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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 558 में से

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पृष्ठ 256

१४४ सर्वार्थसिद्धौ [ २।५१ § ३६० -
§ ३६०. यद्येवमवध्रियते, अर्थादापन्नमेतदुक्तेभ्योऽन्ये संसारिणस्त्रिलिङ्गा इति यत्रात्यन्तं¹
नपुंसकलिङ्गस्याभावस्तत्प्रतिपादनार्थमाह—
न देवाः ॥५१॥
§ ३६१. स्त्रैणं पौंस्नं च यन्निरतिशयसुखं² शुभगतिनामोदयापेक्षं तद्देवा अनुभवन्तीति न
५ तेषु नपुंसकानि³ सन्ति ।
§ ३६२. अथेतरे कियल्लिङ्गा इत्यत आह—
शेषास्त्रिवेदाः ॥५२॥
§ ३६३. त्रयो वेदा येषां ते त्रिवेदाः । के पुनस्ते वेदाः । स्त्रीत्वं पुंस्त्वं नपुंसकत्वमिति ।
कथं तेषां सिद्धिः । वेद्यत इति वेदः । लिङ्गमित्यर्थः । तद् द्विविधं द्रव्यलिङ्गं भावलिङ्गं चेति ।
१० द्रव्यलिङ्गं योनिमेहनादि नामकर्मोदयनिर्वर्तितम् । नोकषायोदयापादितवृत्ति भावलिङ्गम् । स्त्री-
वेदोदयात् स्त्यायत्यस्यां गर्भ इति स्त्री । पुंवेदोदयात् सूते जनयत्यपत्यमिति पुमान्⁴ । नपुंसकवेदो-
दयात्तदुभयशक्तिविकलं नपुंसकम् । रूढिशब्दाश्चैते । रूढिषु च क्रिया व्युत्पत्त्यर्थं च । यथा गच्छ-
तीति गौरिति । इतरथा हि गर्भधारणादिक्रियाप्राधान्ये बालवृद्धानां तिर्यङ्मनुष्याणां देवानां
कार्मणकाययोगस्थानां च तदभावात्स्त्रीत्वादिव्यपदेशो न स्यात् । त एते त्रयो वेदाः शेषाणां गर्भ-
१५ जानां भवन्ति ।
मनोज्ञ शब्द, गन्ध, रूप, रस और स्पर्शके सम्बन्धसे उत्पन्न हुआ स्त्री-पुरुष विषयक थोड़ा भी सुख
नहीं पाया जाता है।
§ ३६०. यदि उक्त जीवोंके नपुंसकवेद निश्चित होता है तो यह अर्थात् सिद्ध है कि इनसे
अतिरिक्त अन्य संसारी जीव तीन वेदवाले होते हैं। इसमें भी जिनके नपुंसकवेदका अत्यन्त अभाव
२० है उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
देव नपुंसक नहीं होते ॥ ५१ ॥
§ ३६१. शुभगति नामकर्मके उदयसे स्त्री और पुरुषसम्बन्धी जो निरतिशय सुख है उसका
देव अनुभव करते हैं इसलिए उनमें नपुंसक नहीं होते ।
§ ३६२. इनसे अतिरिक्त शेष जीव कितने लिंगवाले होते हैं, इस बातको बतलानेके लिए
२५ आगेका सूत्र कहते हैं—
शेषके सब जीव तीन वेदवाले होते हैं ॥ ५२ ॥
§ ३६३. जिनके तीन वेद होते हैं वे तीन वेदवाले कहलाते हैं। शंका—वे तीन वेद कौन
हैं ? समाधान—स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद । शंका—इसकी सिद्धि कैसे होती है ?
समाधान—जो वेदा जाता है उसे वेद कहते हैं। इसीका दूसरा नाम लिंग है। इसके दो भेद हैं—
३० द्रव्यलिंग और भावलिंग । जो योनि मेहन आदि नामकर्मके उदयसे रचा जाता है वह द्रव्यलिंग है
और जिसकी स्थिति नोकषायके उदयसे प्राप्त होती है वह भावलिंग है। स्त्रीवेदके उदयसे जिसमें
गर्भ रहता है वह स्त्री है। पुंवेदके उदयसे जो अपत्यको जनता है वह पुरुष है और नपुंसकवेदके
उदयसे जो उक्त दोनों प्रकारकी शक्तिसे रहित है वह नपुंसक है। वास्तवमें ये तीनों रूढ़िक शब्द
हैं और रूढ़िमें क्रिया व्युत्पत्तिके लिए ही होती है। यथा जो गमन करती है वह गाय है। यदि
३५ ऐसा न माना जाय और इसका अर्थ गर्भधारण आदि क्रियाप्रधान लिया जाय तो बालक और
वृद्धोंके, तिर्यंच और मनुष्योंके, देवोंके तथा कार्मणकाययोगमें स्थित जीवोंके गर्भधारण आदि
१. -त्यन्तनपुं-आ०, दि० १ । -न्यन्तिकनपुं-दि० २ । २. -शयं सुखं गति-मु० । ३. नपुंसकलिङ्गानि सन्ति
मु० । ४. पुमान् । तदुभय-आ०, दि० १- दि० २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri