नान्यस्येति । मैवं विज्ञायि प्रमत्तसंयतस्याहार-
कमेवेति । मा भूदौदारिकादिनिवृत्तिरिति ।
§ ३५८. एवं विभक्तानि शरीराणि बिभ्रतां संसारिणां प्रतिगति किं त्रिलिङ्गसंनिधानं
उत लिङ्गनियमः कश्चिदस्तीत्यत आह—
नारकसंमूर्च्छिनो नपुंसकानि ॥५०॥ १०
§ ३५९. नरकाणि वक्ष्यन्ते । नरकेषु भवा नारकाः । संमूर्छनं संमूर्च्छः स येषामस्ति१ ते
संमूर्च्छिनः। नारकाश्च संमूर्च्छिनश्च नारकसंमूर्च्छिनः । चारित्रमोहविकल्पनोकषायभेदस्य नपुंसक-
वेदस्याशुभनाम्नश्चोदयान्न स्त्रियो न पुमांस इति नपुंसकानि भवन्ति । नारकसंमूर्च्छिनो नपुंस-
कान्येवेति नियमः । तत्र हि स्त्रीपुंसविषयमनोज्ञशब्दगन्धरूपरसस्पर्शसंबन्धनिमित्ता स्वल्पापि
सुखमात्रा नास्ति । १५
अर्थात् पुण्यकर्मका कार्य होनेसे आहारक शरीरको भी विशुद्ध कहते हैं। यहाँ कार्यमें कारणका
उपचार है। जैसे तन्तुओंमें कपासका उपचार करके तन्तुओंको कपास कहते हैं। दोनों ओरसे
व्याघात नहीं होता इसलिए यह अव्याघाती है। तात्पर्य यह है कि आहारक शरीरसे अन्य पदार्थ-
का व्याघात नहीं होता और अन्य पदार्थसे आहारक शरीरका व्याघात नहीं होता । आहारक
शरीरके प्रयोजनका समुच्चय करनेके लिए सूत्रमें 'च' शब्द दिया है। यथा—आहारक शरीर २०
कदाचित् लब्धि-विशेषके सद्भावको जतानेके लिए, कदाचित् सूक्ष्म पदार्थका निश्चय करनेके लिए
और संयमकी रक्षा करनेके लिए उत्पन्न होता है। सूत्रमें 'आहारक' पद आया है उससे पूर्वमें कहे
गये आहारक शरीरको दुहराया है। जिस समय जीव आहारक शरीरकी रचनाका आरम्भ करता
है उस समय वह प्रमत्त हो जाता है इसलिए सूत्रमें प्रमत्तसंयतके ही आहारक शरीर होता है यह
कहा है। इष्ट अर्थके निश्चय करनेके लिए सूत्रमें 'एवकार' पदको ग्रहण किया है। जिससे यह २५
जाना जाय कि आहारक शरीर प्रमत्तसंयतके ही होता है अन्यके नहीं। किन्तु यह न जाना जाय
कि प्रमत्तसंयतके आहारक ही होता है। तात्पर्य यह है कि प्रमत्तसंयतके औदारिक आदि
शरीरोंका निराकरण न हो इसलिए प्रमत्तसंयत पदके साथ ही एवकार पद लगाया है ।
§ ३५८. इस प्रकार इन शरीरोंको धारण करनेवाले संसारी जीवोंके प्रत्येक गतिमें क्या
तीनों लिंग होते हैं या लिंगका कोई स्वतन्त्र नियम है। अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगे- ३०
का सूत्र कहते हैं—
नारक और सम्मूर्च्छिन नपुंसक होते हैं ॥ ५० ॥
§ ३५९. नरकोंका कथन आगे करेंगे । जो नरकोंमें उत्पन्न होते हैं वे नारकी कहलाते हैं ।
जो सम्मूर्च्छन जन्मसे पैदा होते हैं वे सम्मूर्च्छिन कहलाते हैं। सूत्रमें नारक और सम्मूर्च्छिन इन
दोनों पदोंका द्वन्द्वसमास है । चारित्रमोहके दो भेद हैं—कषाय और नोकषाय । इनमेंसे नोकषायके ३५
भेद नपुंसकवेदके उदयसे और अशुभ नामकर्मके उदयसे उक्त जीव स्त्री और पुरुष न होकर नपुंसक
होते हैं। यहाँ ऐसा नियम जानना कि नारक और सम्मूर्च्छिन नपुंसक ही होते हैं। इन जीवोंके
१. -मस्तीति सम्मू-मु० ।