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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 267, कुल 558 में से

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पृष्ठ 267
  • ३।१० § ३८६ ] तृतीयोऽध्यायः १५५
    § ३८४. तत्र जम्बूद्वीपे षड्भिः कुलपर्वतैर्विभक्तानि सप्त क्षेत्राणि कानि तानीत्यत आह—
    भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि १॥१०॥
    § ३८५. भरतादयः संज्ञा अनादिकालप्रवृत्ता अनिमित्ताः । तत्र भरतवर्षः क्व संनिविष्टः ।
    दक्षिणदिग्भागे हिमवतोऽद्रेस्त्रयाणां २ समुद्राणां मध्ये आरोपितचापाकारो भरतवर्षः । विजयार्द्धेन
    गङ्गासिन्धुभ्यां च विभक्तः ३ स षट्खण्डः । क्षुद्रहिमवन्तमुत्तरेण दक्षिणेन महाहिमवन्तं पूर्वापर- ५
    समुद्रयोर्मध्ये हैमवतवर्षः । निषधस्य दक्षिणतो महाहिमवत उत्तरतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तराले
    हरिवर्षः । निषधस्योत्तरान्नीलतो दक्षिणतः पूर्वापरसमुद्रयोरन्तरे विदेहस्य संनिवेशो द्रष्टव्यः ।
    नीलत ४ उत्तरात् ५ (द्) रुक्मिणो दक्षिणात् पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये रम्यकवर्षः । रुक्मिण उत्तराच्छिख-
    रिणो दक्षिणात्पूर्वापरसमुद्रयोर्मध्ये संनिवेशी ६ हैरण्यवतवर्षः । शिखरिण उत्तरतस्त्रयाणां समुद्राणां
    मध्ये ऐरावतवर्षः। विजयार्द्धेन रक्तारक्तोदाभ्यां च विभक्तः ७ स षट्खण्डः । १०
    § ३८६. षट् कुलपर्वता इत्युक्तं के पुनस्ते कथं वा व्यवस्थिता इत्यत आह—
    योजनका है। प्रत्येक काण्डके अन्तमें एक-एक कटनी है। जिसका एक ओरका व्यास पाँचसौ
    योजन है। अन्तिम कटनीका व्यास मात्र छह योजन कम है। एक जमीनपर और तीन इन तीन
    कटनियोंपर इस प्रकार यह चार वनोंसे सुशोभित है। इनके क्रमसे भद्रसाल, नन्दन, सौमनस और
    पाण्डुक ये नाम हैं। पहली और दूसरी कटनीके बाद मेरु पर्वत सीधा गया है फिर क्रमसे घटने १५
    लगता है। इसके चारों वनोंमें चारों दिशाओंमें एक-एक वनमें चार-चार इस हिसाबसे सोलह
    चैत्यालय हैं। पाण्डुक वनमें चारों दिशाओंमें चार पाण्डुक शिलाएँ हैं। जिनपर उस-उस दिशाके
    क्षेत्रोंमें उत्पन्न हुए तीर्थंकरोंका अभिषेक होता है। इसका रंग पीला है।
    § ३८४. इस जम्बूद्वीप में छह कुलपर्वतोंसे विभाजित होकर जो सात क्षेत्र हैं वे कौन-से हैं?
    इसी बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
    भरतवर्ष, हैमवतवर्ष, हरिवर्ष, विदेहवर्ष, रम्यकवर्ष, हैरण्यवतवर्ष और ऐरावतवर्ष ये
    सात क्षेत्र हैं ॥ १० ॥
    § ३८५. क्षेत्रोंकी भरत आदि संज्ञाएँ अनादि कालसे चली आ रही हैं और अनिमित्त हैं।
    इनमें-से भरत क्षेत्र कहाँ स्थित है ? हिमवान् पर्वतके दक्षिणमें और तीन समुद्रोंके बीचमें चढ़े हुए
    धनुषके आकारवाला भरत क्षेत्र है जो विजयार्ध और गंगा सिन्धुसे विभाजित होकर छह खण्डोंमें २५
    बँटा हुआ है। क्षुद्र हिमवान्के उत्तरमें और महाहिमवान्के दक्षिणमें तथा पूर्व पश्चिम समुद्रके बीच-
    में हैमवत क्षेत्र है। निषधके दक्षिणमें और महाहिमवान्के उत्तरमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके
    बीचमें हरिक्षेत्र है। निषधके उत्तरमें और नीलके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीचमें
    विदेह क्षेत्रकी रचना है। नीलके उत्तरमें और रुक्मीके दक्षिणमें तथा पूर्व पश्चिम समुद्रके बीचमें
    रम्यक क्षेत्र है। रुक्मीके उत्तरमें और शिखरीके दक्षिणमें तथा पूर्व और पश्चिम समुद्रके बीचमें ३०
    हैरण्यवत क्षेत्र है। शिखरीके उत्तरमें और तीन समुद्रोंके बीचमें ऐरावत क्षेत्र है। जो विजयार्ध
    और रक्ता रक्तोदासे विभाजित होकर छह खण्डोंमें बँटा हुआ है।
    § ३८६. कुलपर्वत छह हैं यह पहले कह आये हैं परन्तु वे कौन हैं और कहाँ स्थित हैं यह
    बतलाना शेष है अतः आगेका सूत्र कहते हैं—
    १. क्षेत्राणि ।।१०।। भिन्न-भिन्नानि भरता-। आ० । २. -याणां च समु-मु० । ३. विभक्तः षट्-मु० । ४. ३५
    नीलवत उत्त-आ०, दि० १, दि० २ । ५. उत्तरः रुक्मिणो दक्षिणः मु० । ६. संनिवेशो हैर-मु० ।
    ७. -विभक्तः षट्- मु० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri