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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

११६ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१०.§ २७४ -
वरणेषु युगपत् । पूर्वकालभाविनोऽपि दर्शनाज्ज्ञानस्य प्रागुपन्यासः; अभ्यर्हितत्वात् । सम्यग्ज्ञान-
प्रकरणात्पूर्वं पञ्चविधो ज्ञानोपयोगो व्याख्यातः । इह पुनरुपयोगग्रहणाद्विपर्ययोऽपि गृह्यते इत्यष्ट-
विध¹ इति उच्यते ।
§ २७४. यथोक्तेनानेनाभिहितपरिणामेन सर्वात्मसाधारणेनोपयोगेन ये उपलक्षिता उप-
योगिनस्ते द्विविधाः—
संसारिणो मुक्ताश्च ॥ १० ॥
§ २७५. संसरणं संसारः परिवर्तनमित्यर्थः । स एषामस्ति ते संसारिणः । तत्परिवर्तनं
पञ्चविधं द्रव्यपरिवर्तनं क्षेत्रपरिवर्तनं कालपरिवर्तनं भवपरिवर्तनं भावपरिवर्तनं चेति । तत्र
छद्मस्थोंके क्रमसे होते हैं और आवरणरहित जीवोंके युगपत् होते हैं । यद्यपि दर्शन पहले होता है
तो भी श्रेष्ठ होनेके कारण सूत्रमें ज्ञानको दर्शनसे पहले रखा है । सम्यग्ज्ञानका प्रकरण होनेके
कारण पहले पांच प्रकारके ज्ञानोपयोगका व्याख्यान कर आये हैं । परन्तु यहाँ उपयोगका ग्रहण
करनेसे विपर्ययका भी ग्रहण होता है इसलिए वह आठ प्रकारका कहा है ।
विशेषार्थ—यहाँ जीवका लक्षण उपयोग बतलाकर उसके भेदोंकी परिगणना की गयी है ।
उपयोगके मुख्य भेद दो हैं—ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । ये दोनों प्रकारके उपयोग सब जीवोंके
पाये जाते हैं । इनके अवान्तर भेद कई हैं जो निमित्तविशेषसे होते हैं । ज्ञानावरण और दर्शनावरणके
अवान्तर भेदोंका यथायोग्य क्षयोपशम और क्षय तथा दर्शनमोहनीयका उदय ये प्रधान निमित्त हैं ।
इनके कारण दोनों प्रकारके उपयोग बारह भेदोंमें विभक्त हो जाते हैं । इस प्रकार ज्ञानोपयोगके
आठ और दर्शनोपयोगके चार भेद प्राप्त होते हैं । मुख्यतया संसारी जीवके एक कालमें एक
उपयोग और केवलीके दो उपयोग होते हैं । पर नाना जीवोंकी अपेक्षा परिगणना करनेपर वे
बारह होते हैं । यद्यपि प्रथम अध्यायमें एक जीवके एक साथ चार ज्ञान बतला आये हैं और जिसके
एक साथ चार ज्ञान होंगे उसके उसी समय तीन दर्शन भी पाये जायेंगे, पर यह कथन क्षयोपशमकी
प्रधानतासे किया गया जानना चाहिए । एक जीवके एक कालमें मतिज्ञानावरण आदि चार ज्ञाना-
वरण और चक्षुदर्शनावरण आदि तीन दर्शनावरण इन सात कर्मोंका क्षयोपशम हो सकता है पर
तत्त्वतः उनके उस समय उपयोग एक ही होगा । क्षयोपशम ज्ञानोत्पत्ति और दर्शनोत्पत्तिमें
निमित्त है और उपयोग ज्ञान दर्शनकी प्रवृत्ति है । जीवमें ज्ञान और दर्शन गुणकी धारा निरन्तर
प्रवर्तित होती रहती है । वह जिस समय बाह्य और अन्तरंग जैसा निमित्त मिलता है उसके अनु-
सार काम करने लगती है । इतना अवश्य है कि संसार अवस्थामें वह मलिन, मलिनतर और
मलिनतम रहती है और कैवल्य लाभ होनेपर वह विशुद्ध हो जाती है फिर उसकी प्रवृत्तिके लिए
अन्तरंग व बाह्य कारण अपेक्षित नहीं रहते । यही कारण है कि यहाँ जीवका लक्षण उपयोग
कहा है ।
§ २७४. सब आत्माओंमें साधारण उपयोगरूप जिस आत्मपरिणामका पहले व्याख्यान
किया है उससे उपलक्षित सब उपयोगवाले जीव दो प्रकारके हैं, इस बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
जीव दो प्रकारके हैं—संसारी और मुक्त ॥ १० ॥
§ २७५. संसरण करनेको संसार कहते हैं जिसका अर्थ परिवर्तन है । यह जिन जीवोंके
पाया जाता है वे संसारी हैं । परिवर्तनके पाँच भेद हैं—द्रव्यपरिवर्तन, क्षेत्रपरिवर्तन, कालपरि-
१. -विध उच्यते दि० २, मु० ।

  • २।१० § २७६ ] द्वितीयोऽध्यायः १९७

द्रव्यपरिवर्तनं द्विविधम्—नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनं कर्मद्रव्यपरिवर्तनं चेति । तत्र नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनं
नाम त्रयाणां शरीराणां षण्णां पर्याप्तीनां च योग्या ये पुद्गला एकेन जीवेन एकस्मिन्समये गृहीताः
स्निग्धरूक्षवर्णगन्धादिभिस्तीव्रमन्दमध्यमभावेन च यथावस्थिता द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णा
अगृहीतानन्तवारानतीत्य मिश्रकांश्चानन्तवारानतीत्य मध्ये गृहीतांश्चानन्तवारानतीत्य त एव
तेनैव प्रकारेण तस्यैव जीवस्य नोकर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्समुदितं नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । ५
कर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते—एकस्मिन्समये एकेन जीवेनाष्टविधकर्मभावेन ये गृहीताः पुद्गलाः
समयाधिकामावलिकामतीत्य द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णाः, पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त एव तेनैव
प्रकारेण तस्य जीवस्य कर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्कर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । उक्तं च—
"सव्वे वि पुग्गला खलु कमसो भुत्तुज्झिया य जीवेणं ।
१असइं अणंतखुत्तो पुग्गलपरियट्टसंसारे२ ॥" १०
§ २७६. क्षेत्रपरिवर्तनमुच्यते—सूक्ष्मनिगोदजीवोऽपर्याप्तकः सर्वजघन्यप्रदेशशरीरो लोकस्या-
ष्टमध्यप्रदेशान्स्वशरीरमध्ये३ कृत्वोत्पन्नः क्षुद्रभवग्रहणं जीवित्व़ा मृतः । स एव पुनस्तेनैवावगाहेन
द्विरुत्पन्नस्तथा त्रिस्तथा चतुरित्येवं यावद् ४घनाङ्गुलस्यासंख्येयभागप्रमिताकाशप्रदेशास्तावत्कृत्व-
स्तत्रैव जनित्वा पुनरेकैकप्रदेशाधिकभावेन सर्वो लोक आत्मनो जन्मक्षेत्रभावमुपनीतो भवति याव-
त्तावत्क्षेत्रपरिवर्तनम् । उक्तं च— १५
वर्तन, भवपरिवर्तन और भावपरिवर्तन । द्रव्यपरिवर्तनके दो भेद हैं—नोकर्म द्रव्यपरिवर्तन और
कर्म द्रव्यपरिवर्तन । अब नोकर्म द्रव्य परिवर्तनका स्वरूप कहते हैं—किसी एक जीवने तीन शरीर
और छह पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गलोंको एक समयमें ग्रहण किया। अनन्तर वे पुद्गल स्निग्ध या
रूक्ष स्पर्श तथा वर्ण और गन्ध आदिके द्वारा जिस तीव्र, मन्द और मध्यम भावसे ग्रहण किये थे
उस रूपसे अवस्थित रहकर द्वितीयादि समयोंमें निर्जीर्ण हो गये। तत्पश्चात् अगृहीत परमाणुओंको २०
अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा, मिश्र परमाणुओंको अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा और बीचमें
गृहीत परमाणुओंको अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा। तत्पश्चात् जब उसी जीवके सर्व प्रथम ग्रहण
किये गये वे ही कर्म परमाणु उसी प्रकारसे नोकर्म भावको प्राप्त होते हैं तब यह सब मिलकर एक
नोकर्म द्रव्यपरिवर्तन होता है। अब कर्मद्रव्यपरिवर्तनका कथन करते हैं—एक जीवने आठ प्रकारके
कर्मरूपसे जिन पुद्गलोंको ग्रहण किया वे समयाधिक एक आवलिकालके बाद द्वितीयादिक समयोंमें २५
झर गये। पश्चात् जो क्रम नोकर्म द्रव्यपरिवर्तनमें बतलाया है उसी क्रमसे वे ही पुद्गल उसी
प्रकारसे उस जीवके जब कर्मभावको प्राप्त होते हैं तब यह सब एक कर्म द्रव्यपरिवर्तन कहलाता
है। कहा भी है—
'इस जीवने सभी पुद्गलोंको क्रमसे भोगकर छोड़ दिया। और इस प्रकार यह जीव
अनन्तबार पुद्गल परिवर्तनरूप संसारमें घूमता है।' ३०
§ २७६. अब क्षेत्रपरिवर्तनका कथन करते हैं—जिसका शरीर आकाशके सबसे कम प्रदेशों-
पर स्थित है ऐसा एक सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव लोकके आठ मध्य प्रदेशोंको अपने शरीरके
मध्यमें करके उत्पन्न हुआ और क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीकर मर गया। पश्चात् वही जीव पुनः
उसी अवगाहनासे वहाँ दूसरी बार उत्पन्न हुआ, तीसरी बार उत्पन्न हुआ, चौथी बार उत्पन्न
हुआ। इस प्रकार अंगुलके असंख्यातवें भागमें आकाशके जितने प्रदेश प्राप्त हों उतनी बार वहीं ३५
उत्पन्न हुआ। पुनः उसने आकाशका एक-एक प्रदेश बढ़ाकर सब लोकको अपना जन्मक्षेत्र बनाया।
इस प्रकार यह सब मिलकर एक क्षेत्रपरिवर्तन होता है। कहा भी है—


१. अच्छइ अणं-दि० १, दि० २, आ०, मु० । २. बा० अणु०, गा० २५ । ३. शरीरमध्यप्रदेशान् कृत्वा
मु० । ४. यावदङ्गुलस्या-दि० १, दि० २, आ० ।

११८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१० § २७७ –
"सव्वम्हि लोयखेत्ते कमसो तं णत्थि जं ण उप्पण्णं ।
ओगाहणाए² बहुसो परिब्भमिदो खेत्तसंसारे ॥"
§ २७७. कालपरिवर्तनमुच्यते—उत्सर्पिण्याः प्रथमसमये जातः कश्चिज्जीवः स्वायुषः
परिसमाप्तौ मृतः । स एव ³पुनर्द्वितीयाया उत्सर्पिण्या द्वितीयसमये जातः स्वायुषः क्षयान्मृतः । स
एव पुनस्तृतीयाया उत्सर्पिण्यास्तृतीयसमये जातः । एवमनेन क्रमेणोत्सर्पिणी परिसमाप्ता । तथा-
वसर्पिणी च । एवं जन्मनैरन्तर्यमुक्तम् । ⁴मरणस्यापि नैरन्तर्यं तथैव ग्राह्यम् । एतावत्कालपरि-
वर्तनम् । उक्तं च—
"⁵उस्सप्पिणिअवसप्पिणिसमयावलियासु णिरवसेसासु ।
जादो मुदो य बहुसो भमणेण दु कालसंसारे ॥"
§ २७८. भवपरिवर्तनमुच्यते—नरकगतौ सर्वजघन्यमायुर्दशवर्षसहस्राणि । तेनायुषा तत्रो-
त्पन्नः पुनः परिभ्रम्य तेनैवायुषा जातः । एवं दशवर्षसहस्राणां यावन्तः समयास्तावत्कृत्वस्तत्रैव
जातो मृतः । पुनरेकैकसमयाधिकभावेन त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि परिसमापितानि । ततः प्रच्युत्य
तिर्यग्गतावन्तर्मुहूर्तायुः समुत्पन्नः । पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त्रीणि पल्योपमानि तेन परिसमापितानि ।
एवं मनुष्यगतौ च⁶ । देवगतौ च नारकवत् । अयं तु विशेषः—एकत्रिंशत्सागरोपमाणि परिसमा-
पितानि यावत्तावद् भवपरिवर्तनम् । उक्तं च—
'सब लोक क्षेत्रमें ऐसा एक प्रदेश नहीं है जहाँ यह अवगाहनाके साथ क्रमसे नहीं उत्पन्न
हुआ । इस प्रकार इस जीवने क्षेत्र संसारमें अनेक बार परिभ्रमण किया ।'
§ २७७. अब कालपरिवर्तनका कथन करते हैं—कोई जीव उत्सर्पिणीके प्रथम समयमें
उत्पन्न हुआ और आयुके समाप्त हो जानेपर मर गया । पुनः वही जीव दूसरी उत्सर्पिणीके दूसरे
समयमें उत्पन्न हुआ और अपनी आयुके समाप्त होनेपर मर गया । पुनः वही जीव तीसरी
उत्सर्पिणीके तीसरे समयमें उत्पन्न हुआ । इस प्रकार इसने क्रमसे उत्सर्पिणी समाप्त की और इसी
प्रकार अवसर्पिणी भी । यह जन्मका नैरन्तर्य कहा । तथा इसी प्रकार मरण का भी नैरन्तर्य लेना
चाहिए । इस प्रकार यह सब मिलकर एक कालपरिवर्तन है । कहा भी है—
'कालसंसारमें परिभ्रमण करता हुआ यह जीव उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीके सब समयोंमें
अनेक बार जन्मा और मरा ।'
§ २७८. अब भवपरिवर्तनका कथन करते हैं—नरकगतिमें सबसे जघन्य आयु दस हजार
वर्षकी है । एक जीव उस आयुसे वहाँ उत्पन्न हुआ पुनः घूम-फिरकर उसी आयुसे वहीं उत्पन्न
हुआ । इस प्रकार दस हजार वर्षके जितने समय हैं उतनी बार वहीं उत्पन्न हुआ और मरा ।
पुनः आयुमें एक-एक समय बढ़ाकर नरककी तैंतीस सागर आयु समाप्त की । तदनन्तर नरकसे
निकलकर अन्तर्मुहूर्त आयुके साथ तिर्यंचगतिमें उत्पन्न हुआ । और पूर्वोक्त क्रमसे उससे तिर्यंच-
गतिकी तीन पल्य आयु समाप्त की । इसी प्रकार मनुष्यगतिमें अन्तर्मुहूर्तसे लेकर तीन पल्य आयु
समाप्त की । तथा देवगतिमें नरकगतिके समान आयु समाप्त की । किन्तु देवगतिमें इतनी विशे-
षता है कि यहाँ इकतीस सागर आयु समाप्त होने तक कथन करना चाहिए । इस प्रकार यह सब
मिलकर एक भवपरिवर्तन है । कहा भी है—
१. बा० अणु०, गा० २६ । २. -हणेण बहुसो मु०, ना० । ३. एव तृती-आ०, दि० १, दि० २ ।
४. मरणमपि तथैव ग्रा-ता० । मरणस्यापि तथैव ग्रा-ना० । ५. बा० अणु० गा० २७ । ६. च तिर्यञ्चवत् । देव-मु०, ता० ।

अध्याय ५-६: अजीव-तत्त्व (पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल) एवं आस्रव-निरूपण

  • २।१० § २७९ ] द्वितीयोऽध्यायः ११९
    “णिरयादिजहण्णादिसु जाव दु उबरिल्लया दु गेवज्जा ।
    मिच्छत्तसंसिदेण दु बहुसो वि भवट्ठिदी भमिदा ॥”
    § २७९. भावपरिवर्तनमुच्यते—पञ्चेन्द्रियः संज्ञी पर्याप्तको मिथ्यादृष्टिः कश्चिज्जीवः स
    सर्वजघन्यां स्वयोग्यां ज्ञानावरणप्रकृतेः स्थितिमन्तःकोटीकोटीसंज्ञिकामपद्यते । तस्य कषायाध्यव-
    सायस्थानान्यसंख्येयलोकप्रमितानि षट्स्थानपतितानि तत्स्थितियोग्यानि भवन्ति । तत्र सर्वजघन्य-
    कषायाध्यवसायस्थाननिमित्तान्यनु२भागाध्यवसायस्थानान्यसंख्येयलोकप्रमितानि भवन्ति । एवं सर्व-
    जघन्यां स्थितिं सर्वजघन्यं च कषायाध्यवसायस्थानं सर्वजघन्यमेवानुभागबन्धस्थानमास्कन्दतस्त-
    द्योग्यं सर्वजघन्यं योगस्थानं भवति । तेषामेव स्थितिकषायानुभागस्थानानां द्वितीयमसंख्येयभाग-
    वृद्धियुक्तं योगस्थानं भवति । एवं च तृतीयादिषु४ चतुःस्थानपतितानि श्रेण्यसंख्येयभागप्रमितानि
    योगस्थानानि भवन्ति । तथा तामेव स्थितिं तदेव कषायाध्यवसायस्थानं च प्रतिपद्यमानस्य द्वितीय-
    मनुभवाध्यवसायस्थानं भवति । तस्य च योगस्थानानि पूर्ववद्वेदितव्यानि । एवं तृतीयादिष्वपि
    अनुभवाध्यवसायस्थानेषु आ असंख्येयलोकपरिसमाप्तेः । एवं तामेव स्थितिमापद्यमानस्य द्वितीयं
    कषायाध्यवसायस्थानं भवति । तस्याप्यनुभवाध्यवसायस्थानानि योगस्थानानि च पूर्ववद्वेदित-
    ·'इस जीवने मिथ्यात्वके संसर्गसे उपरिम ग्रैवेयक तक नरक आदि गतियोंकी जघन्य आदि
    स्थितियोंमें उत्पन्न हो-होकर अनेक बार परिभ्रमण किया।'
    § २७९. अब भावपरिवर्तनका कथन करते हैं—पंचेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि कोई
    एक जीव ज्ञानावरण प्रकृतिकी सबसे जघन्य अपने योग्य अन्तःकोड़ाकोड़ी प्रमाण स्थितिको प्राप्त
    होता है। उसके उस स्थितिके योग्य षट्स्थानपतित असंख्यात लोकप्रमाण कषाय अध्यवसाय
    स्थान होते हैं। और सबसे जघन्य इन कषाय अध्यवसाय स्थानोंके निमित्तसे असंख्यात लोक-
    प्रमाण अनुभाग अध्यवसाय स्थान होते हैं। इस प्रकार सबसे जघन्य स्थिति, सबसे जघन्य कषाय
    अध्यवसाय स्थान और सबसे जघन्य अनुभाग अध्यवसाय स्थानको धारण करनेवाले इस जीवके
    तद्योग्य सबसे जघन्य योगस्थान होता है। तत्पश्चात् स्थिति, कषाय अध्यवसायस्थान और अनु-
    भाग अध्यवसाय स्थान वही रहते हैं किन्तु योगस्थान दूसरा हो जाता है जो असंख्यात भागवृद्धि
    संयुक्त होता है। इसी प्रकार तीसरे, चौथे आदि योगस्थानोंमें समझना चाहिए। ये सब योगस्थान
    चार स्थान पतित होते हैं और इनका प्रमाण श्रेणीके असंख्यातवें भाग है। तदनन्तर उसी स्थिति
    और उसी कषाय अध्यवसाय स्थानको धारण करनेवाले जीवके दूसरा अनुभाग अध्यवसाय स्थान
    होता है। इसके योगस्थान पहलेके समान जानना चाहिए। तात्पर्य यह है कि यहाँ भी पूर्वोक्त
    तीनों बातें ध्रुव रहती हैं किन्तु योगस्थान जगश्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं। इस प्रकार
    असंख्यात लोकप्रमाण अनुभाग अध्यवसाय स्थानोंके होने तक तीसरे आदि अनुभाग अध्यवसाय
    स्थानोंमें जानना चाहिए। तात्पर्य यह है कि यहाँ स्थिति और कषाय अध्यवसाय स्थान तो जघन्य
    ही रहते हैं। किन्तु अनुभाग अध्यवसायस्थान क्रमसे असंख्यात लोकप्रमाण हो जाते हैं और एक-
    एक अनुभाग अध्यवसाय स्थानके प्रति जगश्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण योगस्थान होते हैं।
    तत्पश्चात् उसो स्थितिको प्राप्त होनेवाले जीवके दूसरा कषाय अध्यवसाय स्थान होता है। इसके
    भी अनुभाग अध्यवसाय स्थान और योगस्थान पहलेके समान जानना चाहिए। अर्थात् एक-एक
    कषाय अध्यवसाय स्थानके प्रति असंख्यात लोकप्रमाण अनुभाग अध्यवसाय स्थान होते हैं और
    एक-एक अनुभाग अध्यवसायस्थानके प्रति जगश्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण योगस्थान होते हैं।
    १. बा० अ० गा० २८ । २. -नुभवाध्य-दि० । ३. नुभवस्था-मु० । ४. -दिषु योगस्थानेषु चतुः
    -मु०, ता० ।

.१२० सर्वार्थसिद्धौ [ २।१० § २८० –

व्वानि । एवं तृतीयादिष्वपि कषायाध्यवसायस्थानेषु आ असंख्येयलोकपरिसमाप्तेर्वृद्धिक्रमो
वेदितव्यः । उक्ताया जघन्यायाः स्थितेः समयाधिकायाः कषायादिस्थानानि पूर्ववत्¹ । एवं
समयाधिकक्रमेण आ उत्कृष्टस्थितेस्त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोटीपरिमितायाः कषायादिस्थानानि²
वेदितव्यानि । अनन्तभागवृद्धिः असंख्येयभागवृद्धिः संख्येयभागवृद्धिः संख्येयगुणवृद्धिः असंख्येयगुण-
५ वृद्धिः अनन्तगुणवृद्धिः इमानि षट् वृद्धिस्थानानि । हानिरपि तथैव । अनन्तभागवृद्ध्यनन्तगुणवृद्धि-
रहितानि चत्वारि स्थानानि । एवं सर्वेषां कर्मणां मूलप्रकृतीनामुत्तरप्रकृतीनां च परिवर्तनक्रमो
वेदितव्यः । तदेतत्सर्वं समुदितं भावपरिवर्तनम् । उक्तं च—
³“सव्वा पयडिट्ठिदीओ अणुभागपदेसबंधठाणानि ।
मिच्छत्तसंसिदेण य भमिदा पुण भावसंसारे ॥”
१० § २८०. उक्तात्पञ्चविधात्संसारान्निवृत्ता ये ते मुक्ताः । संसारिणां प्रागुपादानं तत्पूर्वक-
त्वान्मुक्तव्यपदेशस्य ।
इस प्रकार असंख्यात लोकप्रमाण कषाय अध्यवसाय स्थानोंके होने तक तीसरे आदि कषाय अध्य-
वसाय स्थानोंमें वृद्धिका क्रम जानना चाहिए । जिस प्रकार सबसे जघन्य स्थितिके कषायादि स्थान
कहे हैं उसी प्रकार एक समय अधिक जघन्य स्थितिके भी कषायादि स्थान जानना चाहिए और
१५ इसी प्रकार एक-एक समय अधिकके क्रमसे तीस कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति तक
प्रत्येक स्थिति विकल्पके भी कषायादि स्थान जानना चाहिए । अनन्त भागवृद्धि, असंख्यात भाग-
वृद्धि, संख्यात भागवृद्धि, संख्यात गुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि और अनन्त गुणवृद्धि इस प्रकार ये
वृद्धिके छह स्थान हैं तथा इसी प्रकार हानि भी छह प्रकारकी है। इनमें-से अनन्त भागवृद्धि और
अनन्त गुणवृद्धि इन दो स्थानोंके कम कर देनेपर चार स्थान होते हैं । इसी प्रकार सब मूल प्रकृ-
२० तियोंका और उनकी उत्तर प्रकृतियोंके परिवर्तनका क्रम जानना चाहिए । यह सब मिलकर एक
भावपरिवर्तन होता है। कहा भी है—
'इस जीवने मिथ्यात्वके संसर्गसे सब प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्धके स्थानोंको
प्राप्त कर भावसंसारमें परिभ्रमण किया।'
§ २८०. जो उक्त पाँच प्रकारके संसारसे निवृत्त हैं वे मुक्त हैं। सूत्रमें 'संसारि' पदका
२५ पहले ग्रहण किया, क्योंकि 'मुक्त' यह संज्ञा संसारपूर्वक प्राप्त होती है ।
विशेषार्थ—जीवके मुख्य भेद दो हैं—संसारी और मुक्त । ये भेद जीवकी बद्ध और अबद्ध
अवस्थाको ध्यानमें रखकर किये गये हैं । वस्तुतः ये जीवकी दो अवस्थाएँ हैं। पहले जीव बद्ध
अवस्थामें रहता है इसलिए उसे संसारी कहते हैं और बादमें उसके मुक्त होनेपर वही मुक्त कह-
लाता है । जीवका संसार निमित्त-सापेक्ष होता है, इसलिए इस अपेक्षासे संसारके पाँच भेद किये
३० गये हैं—द्रव्यसंसार, क्षेत्रसंसार, कालसंसार, भवसंसार और भावसंसार । इनका दूसरा नाम परि-
वर्तन भी है। द्रव्य पदसे कर्म और नोकर्म लिये गये हैं, क्षेत्र पद से आकाशके प्रदेशों का ग्रहण
किया है, काल पदसे समयका ग्रहण किया है, भव पदसे जीवकी नर नारक आदि अवस्थाओंका
ग्रहण किया है और भाव पदसे जीवके योग और कषायस्थान विवक्षित हैं। इन द्रव्यादिके निमित्त-
से संसारमें जीवका परिभ्रमण किस प्रकार होता रहता है यही यहाँ बतलाया गया है । इन परि-
३५ वर्तनोंके होनेमें उत्तरोत्तर अधिक-अधिक काल लगता है। मुख्य रूपसे जीवका संसार सम्यग्दर्शन-
के प्राप्त होनेके पूर्वतक माना गया है, इससे ये परिवर्तन जीवकी मिथ्यात्व अवस्थामें होते हैं यह
सिद्ध होता है । सम्यग्दर्शनके होनेपर जीवका ईषत् संसार शेष रहनेपर भी वह इन परिवर्तनोंसे


१. पूर्ववदेकसम-मु० । २. -स्थानानि (पूर्ववत्) वेदि-मु० । ३. बा० अणु० गा० २९ ।

  • २१२ § २८४ ] द्वितीयोऽध्यायः १३१
    § २८१. य एते संसारिणस्ते द्विविधाः-
    समनस्कामनस्काः ॥११॥
    § २८२. मनो द्विविधम्—द्रव्यमनो भावमनश्चेति । तत्र पुद्गलविपाकिकर्मोदयापेक्षं
    द्रव्यमनः । वीर्यान्तरायनोइन्द्रियावरणक्षयोपशमापेक्षा१ आत्मनो विशुद्धिर्भावमनः । तेन मनसा
    सह वर्तन्त इति समनस्काः । न विद्यते मनो येषां त इमे अमनस्काः । एवं मनसो भावाभावाभ्यां ५
    संसारिणो द्विविधा विभज्यन्ते । समनस्काश्चामनस्काश्च समनस्कामनस्का इति । अभ्यर्हितत्वात्स-
    मनस्कशब्दस्य पूर्वनिपातः । कथमभ्यर्हितत्वम् । गुणदोषविचारकत्वात् ।
    § २८३. पुनरपि संसारिणां भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
    संसारिणस्त्रसस्थावराः ॥१२॥
    § २८४. 'संसारि' ग्रहणमनर्थकम्; प्रकृतत्वात् । क्व प्रकृतम् । 'संसारिणो मुक्ताश्च' इति । १०
    नानर्थकम् । पूर्वापेक्षार्थम् । ये उक्ताः समनस्का अमनस्कास्ते संसारिण इति । यदि हि पूर्वस्य
    विशेषणं न स्यात् समनस्कामनस्कग्रहणं संसारिणो मुक्ताश्चेत्यनेन यथासंख्यमभिसंबद्ध्येत । एवं
    च कृत्वा 'संसारि'ग्रहणमादौ क्रियमाणमुपपन्नं भवति । तत्पूर्वापेक्षं सदुत्तरार्थमपि भवति२ । ते
    संसारिणो द्विविधाः-त्रसाः स्थावरा इति । त्रसनामकर्मोदयवशीकृतास्त्रसाः३ । स्थावरनामकर्मोदय-
    मुक्त हो जाता है । पूर्ण मोक्ष मुक्त अवस्थामें होता है । इसीसे जीवके संसारी और मुक्त ये दो १५
    भेद किये गये हैं ।
    § २८१. पहले जो संसारी जीव कह आये हैं वे दो प्रकारके हैं । आगेके सूत्र द्वारा इसी
    बातको बतलाते हैं—
    मनवाले और मनरहित ऐसे संसारी जीव हैं ॥११॥
    § २८२. मन दो प्रकारका है द्रव्यमन और भावमन । उनमें से द्रव्यमन पुद्गलविपाकी २०
    आंगोपांग नामकर्मके उदयसे होता है तथा वीर्यान्तराय और नोइन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमकी
    अपेक्षा रखनेवाले आत्माकी विशुद्धिको भावमन कहते हैं । यह मन जिन जीवोंके पाया जाता है
    वे समनस्क हैं । और जिनके मन नहीं पाया जाता है वे अमनस्क हैं । इस प्रकार मनके सद्भाव
    और असद्भावकी अपेक्षा संसारी जीव दो भागोंमें बँट जाते हैं। 'समनस्कामनस्काः' इसमें समनस्क
    और अमनस्क इस प्रकार द्वन्द्व समास है । समनस्क शब्द श्रेष्ठ है अतः उसे सूत्रमें पहले रखा । २५
    शंका—श्रेष्ठता किस कारणसे हैं ? समाधान—क्योंकि समनस्क जीव गुण और दोषोंके विचारक
    होते हैं । इसलिए समनस्क पद श्रेष्ठ है ।
    § २८३. अब फिरसे भी संसारी जीवोंके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    तथा संसारी जीव त्रस और स्थावरके भेदसे दो प्रकार हैं ॥१२॥
    § २८४. शंका—सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण करना निरर्थक है क्योंकि वह प्रकरण प्राप्त ३०
    है ? प्रतिशंका—इसका प्रकरण कहाँ है ? शंकाकार—'संसारिणो मुक्ताश्च' इस सूत्रसे उसका
    प्रकरण है । समाधान—सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण करना अनर्थक नहीं है, क्योंकि पूर्व सूत्रकी
    अपेक्षा इस सूत्रमें 'संसारी' पदका ग्रहण किया है । तात्पर्य यह है कि पूर्व सूत्रमें जो समनस्क और
    अमनस्क जीव बतलाये हैं वे संसारी हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए इस सूत्रमें 'संसारी' पद दिया
    है । यदि 'संसारी' पदको पूर्वका विशेषण न माना जाय तो समनस्क और अमनस्क इनका संसारी ३५
    और मुक्त इनके साथ क्रमसे सम्बन्ध हो जायगा । और इस अभिप्रायसे 'संसारी' पदका आदिमें
    ग्रहण करना बन जाता है । इस प्रकार 'संसारी' पदका ग्रहण पूर्व सूत्रकी अपेक्षासे होकर अगले
    १. -पेक्ष्या आत्मनो मु०, ता० । २. भवति । संसा-मु० । ३. त्रसनाम भा०, दि० १, दि० २, ता० ।
    १६
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वशवर्तिनः स्थावराः । त्रस्यन्तीति त्रसाः, स्थानशीलाः स्थावरा इति चेत् । न; आगमविरोधात् ।
आगमे हि कायानुवादेन त्रसा द्वीन्द्रियादारभ्य आ अयोगकेवलिन इति । तस्मान्न चलनाचलनापेक्षं
त्रसस्थावरत्वम् । कर्मोदयापेक्षमेव । त्रसग्रहणमादौ क्रियते; अल्पाच्तरत्वादभ्यर्हितत्वाच्च । सर्वो-
प्रयोगसंभवादभ्यर्हितत्वम् ।
§ २८५. एकेन्द्रियाणामतिबहुवक्तव्याभावादुल्लङ्घ्यानुपूर्वी स्थावरभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः ॥१३॥
§ २८६. स्थावरनामकर्मभेदाः पृथिवीकायादयः सन्ति । तदुदयनिमित्ता¹ जीवेषु पृथिव्यादयः
संज्ञा वेदितव्याः । प्रथनादिप्रकृतिनिष्पन्ना अपि रूढिवशात्प्रथनाद्यनपेक्षा वर्तन्ते । एषां पृथिव्यादी-
नामार्षे चातुर्विध्यमुक्तं प्रत्येकम् । तत्कथमिति चेद् । उच्यते—पृथिवी पृथिवीकायः पृथिवीकायिकः
पृथिवीजीव इत्यादि । तत्र अचेतना वैश्रसिकपरिणामनिर्वृत्ता काठिन्यगुणात्मिका पृथिवी । अचेतन-
त्वादसत्यपि पृथिवीकायनामकर्मोदये प्रथनक्रियोपलक्षितैवेयम् । अथवा पृथिवीति सामान्यम्;
उत्तरत्रयेऽपि सद्भावात् । कायः शरीरम् । पृथिवीकायिकजीवपरित्यक्तः पृथिवीकायो मृतमनुष्यादि-
सूत्रके लिए भी हो जाता है । यथा—वे संसारी जीव दो प्रकारके हैं त्रस और स्थावर । जिनके
त्रस नामकर्मका उदय है वे त्रस कहलाते हैं और जिनके स्थावर नाम कर्मका उदय है उन्हें स्थावर
कहते हैं। शंका—'त्रस्यन्ति' अर्थात् जो चलते-फिरते हैं वे त्रस हैं और जो स्थिति स्वभाववाले हैं
वे स्थावर हैं, क्या त्रस और स्थावरका यह लक्षण ठीक है ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं,
क्योंकि ऐसा माननेमें आगमसे विरोध आता है । क्योंकि कायानुवादकी अपेक्षा कथन करते हुए
आगम में बतलाया है कि द्वीन्द्रिय जीवोंसे लेकर अयोग केवली तकके सब जीव त्रस हैं । इसलिए
गमन करने और न करनेकी अपेक्षा त्रस और स्थावर यह भेद नहीं है किन्तु त्रस और स्थावर
कर्मोंके उदयकी अपेक्षासे ही है । सूत्रमें त्रसपदका प्रारम्भमें ग्रहण किया है क्योंकि स्थावर पदसे
इसमें कम अक्षर हैं और यह श्रेष्ठ है । त्रस श्रेष्ठ इसलिए हैं कि इनके सब उपयोगोंका पाया जाना
सम्भव है ।
§ २८५. एकेन्द्रियोंके विषयमें अधिक वक्तव्य नहीं है इसलिए आनुपूर्वीको छोड़कर पहले
स्थावरके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक ये पाँच
स्थावर हैं ॥ १३ ॥
§ २८६. पृथिवीकाय आदि स्थावर नामकर्मके भेद हैं । उनके उदयके निमित्तसे जीवोंके
पृथिवी आदिक नाम जानने चाहिए । यद्यपि ये नाम प्रथन आदि धातुओंसे बने हैं तो भी ये रूढिक
हैं इसलिए इनमें प्रथन आदि धर्मोंकी अपेक्षा नहीं है । शंका—आर्षमें ये पृथिवी आदिक अलग-
अलग चार प्रकारके कहे हैं सो ये चार-चार भेद किस प्रकार प्राप्त होते हैं ? समाधान—
पृथिवी, पृथिवीकाय, पृथिवीकायिक और पृथिवीजीव ये पृथिवीके चार भेद हैं । इनमेंसे जो
अचेतन है, प्राकृतिक परिणमनोंसे बनी है और कठिन गुणवाली है वह पृथिवी है । अचेतन होनेसे
यद्यपि इसमें पृथिवी नामकर्मका उदय नहीं है तो भी प्रथनक्रियासे उपलक्षित होनेके कारण अर्थात्
विस्तार आदि गुणवाली होनेके कारण यह पृथिवी कहलाती है । अथवा पृथिवी यह सामान्य भेद
है क्योंकि आगेके तीन भेदोंमें भी यह पाया जाता है । कायका अर्थ शरीर है, अतः पृथिवीकायिक
जीवके द्वारा जो शरीर छोड़ दिया जाता है वह पृथिवीकाय कहलाता है । यथा मरे हुए मनुष्य


१. –निमित्ता अमी इति जीवेषु मु० ना० ।

  • २।१४ § २८८ ] द्वितीयोऽध्यायः १२३
    कायवत् । पृथिवीकायोऽस्यास्तीति पृथिवीकायिकः । तत्कायसंबन्धवशीकृत आत्मा । समवाप्त-
    पृथिवीकायनामकर्मोदयः कार्मणकाययोगस्थो यो न तावत्पृथिवीं कायत्वेन गृह्णाति स पृथिवीजीवः।१
    एवमबादिष्वपि योज्यम् । एते पञ्चविधाः प्राणिनः स्थावराः । कति पुनरेषां प्राणाः । चत्वारः
    स्पर्शेनेन्द्रियप्राणः कायबलप्राणः उच्छ्वासनिश्वासप्राणः आयुःप्राणश्चेति ।
    § २८७. अथ त्रसाः के ते, इत्यत्रोच्यते--
    द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः ॥१४॥
    § २८८. द्वे इन्द्रिये यस्य सोऽयं द्वीन्द्रियः । द्वीन्द्रिय आदिर्येषां ते द्वीन्द्रियादयः२ । 'आदि'-
    शब्दो व्यवस्थावाची । क्व व्यवस्थिताः । आगमे । कथम् । द्वीन्द्रियस्त्रीन्द्रियश्चतुरिन्द्रियः पञ्चेन्द्रिय-
    श्चेति । 'तद्गुणसंविज्ञानवृत्तिग्रहणाद् द्वीन्द्रियस्याप्यन्तर्भावः । कति पुनरेषां प्राणाः । द्वीन्द्रियस्य
    तावत् षट् प्राणाः, पूर्वोक्ता एव रसनवाक्प्राणाधिकाः । त्रीन्द्रियस्य सप्त त एव घ्राणप्राणाधिकाः ।
    चतुरिन्द्रियस्याष्टौ त एव चक्षुःप्राणाधिकाः । पञ्चेन्द्रियस्य तिर्यञ्चोऽसंज्ञिनो नव त एव श्रोत्र-
    प्राणाधिकाः । संज्ञिनो दश त एव मनोबलै३प्राणाधिकाः ।
    आदिकका शरीर । जिस जीवके पृथिवीरूप काय विद्यमान है उसे पृथिवीकायिक कहते हैं । तात्पर्य
    यह है कि यह जीव पृथिवीरूप शरीरके सम्बन्धसे युक्त है । कार्मणकाययोगमें स्थित जिस जीवने
    जबतक पृथिवीको कायरूपसे ग्रहण नहीं किया है तबतक वह पृथिवीजीव कहलाता है इसी प्रकार
    जलादिकमें भी चार-चार भेद कर लेने चाहिए । ये पाँचों प्रकारके प्राणी स्थावर हैं । शंका-
    इनके कितने प्राण होते हैं ? समाधान-इनके चार प्राण होते हैं-स्पर्शन इन्द्रियप्राण, कायबल-
    प्राण, उच्छ्वास निःश्वासप्राण और आयुःप्राण ।
    § २८७. अब त्रस कौन हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
    दो इन्द्रिय आदि त्रस हैं ॥ १४ ॥
    § २८८. जिन जीवोंके दो इन्द्रियां होती हैं उन्हें दो इन्द्रिय कहते हैं । तथा जिनके
    प्रारम्भमें दो इन्द्रिय जीव हैं वे दो इन्द्रियादिक कहलाते हैं । यहाँ आदि शब्द व्यवस्थावाची
    है । शंका-ये व्यवस्थित जीव कहाँ बतलाये हैं ? समाधान-आगममें बतलाये हैं । शंका-
    किस क्रमसे ? समाधान-दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पंचेन्द्रिय इस क्रमसे
    व्यवस्थित हैं । यहाँ तद्गुणसंविज्ञान बहुव्रीहि समासका ग्रहण किया है इसलिए द्वीन्द्रियका
    भी अन्तर्भाव हो जाता है । शंका-इन द्वीन्द्रिय आदि जीवोंके कितने प्राण होते हैं ?
    समाधान-पूर्वोक्त चार प्राणोंमें रसनाप्राण और वचनप्राण इन दो प्राणोंके मिला देनेपर दो
    इन्द्रिय जीवोंके छह प्राण होते हैं । इनमें घ्राणप्राणके मिला देनेपर तीनइन्द्रिय जीवके
    सात प्राण होते हैं । इनमें चक्षुप्राणके मिला देनेपर चौइन्द्रिय जीवके आठ प्राण होते हैं ।
    इनमें श्रोत्रप्राणके मिला देनेपर तिर्यंच असंज्ञीके नौ प्राण होते हैं । इनमें मनोबलके मिला
    देनेपर संज्ञी जीवोंके दस प्राण होते हैं ।
    विशेषार्थ-यहाँ द्वीन्द्रियके छह, त्रीन्द्रियके सात, चतुरिन्द्रियके आठ, असंज्ञीके
    नौ और संज्ञीके दस प्राण पर्याप्त अवस्थाकी अपेक्षा बतलाये हैं । अपर्याप्त अवस्था में इनके
    क्रमसे चार, पाँच, छह और सात प्राण होते हैं । खुलासा इस प्रकार है-कुल
    प्राण दस हैं-पाँच इन्द्रिय प्राण, तीन बल प्राण, आयु और श्वासोच्छ्वास । इनमें-से संज्ञी
    और असंज्ञीके अपर्याप्त अवस्था में श्वासोच्छ्वास, मनोबल और वचनबल ये तीन प्राण नहीं
    १. जीवः । उक्तं च-पुढवी पुढवीकायो पुढवीकाइय पुढविजीवो य । साहारणोपमुक्को सरीरगहिदो
    भवंतरिदो ॥ एव -मु० । २. 'बहुव्रीहौ तद्गुणसंविज्ञानमपि-परि०-शे० प० ४।४ । ३. बलाधिकाः,
    आ०, दि० १, दि० २।

१२४ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१५ § २८९ -
§ २८९. 'आदि'शब्देन निर्दिष्टानामनिर्ज्ञातसंख्यानामियत्तावधारणं कर्त्तव्यमित्यत आह-
पञ्चेन्द्रियाणि ॥१५॥
§ २९०. 'इन्द्रिय'शब्दो व्याख्यातार्थः । 'पञ्च'ग्रहणमवधारणार्थम्, पञ्चैव नाधिक-
संख्यानीति । कर्मेन्द्रियाणां १वागादीनामिह ग्रहणं कर्तव्यम् । न कर्तव्यम्; उपयोगप्रकरणात् ।
उपयोगसाधनानामिह ग्रहणं२ न क्रियासाधनानाम्; अनवस्थानाच्च । क्रियासाधनानामङ्गोपाङ्ग-
नामकर्मनिर्वर्तितानां सर्वेषामपि क्रियासाधनत्वमस्तीति न पञ्चैव कर्मेन्द्रियाणि ।
§ २९१. तेषामन्तर्भेदप्रदर्शनार्थमाह-
द्विविधानि३ ॥ १६ ॥
§ २९२. 'विध'शब्दः प्रकारवाची । द्वौ विधौ येषां तानि द्विविधानि, द्विप्रकाराणीत्यर्थः ।
कौ पुनस्तौ द्वौ प्रकारौ । द्रव्येन्द्रियं भावेन्द्रियमिति ।
§ २९३. तत्र द्रव्येन्द्रियस्वरूपप्रतिपत्त्यर्थमाह -
निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥ १७ ॥
होते, शेष सात प्राण होते हैं। चतुरिन्द्रियके अपर्याप्त अवस्था में तीन ये और श्रोत्रेन्द्रिय ये
चार प्राण नहीं होते, शेष छह प्राण होते हैं। त्रीन्द्रियके अपर्याप्त अवस्था में चार ये और
चक्षुरिन्द्रिय ये पाँच प्राण नहीं होते, शेष पाँच प्राण होते हैं और द्वीन्द्रियके अपर्याप्त अवस्था में
पाँच ये और घ्राणेन्द्रिय ये छह प्राण नहीं होते, शेष चार प्राण होते हैं।
§ २८९. पूर्व सूत्रमें जो आदि शब्द दिया है उससे संख्या नहीं ज्ञात होती अतः उसके
परिमाणका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
इन्द्रियाँ पाँच हैं ॥ १५ ॥
§ २९०. इन्द्रिय शब्दका व्याख्यान कर आये । सूत्रमें जो 'पंच' पदका ग्रहण किया है वह
मर्यादाके निश्चित करनेके लिए किया है कि इन्द्रियाँ पाँच ही होती हैं । इन्द्रियोंकी इससे और
अधिक संख्या नहीं पायी जाती । शंका--इस सूत्रमें वचनादिक कर्मेन्द्रियोंका ग्रहण करना
चाहिए ? समाधान--नहीं करना चाहिए, क्योंकि उपयोगका प्रकरण है। इस सूत्रमें उपयोगकी
साधनभूत इन्द्रियोंका ग्रहण किया है, क्रियाकी साधनभूत इन्द्रियोंका नहीं। दूसरे क्रियाकी साधन-
भूत इन्द्रियोंकी मर्यादा नहीं है। अंगोपांग नामकर्मके उदयसे जितने भी अंगोपांगोंकी रचना
होती है वे सब क्रियाके साधन हैं इसलिए कर्मेन्द्रियाँ पाँच ही हैं ऐसा कोई नियम नहीं किया जा
सकता है।
§ २९१. अब उन पाँचों इन्द्रियोंके अन्तर्भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
वे प्रत्येक दो-दो प्रकार की हैं ॥१६॥
§ २९२. विध शब्द प्रकारवाची है । 'द्विविधानि' पदमें 'द्वौ विधौ येषां तानि द्विविधानि'
इस प्रकार बहुव्रीहि समास है । जिसका यह आशय है कि ये पाँचों इन्द्रियाँ प्रत्येक दो प्रकारकी हैं ।
शंका-वे दो प्रकार कौन हैं ? समाधान-द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय ।
§ २९३. अब द्रव्येन्द्रियके स्वरूपका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
निर्वृत्ति और उपकरणरूप द्रव्येन्द्रिय है ॥१७॥
१. 'वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहुः । - सां० कौ० श्लो० २६ । २. ग्रहणं कृतं न क्रिया-मु०,
ता०, ना० । ३. 'कतिविहाणं भंते इंदिया पण्णत्ता । गोयमा, दुविहा पण्णत्ता । तं जहा-दव्विंदिया य भाविं-
दिया य - पण्णवणा पद १५ ।
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  • २।१८ § २९६ ] द्वितीयोऽध्यायः १२५
    § २९४. निर्वर्त्यते ¹इति निर्वृत्तिः । केन निर्वर्त्यते । कर्मणा । सा द्विविधा; बाह्याभ्यन्तर-
    भेदात् । उत्सेधाङ्गुलासंख्येयभागप्रमितानां शुद्धानामात्मप्रदेशानां प्रतिनियतचक्षुरादीन्द्रियसंस्थाने-
    नावस्थितानां वृत्तिराभ्यन्तरा निर्वृत्तिः । तेष्वात्मप्रदेशेष्विन्द्रियव्यपदेशभाक्षु यः प्रतिनियतसंस्थानो
    नामकर्मोदयापादितावस्थाविशेषः पुद्गलप्रचयः सा बाह्या निर्वृत्तिः । येन निर्वृत्तेरुपकारः क्रियते
    तदुपकरणम् । पूर्ववत्तदपि द्विविधम् । तत्राभ्यन्तरं कृष्णशुक्लमण्डलं बाह्यमक्षिपत्रपक्ष्मद्वयादि । ५
    एवं ²शेषेष्वपीन्द्रियेषु ज्ञेयम् ।
    § २९५. भावेन्द्रियमुच्यते--
    लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् ॥ १८ ॥
    § २९६. लम्भनं लब्धिः । का पुनरसौ । ज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमविशेषः । यत्संनिधा-
    नादात्मा द्रव्येन्द्रियनिर्वृत्ति प्रति व्याप्रियते तन्निमित्त आत्मनः परिणाम उपयोगः । तदुभये भावे- १०
    न्द्रियम् । इन्द्रियफलमुपयोगः, तस्य कथमिन्द्रियत्वम् । कारणधर्मस्य कार्ये दर्शनात् । यथा घटा-
    कारपरिणतं विज्ञानं घट इति । स्वार्थस्य तत्र मुख्यत्वाच्च । इन्द्रस्य लिङ्गमिन्द्रियमिति यः स्वार्थः
    स उपयोगे³ मुख्यः, उपयोगलक्षणो जीव इति वचनात् । अत उपयोगस्येन्द्रियत्वं न्याय्यम् ।
    § २९४. रचनाका नाम निर्वृत्ति है। शंका—यह रचना कौन करता है ? समाधान—
    कर्म । निर्वृत्ति दो प्रकार की है—बाह्यनिर्वृत्ति और आभ्यन्तर निर्वृत्ति । उत्सेधांगुलके असंख्यातवें १५
    भागप्रमाण और प्रतिनियत चक्षु आदि इन्द्रियोंके आकाररूपसे अवस्थित शुद्ध आत्मप्रदेशोंकी रचना-
    को आभ्यन्तर निर्वृत्ति कहते हैं। तथा इन्द्रिय नामवाले उन्हीं आत्मप्रदेशोंमें प्रतिनियत आकाररूप
    और नामकर्मके उदयसे विशेष अवस्थाको प्राप्त जो पुद्गलप्रचय होता है उसे बाह्यनिर्वृत्ति कहते
    हैं। जो निर्वृत्तिका उपकार करता है उसे उपकरण कहते हैं। निर्वृत्तिके समान यह भी दो प्रकार-
    का है—आभ्यन्तर और बाह्य । नेत्र इन्द्रियमें कृष्ण शुक्लमण्डल आभ्यन्तर उपकरण है तथा २०
    पलक और दोनों बरोनी आदि बाह्य उपकरण हैं। इसी प्रकार शेष इन्द्रियोंमें भी जानना चाहिए ।
    विशेषार्थ—आगममें संसारी जीवके प्रदेश चलाचल बतलाये हैं। मध्यके आठ प्रदेश अचल
    होते हैं और शेष प्रदेश चल । ऐसी अवस्थामें नियत आत्म प्रदेश ही सदा विवक्षित इन्द्रियरूप बने
    रहते हैं यह नहीं कहा जा सकता, किन्तु प्रदेश परिस्पन्दके अनुसार प्रति समय अन्य-अन्य प्रदेश
    आभ्यन्तर निर्वृत्तिरूप होते रहते हैं ऐसा यहाँ समझना चाहिए। जिसके जितनी इन्द्रियां होती हैं उसके २५
    उतने इन्द्रियावरण कर्मोंका क्षयोपशम सर्वांग होता है, इसलिए आभ्यन्तर निर्वृत्तिकी उक्त प्रकारसे
    व्यवस्था माननेमें कोई बाधा नहीं आती। यह उक्त कथनका तात्पर्य है। शेष कथन सुगम है।
    § २९५. अब भावेन्द्रियका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    लब्धि और उपयोगरूप भावेन्द्रिय है ॥१८॥
    § २९६. लब्धि शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—लम्भनं लब्धिः—प्राप्त होना । शंका— ३०
    लब्धि किसे कहते हैं ? समाधान—ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशम विशेषको लब्धि कहते हैं। जिसके
    संसर्गसे आत्मा द्रव्येन्द्रियकी रचना करनेके लिए उद्यत होता है तन्निमित्तक आत्माके परिणामको
    उपयोग कहते हैं। लब्धि और उपयोग ये दोनों भावेन्द्रियाँ हैं। शंका—उपयोग इन्द्रियका फल है,
    वह इन्द्रिय कैसे हो सकता है ? समाधान—कारणका धर्म कार्यमें देखा जाता है। जैसे घटाकार
    परिणत हुआ ज्ञान भी घट कहलाता है, अतः इन्द्रियके फलको इन्द्रिय माननेमें कोई आपत्ति नहीं ३५
    है । दूसरे इन्द्रियका जो अर्थ है वह मुख्यतासे उपयोगमें पाया जाता है। तात्पर्य यह है कि 'इन्द्रके
    लिंगको इन्द्रिय कहते हैं' यह जो इन्द्रिय शब्दका अर्थ है वह उपयोगमें मुख्य है, क्योंकि जीवका लक्षण
    १. निर्वर्त्यत इति मु० । २. शेषेष्विन्द्रि-मु० । ३. -योगो मुख्यः दि० १, दि० २, मु० ।

१२६ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१९ § २९७ –
§ २९७. उक्तानामिन्द्रियाणां संज्ञानुपूर्वीप्रतिपादनार्थमाह—
'स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राणि ॥१९॥
§ २९८. लोके इन्द्रियाणां पारतन्त्र्यविवक्षा दृश्यते । अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि, अनेन
कर्णेन सुष्ठु शृणोमीति । ततः पारतन्त्र्यात्स्पर्शनादीनां करणत्वम् । वीर्यान्तरायमतिज्ञानावरण-
५ उपयोग है ऐसा वचन है अतः उपयोगको इन्द्रिय मानना उचित है ।
विशेषार्थ—ज्ञानकी अमुक पर्यायको प्रकट न होने देना विवक्षित ज्ञानावरणके सर्वघाती
स्पर्धकोंके उदयका काम है । किन्तु जिस जीवके विवक्षित ज्ञानावरणका क्षयोपशम होता है उसके
उस ज्ञानावरणके सर्वघाती स्पर्धकोंका उदय न होनेसे विवक्षित ज्ञानके प्रकाशमें आनेकी योग्यता
होती है और इसी योग्यताका नाम लब्धि है । ऐसी योग्यता एक साथ सभी क्षायोपशमिक
१० ज्ञानोंकी हो सकती है किन्तु उपयोगमें एक कालमें एक ही ज्ञान आता है । इसका अभिप्राय यह है
कि क्षायोपशमिक ज्ञानकी पर्यायका नाम लब्धि न होकर क्षयोपशमविशेषका नाम लब्धि है और
उपयोग ज्ञानकी पर्यायका नाम है । यही कारण है कि लब्धि एक साथ अनेक ज्ञानोंकी हो सकती
है पर उपयोग एक कालमें एक ही ज्ञानका होता है । पहले प्रथम अध्याय सूत्र १४ में यह कह
आये हैं कि मतिज्ञान इन्द्रिय और मनके निमित्तसे होता है इससे ज्ञात होता है कि उपयोग स्वरूप
१५ ज्ञानकी इन्द्रिय संज्ञा न होकर जो उपयोगरूप मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके होनेमें साधकतम करण है
उसीकी इन्द्रिय संज्ञा है इसलिए वहाँ निर्वृत्ति, उपकरण और लब्धिको इन्द्रिय कहना तो ठीक है,
क्योंकि ये उपयोगरूप मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके होनेमें साधकतम करण हैं पर स्वयं उपयोगको
इन्द्रिय कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वह इन्द्रिय व्यापारका फल है । यह एक शंका है जिसका
समाधान पूज्यपाद स्वामीने दो प्रकारसे किया है । प्रथम तो यह बतलाया है कि कारणके धर्म
२० इन्द्रियत्वका कार्यमें उपचार करके उपयोगको भी इन्द्रिय कहा है । अर्थात् उपयोग स्वयं इन्द्रिय
नहीं है किन्तु इन्द्रियके निमित्तसे वह होता है इसलिए यहाँ उपचारसे उसे इन्द्रिय कहा है । यह
प्रथम समाधान है । दूसरा समाधान करते हुए उन्होंने जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि
जिससे इन्द्र अर्थात् आत्माकी पहचान हो वह इन्द्रिय कहलाती है और ऐसी पहचान करानेवाली
वस्तु निज अर्थ होनी चाहिए । यदि इस दृष्टिसे देखा जाता है तो इन्द्रिय शब्दका मुख्य वाच्य
२५ उपयोग ही ठहरता है, क्योंकि वह आत्माका निज अर्थ है । यही कारण है कि यहाँ उपयोगको
भी इन्द्रिय कहा है । तात्पर्य यह है कि निमित्तकी अपेक्षा विचार करनेपर निर्वृत्ति, उपकरण और
लब्धिको इन्द्रिय संज्ञा प्राप्त होती है और स्वार्थकी अपेक्षा विचार करनेपर उपयोगको इन्द्रिय संज्ञा
प्राप्त होतो है । पहले प्रथम अध्यायमें केवल निमित्तकी अपेक्षा इन्द्रिय शब्दका व्यवहार किया
गया था और यहाँ निमित्त और मुख्यार्थ दोनोंको ध्यानमें रखकर इन्द्रियके भेद दिखलाये गये हैं
३० इसलिए कोई विरोध नहीं है ।
§ २९७. अब उक्त इन्द्रियोंके क्रमसे संज्ञा दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये इन्द्रियाँ हैं ॥१९॥
§ २९८. लोकमें इन्द्रियोंकी पारतन्त्र्य विवक्षा देखी जाती है । जैसे इस आँखसे मैं अच्छा
देखता हूँ, इस कानसे मैं अच्छा सुनता हूँ । अतः पारतन्त्र्य विवक्षामें स्पर्शन आदि इन्द्रियोंका
३५ १. 'बुद्धीन्द्रियाणि चक्षुःश्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि ।' सां० कौ०, श्लो० ६ । घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रि-
याणि भूतेभ्यः ।' –न्या० सू० १, १, १२ ।

  • २।२० § ३०० ] द्वितीयोऽध्यायः १२७
    क्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलाभावष्टम्भादात्मना ^१स्पृश्यतेऽनेनेति स्पर्शनम् । रस्यतेऽनेनेति रसनम् ।
    घ्रायतेऽनेनेति घ्राणम् । चक्षेरनेकार्थत्वाद्दर्शनार्थविवक्षायां चष्टे अर्थान्पश्यत्यनेनेति चक्षुः । श्रूयते-
    ऽनेनेति श्रोत्रम् । स्वातन्त्र्यविवक्षा च दृश्यते । इदं ^२ मे अक्षि सुष्ठु पश्यति । अयं मे कर्णः सुष्ठु
    शृणोति । ततः स्पर्शनादीनां कर्तरि निष्पत्तिः । स्पृशतीति स्पर्शनम् । रसतीति रसनम् । जिघ्र-
    तीति घ्राणम् । चष्टे इति चक्षुः । शृणोतीति श्रोत्रम् । एषां निर्देशक्रमः एकैकवृद्धिक्रमप्रज्ञापनार्थः । ५
    § २९९. तेषामिन्द्रियाणां विषयप्रदर्शनार्थमाह—
    ^३ स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ॥२०॥
    § ३००. द्रव्यपर्याययोः प्राधान्यविवक्षायां कर्मभावसाधनत्वं स्पर्शादिशब्दानां वेदितव्यम् ।
    द्रव्यप्राधान्यविवक्षायां कर्मनिर्देशः । स्पृश्यत इति स्पर्शः । रस्यत इति रसः । गन्ध्यत इति गन्धः । १०
    वर्ण्यत इति वर्णः । शब्दयत इति शब्दः । पर्यायप्राधान्यविवक्षायां भावनिर्देशः । स्पर्शनं स्पर्शः ।
    रसनं रसः । गन्धनं गन्धः । वर्णनं वर्णः । शब्दनं शब्द ^४ इति । एषां क्रम इन्द्रियक्रमेणैव व्याख्यातः ।
    करणपना बन जाता है । वीर्यान्तराय और मतिज्ञानावरणकर्मके क्षयोपशमसे तथा अंगोपांग नाम-
    कर्मके आलम्बनसे आत्मा जिसके द्वारा स्पर्श करता है वह स्पर्शन इन्द्रिय है, जिसके द्वारा स्वाद
    लेता है वह रसन इन्द्रिय है, जिसके द्वारा सूंघता है वह घ्राण इन्द्रिय है । चक्षि धातुके अनेक १५
    अर्थ हैं । उनमें-से यहाँ दर्शनरूप अर्थ लिया गया है इसलिए जिसके द्वारा पदार्थोंको देखता है
    वह चक्षु इन्द्रिय है तथा जिसके द्वारा सुनता है वह श्रोत्र इन्द्रिय है । इसीप्रकार इन इन्द्रियोंकी
    स्वातन्त्र्य विवक्षा भी देखी जाती है । जैसे यह मेरी आँख अच्छी तरह देखती है, यह मेरा कान
    अच्छी तरह सुनता है । और इसलिए इन स्पर्शन आदि इन्द्रियोंकी कर्ताकारकमें सिद्धि होती है ।
    यथा—जो स्पर्श करती है वह स्पर्शन इन्द्रिय है, जो स्वाद लेती है वह रसन इन्द्रिय है, जो सूंघती
    है वह घ्राण इन्द्रिय है, जो देखती है वह चक्षु इन्द्रिय है और जो सुनती है वह कर्ण इन्द्रिय है । २०
    सूत्रमें इन इन्द्रियोंका जो स्पर्शनके बाद रसना और उसके बाद घ्राण इत्यादि क्रमसे निर्देश किया
    है वह एक-एक इन्द्रियकी इस क्रमसे वृद्धि होती है यह दिखलानेके लिए किया है ।
    § २९९. अब उन इन्द्रियोंका विषय दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    स्पर्शन, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द ये क्रमसे उन इन्द्रियोंके विषय हैं ॥२०॥ २५
    § ३००. द्रव्य और पर्यायकी प्राधान्य विवक्षामें स्पर्शादि शब्दोंकी क्रमसे कर्मसाधन अरौ
    भावसाधनमें सिद्धि जानना चाहिए । जब द्रव्यकी अपेक्षा प्रधान रहती है तब कर्मनिर्देश होता
    है । जैसे—जो स्पर्श किया जाता है वह स्पर्श है, जो स्वादको प्राप्त होता है वह रस है, जो सूंघा
    जाता है वह गन्ध है, जो देखा जाता है वह वर्ण है और जो शब्दरूप होता है वह शब्द है । इस
    व्युत्पत्तिके अनुसार ये सब स्पर्शादिक द्रव्य ठहरते हैं । तथा जब पर्यायकी विवक्षा प्रधान रहती ३०
    है तब भावनिर्देश होता है । जैसे—स्पर्शन स्पर्श है, रसन रस है, गन्धन गन्ध है, वर्णन वर्ण है
    और शब्दन शब्द है । इस व्युत्पत्तिके अनुसार ये सब स्पर्शादिक धर्म निश्चित होते हैं । इन
    १. जिघ्रत्यनेन घ्राणं गन्धं गृह्णातीति । रसयत्यनेनेति रसनं रसं गृह्णातीति । चष्टेऽनेनेति चक्षू रूपं
    पश्यतीति × × शृणोत्यनेनेति श्रोत्रं शब्दं गृह्णातीति । —वा० भा० १, १, १२ । २. इमानीन्द्रियाणि
    कदाचित्स्वातन्त्र्येण विवक्षितानि भवन्ति । तद्यथा—इदं मे अक्षि सुष्ठु पश्यति, अयं मे कर्णः सुष्ठु शृणोतीति । ३५
    कदाचित्पारतन्त्र्येण विवक्षितानि भवन्ति—अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि । अनेन कर्णेन सुष्ठु शृणोमि इति ।
    —पा० म० भा० १।२।२।५९ । ३. गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः । —वा० भा० १,
    १, ४१ । ४. -शब्दः । एषां मु० ता० । -शब्दः । तेषां मु० ।

१२८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।२१ § ३०१ -
§ ३०१. अत्राह, यत्तावन्मनोऽनवस्थानादिन्द्रियं न भवतीति प्रत्याख्यातं तत्किमुपयोग-
स्योपकारि उत नेति । तदप्युपकार्य्येव । तेन विनेन्द्रियाणां विषयेषु स्वप्रयोजनवृत्त्यभावात् । किम-
स्यैषां सहकारित्वमात्रमेव प्रयोजनमुतान्यदपीत्यत आह--
श्रुतमनिन्द्रियस्य ॥ २१ ॥
§ ३०२. श्रुतज्ञानविषयोऽर्थः श्रुतम् । स विषयोऽनिन्द्रियस्य; परिप्राप्तश्रुतज्ञानावरणक्षयो-
पशमस्यात्मनः १श्रुतार्थेऽनिन्द्रियालम्बनज्ञानप्रवृत्तेः । अथवा श्रुतज्ञानं श्रुतम्, तदनिन्द्रियस्यार्थः
प्रयोजनमिति यावत् । स्वातन्त्र्यसाध्यमिदं प्रयोजनमनिन्द्रियस्य ।
§ ३०३. उक्तानामिन्द्रियाणां प्रतिनियतविषयाणां स्वामित्वनिर्देशे कर्तव्ये यत्प्रथमं गृहीतं
स्पर्शनं तस्य तावत्स्वामित्वावधारणार्थमाह--
वनस्पत्यन्तानामेकम् ॥२२॥
§ ३०४. एकं प्रथममित्यर्थः । किं तत् । स्पर्शनम् । तत्केषाम् । पृथिव्यादीनां वनस्पत्यन्तानां
वेदितव्यम् । तस्योत्पत्तिकारणमुच्यते--वीर्यान्तरायस्पर्शनैन्द्रियावरणक्षयोपशमे सति शेषेन्द्रिय-
स्पर्शादिकका क्रम इन्द्रियोंके क्रमसे ही व्याख्यात है । अर्थात् इन्द्रियोंके क्रमको ध्यानमें रखकर
इनका कथन किया है ।
§ ३०१. आगे कहते हैं कि मन अनवस्थित है इसलिए वह इन्द्रिय नहीं । इस प्रकार जो
मनके इन्द्रियपनेका निषेध किया है, सो यह मन उपयोगका उपकारी है या नहीं ? मन भी उप-
कारी है, क्योंकि मनके बिना स्पर्शादि विषयोंमें इन्द्रियाँ अपने-अपने प्रयोजनकी सिद्धि करनेमें
समर्थ नहीं होतीं । तो क्या इन्द्रियोंकी सहायता करना ही मनका प्रयोजन है या और भी इसका
प्रयोजन है ? इसी बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
श्रुत मनका विषय है ॥२१॥
§ ३०२. श्रुतज्ञानका विषयभूत अर्थ श्रुत है वह अनिन्द्रिय अर्थात् मनका विषय है, क्योंकि
श्रुतज्ञानावरणके क्षयोपशमको प्राप्त हुए जीवके श्रुतज्ञानके विषयमें मनके आलम्बनसे ज्ञान होता
है । अथवा श्रुत शब्दका अर्थ श्रुतज्ञान है। और वह मनका अर्थ अर्थात् प्रयोजन है। यह प्रयो-
जन मनके स्वतः आधीन है इसमें उसे दूसरेके साहाय्यकी आवश्यकता नहीं लेनी पड़ती ।
विशेषार्थ-यहाँ श्रुत शब्दका अर्थ श्रुतज्ञानका विषय या श्रुतज्ञान किया है और उसे
अनिन्द्रियका विषय बतलाया है । आशय यह है कि श्रुतज्ञानकी उपयोग दशा पाँच इन्द्रियोंके
निमित्तसे न होकर केवल अनिन्द्रियके निमित्तसे होती है। इसका यह अभिप्राय नहीं कि अनि-
न्द्रियके निमित्तसे केवल श्रुतज्ञान ही होता है, किन्तु इसका यह अभिप्राय है कि जिस प्रकार
मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रिय दोनोंके निमित्तसे होता है उस प्रकार श्रुतज्ञान इन दोनोंके
निमित्तसे न होकर केवल अनिन्द्रियके निमित्तसे होता है।
§ ३०३. किस इन्द्रियका क्या विषय है यह बतला आये । अब उनके स्वामियोंका कथन
करना है अतः सर्व प्रथम जो स्पर्शन इन्द्रिय कही है उसके स्वामीका निश्चय करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं-
वनस्पतिकायिक तकके जीवोंके एक अर्थात् प्रथम इन्द्रिय होती है ॥ २२ ॥
३०४. सूत्रमें आये हुए 'एक' शब्दका अर्थ प्रथम है। शंका-यह कौन है ? समाधान-
स्पर्शन । शंका-वह किन जीवोंके होतो है ? समाधान-पृथिवीकायिक जीवोंसे लेकर वनस्पति-
कायिक तकके जीवोंके जानना चाहिए । अब उसकी उत्पत्तिके कारणका कथन करते हैं-वीर्या-
१. श्रुतस्यार्थे मु०, ता०, ना० ।

– २४४ § ३०८ ] द्वितीयोऽध्यायः १२९
सर्वघातिस्पर्धकोदये च शरीरनामलाभावष्टम्भे एकेन्द्रियजातिनामोदयवशवर्तितायां च सत्यां
स्पर्शनमेकमिन्द्रियमाविर्भवति ।
§ ३०५. इतरेषामिन्द्रियाणां स्वामित्वप्रदर्शनार्थमाह—
कृमिपिपीलिकाभ्रमरमनुष्यादीनामेकैकवृद्धानि ॥ २३ ॥
§ ३०६. ‘एकैकम्’ इति वीप्सायां द्वित्वम् । एकैकेन वृद्धानि एकैकवृद्धानि । कृमिमादिं¹
कृत्वा, स्पर्शनाधिकारात् स्पर्शनमादिं कृत्वा एकैकवृद्धानीत्यभिसंबन्धः क्रियते । ‘आदि’शब्दः
प्रत्येकं परिसमाप्यते । कृम्यादीनां स्पर्शनं रसनाधिकम्, पिपीलिकादीनां स्पर्शनरसने घ्राणाधिके,
भ्रमरादीनां स्पर्शनरसनघ्राणानि चक्षुरधिकानि, मनुष्यादीनां तान्येव श्रोत्राधिकानीति यथा-
संख्येनाभिसंबन्धो व्याख्यातः । तेषां निष्पत्तिः स्पर्शनोत्पत्त्या व्याख्याता उत्तरोत्तरसर्वघाति-
स्पर्धकोदयेन ।
§ ३०७. एवमेतेषु संसारिषु द्विभेदेषु इन्द्रियभेदात्पञ्चविधेषु ये पञ्चेन्द्रियास्तद्भेदस्या-
नुक्तस्य प्रतिपादनार्थमाह—
संज्ञिनः समनस्काः ॥२४॥
§ ३०८. मनो व्याख्यातम् । सह तेन ये वर्तन्ते ते समनस्काः । संज्ञिन² इत्युच्यन्ते । पारि-
शेष्यादितरे संसारिणः प्राणिनोऽसंज्ञिन इति सिद्धम् । ननु च संज्ञिन इत्यनेनैव गतार्थत्वात्समनस्का
न्तराय तथा स्पर्शन इन्द्रियावरण कर्मके क्षयोपशमके होनेपर और शेष इन्द्रियोंके सर्वघाती
स्पर्धकोंके उदयके होनेपर तथा शरीर नामकर्मके आलम्बनके होनेपर और एकेन्द्रिय जाति नाम-
कर्मके उदयकी आधीनताके रहते हुए एक स्पर्शन इन्द्रिय प्रकट होती है
§ ३०५. अब इतर इन्द्रियोंके स्वामित्वका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
कृमि, पिपीलिका, भ्रमर और मनुष्य आदिके क्रमसे एक-एक इन्द्रिय अधिक होती है ॥२३॥
§ ३०६. ‘एकैकम्’ यह वीप्सामें द्वित्व है । इन्द्रियाँ एक-एकके क्रमसे बढ़ी हैं इसलिए वे
‘एकैकवृद्ध’ कही गयी हैं । ये इन्द्रियाँ कृमिसे लेकर बढ़ी हैं । यहाँ स्पर्शन इन्द्रिय का अधिकार
स्पर्शन इन्द्रियसे लेकर एक-एकके होनेसे क्रमसे बढ़ी हैं इस प्रकार यहाँ सम्बन्ध कर लेना चाहिए ।
आदि शब्दका प्रत्येकके साथ सम्बन्ध होता है । जिससे यह अर्थ हुआ कि कृमि आदि जीवोंके
स्पर्शन और रसना ये दो इन्द्रियाँ होती हैं । पिपीलिका आदि जोवोंके स्पर्शन, रसना और घ्राण
ये तीन इन्द्रियाँ होतो हैं । भ्रमर आदि जीवोंके स्पर्शन, रसना, घ्राण और चक्षु ये चार
इन्द्रियाँ होती हैं । मनुष्यादिकके श्रोत्र इन्द्रियके और मिला देनेपर पांच इन्द्रियाँ होती हैं ।
इस प्रकार उक्त जीव और इन्द्रिय इनका यथाक्रमसे सम्बन्धका व्याख्यान किया । पहले स्पर्शन
इन्द्रियकी उत्पत्तिका व्याख्यान कर आये हैं उसी प्रकार शेष इन्द्रियोंकी उत्पत्तिका व्याख्यान
करना चाहिए । किन्तु उत्पत्तिके कारणका व्याख्यान करते समय जिस इन्द्रियकी उत्पत्तिके
कारणका व्याख्यान किया जाय, वहाँ उससे अगली इन्द्रिय सम्बन्धी सर्वघाती स्पर्धकोंके उदयके
साथ वह व्याख्यान करना चाहिए ।
§ ३०७. इस प्रकार इन दो प्रकारके और इन्द्रिय-भेदोंकी अपेक्षा पाँच प्रकारके संसारी
जीवमें जो पंचेन्द्रिय जीव हैं उनके भेद नहीं कहे अतः उनका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
मनवाले जीव संज्ञी होते हैं ॥२४॥
§ ३०८. मनका व्याख्यान कर आये । उसके साथ जो रहते हैं वे समनस्क कहलाते हैं ।
१. –किस्यादिं आ० । –कृम्यादि दि० १, दि० २ । २. –ज्ञिनः उच्च्य-दि० १, दि० २, आ० ।
१७

इति विशेषणमनर्थकम्¹ । यतो मनोव्यापारो हिताहितप्राप्तिपरिहारपरीक्षा । संज्ञापि सैवेति ।
नैतद्युक्तम्, संज्ञाशब्दार्थव्यभिचारात् । संज्ञा नामेत्युच्यते । तद्वन्तः संज्ञिन इति सर्वेषामतिप्रसङ्गः ।
संज्ञा ज्ञानमिति चेत्; सर्वेषां प्राणिनां ज्ञानात्मकत्वादतिप्रसङ्गः । आहारादिविषयाभिलाषः संज्ञेति
चेत् । तुल्यम् । तस्मात्समनस्का इत्युच्यते । एवं च कृत्वा गर्भाण्डजमूर्च्छितसुषुप्त्याद्यवस्थासु
५ हिताहितपरीक्षाभावेऽपि मनःसंनिधानात्संज्ञित्वमुपपन्नं भवति ।
§ ३०९. यदि हिताहितादिविषयपरिस्पन्दः प्राणिनां मनःप्रणिधानपूर्वकः । अथाभिनव-
शरीरग्रहणं प्रत्यागूर्णस्य विशीर्णपूर्वमूर्तेर्निर्मनस्कस्य यत्कर्म तत्कृत इत्युच्यते—
विग्रहगतौ कर्मयोगः ॥२५॥
§ ३१०. विग्रहो देहः । विग्रहार्था गतिर्विग्रहगतिः । अथवा विरुद्धो ग्रहो विग्रहो व्याघातः² ।
१० कर्मादानेऽपि नोकर्मपुद्गलादाननिरोध इत्यर्थः । विग्रहेण गतिर्विग्रहगतिः । सर्वशरीरप्ररोहणबीज-
और उन्हें ही संज्ञी कहते हैं । परिशेष न्यायसे यह सिद्ध हुआ कि इनसे अतिरिक्त जितने संसारी
जीव होते हैं वे सब असंज्ञी होते हैं । शंका—सूत्रमें 'संज्ञिनः' इतना पद देनेसे ही काम चल जाता
है, अतः 'समनस्काः' यह विशेषण देना निष्फल है, क्योंकि हितकी प्राप्ति और अहितके त्यागकी
परीक्षा करनेमें मनका व्यापार होता है और यही संज्ञा है ? समाधान—यह कहना उचित नहीं,
१५ क्योंकि संज्ञा शब्दके अर्थमें व्यभिचार पाया जाता है । अर्थात् संज्ञा शब्दके अनेक अर्थ हैं । संज्ञा-
का अर्थ नाम है । यदि नामवाले जीव संज्ञी माने जायें तो सब जीवोंको संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त
होता है । संज्ञाका अर्थ यदि ज्ञान लिया जाता है तो भी सभी प्राणी ज्ञान स्वभाव होनेसे सबको
संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त होता है । यदि आहारादि विषयोंकी अभिलाषाको संज्ञा कहा जाता है तो
भी पहलेके समान दोष प्राप्त होता है । अर्थात् आहारादि विषयक अभिलाषा सबके पायी जाती
२० है इसलिए भी सबको संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त होता है । चूंकि ये दोष न प्राप्त हों अतः सूत्रमें
'समनस्काः' यह पद रखा है । इससे यह लाभ है कि गर्भज, अण्डज, मूर्च्छित और सुषुप्ति आदि
अवस्थाओंमें हिताहितकी परीक्षाके न होनेपर भो मनके सम्बन्धसे संज्ञीपना बन जाता है ।
विशेषार्थ—प्रायः एकेन्द्रिय आदि प्रत्येक जीव अपने इष्ट विषयमें प्रवृत्ति करता है और
अनिष्ट विषयसे निवृत्त होता है, फिर भो मनकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की गयी है सो इसका
२५ कारण यह है कि तुलनात्मक अध्ययन, लोक-परलोकका विचार, हिताहितका विवेक आदि कार्य
ऐसे हैं जो मनके बिना नहीं हो सकते । इसीसे मनकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की गयी है । यह
मन जिनके होता है वे संज्ञी होते हैं अन्य नहीं । जीवोंका संज्ञी और असंज्ञी यह भेद पंचेन्द्रिय
जीवोंमें ही पाया जाता है । अन्य एकेन्द्रियसे लेकर चतुरिन्द्रिय तकके जीव तो असंज्ञी ही होते
हैं । अर्थात् उनके मन न होनेसे उक्त प्रकारके ज्ञानसे वंचित रहते हैं ।
३० § ३०९. यदि जीवोंके हित और अहित आदि विषयके लिए क्रिया मनके निमित्तसे होती
है तो जिसने पूर्व शरीरको छोड़ दिया है और जो मनरहित है ऐसा जीव जब नूतन शरीरको
ग्रहण करनेके लिए उद्यत होता है तब उसके जो क्रिया होती है वह किस निमित्तसे होती है यही
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विग्रहगतिमें कर्मयोग होता है ॥२५॥
३५ § ३१०. विग्रहका अर्थ देह है । विग्रह अर्थात् शरीरके लिए जो गति होती है वह विग्रह-
गति है । अथवा विरुद्ध ग्रहको विग्रह कहते हैं जिसका अर्थ व्याघात है । तात्पर्य यह है कि जिस
अवस्था में कर्मके ग्रहण होनेपर भी नोकर्मरूप पुद्गलोंका ग्रहण नहीं होता वह विग्रह है और
१. -नर्थकम् । मनो- ता०, मु० । २. नोकर्म- ता०, ना० ।

भूतं कार्मणं शरीरं कर्मेत्युच्यते । योगो वाङ्मनसकायवर्गणानिमित्त आत्मप्रदेशपरिस्पन्दः । कर्मणा
कृतो योगः कर्मयोगो विग्रहगतौ भवतीत्यर्थः । तेन कर्मादानं देशान्तरसंक्रमश्च भवति ।
§ ३११. आह जीवपुद्गलानां गतिमास्कन्दतां देशान्तरसंक्रमः किमाकाशप्रदेशक्रमवृत्त्या
भवति, उताविशेषेणेत्यत आह—
अनुश्रेणि गतिः ॥२६॥
§ ३१२. लोकमध्यादारभ्य ऊर्ध्वमधस्तिर्यक् च आकाशप्रदेशानां क्रमसंनिविष्टानां पङ्क्तिः
श्रेणिः इत्युच्यते । 'अनु'शब्दस्यानुपूर्व्येण वृत्तिः । १श्रेणेरानुपूर्व्येणानुश्रेणीति जीवानां पुद्गलानां
च गतिर्भवतीत्यर्थः । अनधिकृतानां पुद्गलानां कथं ग्रहणमिति चेत् । गतिग्रहणात् । यदि जीवाना-
मेव गतिरिष्टा स्याद् गतिग्रहणमनर्थकम्; अधिकारात्तत्सिद्धेः । उत्तरत्र जीवग्रहणाच्च पुद्गल-
संप्रत्ययः । ननु चन्द्रादीनां ज्योतिष्काणां२ मेरुप्रदक्षिणाकाले विद्याधरादीनां च विश्रेणिगतिरपि
दृश्यते, तत्र किमुच्यते, 'अनुश्रेणि गतिः' इति । कालदेशनियमोऽत्र वेदितव्यः । तत्र कालनियम-
स्तावज्जीवानां मरणकाले भवान्तरसंक्रमे मुक्तानां चोर्ध्वगमनकाले अनुश्रेण्येव गतिः । देश-
नियमोऽपि ऊर्ध्वलोकादधोगतिः, अधोलोकादूर्ध्वगतिः, तिर्यग्लोकादधोगतिरूर्ध्वा वा तत्रानुश्रेण्येव ।
पुद्गलानां च या लोकान्तप्रापिणी सा नियमादनुश्रेण्येव । इतरा गतिर्भजनीया ।
इस विग्रहके साथ होनेवाली गतिका नाम विग्रहगति है । सब शरीरोंकी उत्पत्तिके मूलकारण
कार्मण शरीरको कर्म कहते हैं । तथा वचनवर्गणा, मनोवर्गणा और कायवर्गणाके निमित्तसे होने-
वाले आत्मप्रदेशोंके हलनचलनको योग कहते हैं । कर्मके निमित्तसे जो योग होता है वह कर्मयोग
है । वह विग्रहगतिमें होता है यह उक्त कथनका तात्पर्य है । इससे नूतन कर्मका ग्रहण और एक
देशसे दूसरे देशमें गमन होता है ।
§ ३११. गमन करनेवाले जीव और पुद्गलोंका एक देशसे दूसरे देशमें गमन आकाश-
प्रदेशोंकी पंक्तिक्रमसे होता है या इसके बिना होता है, अब इसका खुलासा करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
गति श्रेणीके अनुसार होती है ॥२६॥
§ ३१२. लोकके मध्यसे लेकर ऊपर नीचे और तिरछे क्रमसे स्थित आकाशप्रदेशोंकी
पंक्तिको श्रेणी कहते हैं । अनु शब्द 'आनुपूर्वी' अर्थमें समसित है । इसलिए 'अनुश्रेणि' का अर्थ
'श्रेणीकी आनुपूर्वीसे' होता है । इस प्रकारकी गति जीव और पुद्गलोंकी होती है यह इसका भाव
है । शंका—पुद्गलोंका अधिकार न होनेसे यहाँ उनका ग्रहण कैसे हो सकता है ? समाधान—
सूत्रमें गतिपदका ग्रहण किया है इससे सिद्ध हुआ कि अनधिकृत पुद्गल भी यहाँ विवक्षित हैं ।
यदि जीवोंकी गति ही इष्ट होती तो सूत्रमें गति पदके ग्रहण करनेकी आवश्यकता न थी, क्योंकि
गति पदका ग्रहण अधिकारसे सिद्ध है । दूसरे अगले सूत्रमें जीव पदका ग्रहण किया है इसलिए
इस सूत्रमें पुद्गलोंका भी ग्रहण इष्ट है यह ज्ञान होता है । शंका — चन्द्रमा आदि ज्योतिषियोंकी
और मेरुकी प्रदक्षिणा करते समय विद्याधरोंकी विश्रेणी गति देखी जाती है, इसलिए जीव और
पुद्गलोंकी अनुश्रेणि गति होती है यह किसलिए कहा ? समाधान—यहाँ कालनियम और देश-
नियम जानना चाहिए । कालनियम यथा— मरणके समय जब जीव एक भवको छोड़कर दूसरे
भवके लिए गमन करते हैं और मुक्त जीव जब ऊर्ध्व गमन करते हैं तब उनकी गति अनुश्रेणि ही
होती है । देशनियम यथा—जब कोई जीव ऊर्ध्वलोकसे अधोलोकके प्रति या अधोलोकसे ऊर्ध्व-
लोकके प्रति आता जाता है । इसी प्रकार तिर्यग्लोकसे अधोलोकके प्रति या ऊर्ध्वलोकके प्रति
१. –रानुपूर्वेणा-आ० । २. ज्योतिषां आ०, दि० १, दि० २ ।

१३२ सर्वार्थसिद्धौ [ २।२७ § ३१३ -
§ ३१३. पुनरपि गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह -
अविग्रहा जीवस्य ॥२७॥
§ ३१४. विग्रहो व्याघातः कौटिल्यमित्यर्थः । स यस्यां न विद्यतेऽसावविग्रहा गतिः ।
कस्य । जीवस्य । कीदृशस्य । मुक्तस्य । कथं गम्यते मुक्तस्येति । उत्तरसूत्रे संसारिग्रहणादिह
५ मुक्तस्येति विज्ञायते । ननु च 'अनुश्रेणि गतिः' इत्यनेनैव श्रेण्यन्तरसंक्रमाभावो व्याख्यातः ।
नार्थोऽनेन । पूर्वसूत्रे विश्रेणिगतिरपि क्वचिदस्तीति ज्ञापनार्थमिदं वचनम् । ननु तत्रैव देशकाल-
नियम उक्तः । न; अतस्तत्सिद्धेः ।
§ ३१५. यद्यसङ्गस्यात्मनोऽप्रतिबन्धेन गतिरालोकान्तादवधृतकाला¹ प्रतिज्ञायते, सदेहस्य
पुनर्गतिः किं प्रतिबन्धिनी उत मुक्तात्मवदित्यत आह -
१० विग्रहवती च संसारिणः प्राक् चतुर्भ्यः ॥२८॥
§ ३१६. कालावधारणार्थं 'प्राक्चतुर्भ्यः' इत्युच्यते । 'प्राग्' इति वचनं मर्यादार्थम्, चतुर्था-
त्समयाद्विग्रहवती गतिर्भवति न चतुर्थ इति । कुत इति चेत् । सर्वोत्कृष्टविग्रहनिमित्तनिष्कुट-
क्षेत्रे उत्प्सुः प्राणी निष्कुटक्षेत्रानुपूर्व्यनुश्रेण्यभावादिषु गत्यभावे निष्कुटक्षेत्रप्रापणनिमित्तां त्रिवि-
जाता है तब उस अवस्थामें गति अनुश्रेणि ही होती है । इसी प्रकार पुद्गलोंकी जो लोकके अन्त-
१५ को प्राप्त करानेवाली गति होती है वह अनुश्रेणि ही होती है । हां, इसके अतिरिक्त जो गति होती
है वह अनुश्रेणि भी होती है और विश्रेणि भी । किसी एक प्रकारकी होनेका कोई नियम नहीं है ।
§ ३१३. अब फिर भी गति विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं -
मुक्त जीवकी गति विग्रहरहित होती है ॥२७॥
§ ३१४. विग्रहका अर्थ व्याघात या कुटिलता है । जिस गतिमें विग्रह अर्थात् कुटिलता
२० नहीं होती वह विग्रहरहित गति है । शंका- यह किसके होती है ? समाधान - जीवके । शंका--,
किस प्रकारके जीवके ? समाधान - मुक्त जीवके । शंका- यह किस प्रमाणसे जाना जाता है कि
मुक्तजीवके विग्रहरहित गति होती है ? समाधान-अगले सूत्रमें संसारी पदका ग्रहण किया है
इससे ज्ञात होता है कि इस सूत्रमें मुक्त जीवके विग्रहरहित गति ली गयी है । शंका-'अनुश्रेणि
गतिः' इस सूत्रसे ही यह ज्ञात हो जाता है कि एक श्रेणिसे दूसरी श्रेणिमें संक्रमण नहीं होता फिर
२५ इस सूत्रके लिखनेसे क्या प्रयोजन है ? समाधान - पूर्व सूत्रमें कहींपर विश्रेणिगति भी होती है
इस बातका ज्ञान करानेके लिए यह सूत्र रचा है । शंका- पूर्वसूत्रकी टीकामें ही देशनियम और
कालनियम कहा है ? समाधान-नहीं; क्योंकि उसकी सिद्धि इस सूत्रसे होती है ।
§ ३१५. मुक्तात्माकी लोकपर्यन्त गति बिना प्रतिबन्धके नियत समयके भीतर होती है
यदि ऐसा आपका निश्चय है तो अब यह बतलाइए कि सदेह आत्माकी गति क्या प्रतिबन्धके
३० साथ होती है या मुक्तात्माके समान बिना प्रतिबन्धके होती है, इसी बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं -
संसारी जीवकी गति विग्रहरहित और विग्रहवाली होती है । उसमें विग्रहवाली गति चार
समयसे पहले अर्थात् तीन समय तक होती है ॥२८॥
§ ३१६. कालका अवधारण करनेके लिए 'प्राक्चतुर्भ्यः' पद दिया है । 'प्राक्' पद मर्यादा
३५ निश्चित करनेके लिए दिया है । चार समयसे पहले मोड़ेवाली गति होती है चौथे समयमें नहीं यह
इसका तात्पर्य है । शंका- मोड़ेवाली गति चार समयसे पूर्व अर्थात् तीन समय तक ही क्यों होती
है चौथे समयमें क्यों नहीं होती ? समाधान - निष्कुट क्षेत्रमें उत्पन्न होनेवाले जीवको सबसे अधिक
१. -न्तादवगतकाला मु० ।

  • २।३० § ३२० ] द्वितीयोऽध्यायः १३३
    ग्रहां गतिमारभते नोर्ध्वम्; तथाविधोपपादक्षेत्राभावात् । 'च'शब्दः समुच्चयार्थः । विग्रहवती
    चाविग्रहा¹ चेति ।
    § ३१७. विग्रहवत्या गतेः कालोऽवधृतः । अविग्रहायाः कियान् काल इत्युच्यते—
    एकसमयाऽविग्रहा ॥२९॥
    § ३१८. एकः समयो ²यस्याः सा एकसमया । न विद्यते विग्रहो³ यस्याः सा अविग्रहा । ५
    गतिमतां हि जीवपुद्गलानांमव्याघातैनैकसमयिकी गतिरालोकान्तादपीति ।
    § ३१९. अनादिकर्मसंबन्धसंततौ मिथ्यादर्शनादिप्रत्ययवशात्कर्माण्यादादानो विग्रहगतावप्या-
    हारकः प्रसक्तस्ततो नियमार्थमिदमुच्यते—
    एकं द्वौ त्रीन्वाऽनाहारकः ॥३०॥
    § ३२०. अधिकारात्समयाभिसंबन्धः । 'वा'शब्दो विकल्पार्थः । विकल्पश्च यथेच्छाति- १०
    सर्गः । एकं वा द्वौ वा त्रीन्वा ⁴समयाननाहारको भवतीत्यर्थः । त्रयाणां शरीराणां षण्णां पर्याप्तीनां
    योग्यपुद्गलग्रहणमाहारः । तदभावादनाहारकः । कर्मादानं हि निरन्तरं कार्मणशरीरसद्भावे ।
    उपपादक्षेत्रं प्रति ऋज्ज्व्यां गतौ आहारकः । इतरेषु त्रिषु समयेषु अनाहारकः ॥
    मोड़े लेने पड़ते हैं; क्योंकि वहाँ आनुपूर्वीसे अनुश्रेणिका अभाव होनेसे इषुगति नहीं हो पाती ।
    अतः यह जीव निष्कुट क्षेत्रको प्राप्त करनेके लिए तीन मोड़ेवाली गतिका आरम्भ करता. है । यहाँ १५
    इससे अधिक मोड़ोंकी आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि इस प्रकारका कोई उपपादक्षेत्र नहीं पाया
    जाता, अतः मोड़ेवाली गति तीन समय तक ही होती है, चौथे समयमें नहीं होती । 'च' शब्द
    समुच्चयके लिए दिया है । जिससे विग्रहवाली और विग्रहरहित दोनों गतियोंका समुच्चय होता है ।
    § ३१७. विग्रहवाली गतिका काल मालूम पड़ा । अब विग्रहरहित गतिका कितना काल
    है इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २०
    एक समयवाली गति विग्रहरहित होती है ॥२९॥
    § ३१८. जिस गतिमें एक समय लगता है वह एक समयवाली गति है । जिस गतिमें विग्रह
    अर्थात् मोड़ा नहीं लेना पड़ता वह मोड़ारहित गति है । गमन करनेवाले जीव और पुद्गलोंके
    व्याघातके अभावमें एक समयवाली गति लोकपर्यन्त भी होती है यह इस सूत्रका तात्पर्य है ।
    § ३१९. कर्मबन्धकी परम्परा अनादिकालीन है अतः मिथ्यादर्शन आदि बन्ध कारणोंके २५
    वशसे कर्मोंको ग्रहण करनेवाला जीव विग्रहगतिमें भी आहारक प्राप्त होता है, अतः नियम करनेके
    लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    एक, दो या तीन समय तक जीव अनाहारक रहता है ॥३०॥
    § ३२०. समयका अधिकार होनेसे यहाँ उसका सम्बन्ध होता है । 'वा' पदका अर्थ विकल्प
    है और विकल्प जहाँ तक अभिप्रेत है वहाँ तक लिया जाता है । जीव एक समय तक, दो समय ३०
    तक या तीन समय तक अनाहारक होता है यह इस सूत्रका अभिप्राय है । तीन शरीर और छह
    पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गलोंके ग्रहण करनेको आहार कहते हैं । जिन जीवोंके इस प्रकारका आहार
    नहीं होता वे अनाहारक कहलाते हैं । किन्तु कार्मण शरीरके सद्भावमें कर्मके ग्रहण करनेमें
    अन्तर नहीं पड़ता । जब यह जीव उपपादक्षेत्रके प्रति ऋजुगतिमें रहता है तब आहारक होता
    है । बाकीके तीन समयोंमें अनाहारक होता है । ३५
    १. चाविग्रहवती चेति मु० । २. समयोऽस्याः, एक-आ०, दि० १ । समयोऽस्याः सा एक- दि० २, ता०,
    ना० । ३. -ग्रहोऽस्याः अवि-आ०, दि० १, ता०, ना० । ४. 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे ।' -पा० २, ३, ५ ।

१३४ सर्वार्थसिद्धौ [ २।३१ § ३२१ –
§ ३२१. एवं गच्छतोऽभिनवमूर्त्यन्तरनिर्वृत्तिप्रकारप्रतिपादनार्थमाह—
सम्मूर्च्छनगर्भोषपादा जन्म ॥३१॥
§ ३२२. त्रिषु लोकेषूर्ध्वमधस्तिर्यक् च देहस्य समन्ततो मूच्छनं संमूच्छनमवयवप्रकल्पनम् ।
स्त्रिया उदरे शुक्रशोणितयोर्गरणं मिश्रणं गर्भः । मात्रुपभुक्ताहारगरणाद्वा गर्भः । उपेत्य पद्य-
५ तेऽस्मिन्निति उपपादः । देवनारकोत्पत्तिस्थानविशेषसंज्ञा । एते त्रयः संसारिणां जीवानां जन्म-
प्रकाराः शुभाशुभपरिणामनिमित्तकर्मभेदविपाककृताः ।
§ ३२३. अथाधिकृतस्य संसारविषयोपभोगोपलब्ध्यधिष्ठानप्रवणस्य जन्मनो योनिविकल्पा
वक्तव्या इत्यत आह—
सचित्तशीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः ॥३२॥
१० § ३२४. आत्मनश्चैतन्यविशेषपरिणामश्चित्तम् । सह चित्तेन वर्तत इति सचित्तः । शीत
इति स्पर्शविशेषः; शुक्लादिवदुभयवचनत्वात्तद्युक्तं द्रव्यमप्याह सम्यग्वृतः संवृतः । संवृत इति
दुरुपलक्ष्यप्रदेश उच्यते । सह इतरैर्वर्तन्त इति सेतराः । सप्रतिपक्षा इत्यर्थः । के पुनरितरे । अचि-
तोष्णविवृताः । उभयात्मको मिश्रः । सचित्ताचित्तः शीतोष्णः संवृतविवृत इति । 'च'शब्दः
समुच्चयार्थः । मिश्राश्च योनयो भवन्तीति । इतरथा हि पूर्वोक्तानामेव विशेषणं स्यात् । 'एकशः'
१५ § ३२१. इस प्रकार अन्य गतिको गमन करनेवाले जीवके नूतन दूसरे पर्यायकी उत्पत्तिके
भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सम्मूर्च्छन, गर्भ और उपपाद ये (तीन) जन्म हैं ॥३१॥
§ ३२२. तीनों लोकोंमें ऊपर, नीचे और तिरछे देहका चारों ओरसे मूच्छंन अर्थात् ग्रहण
होना संमूर्च्छन है। इसका अभिप्राय है चारों ओरसे पुद्गलोंको ग्रहण कर अवयवोंकी रचना
२० होना । स्त्रीके उदरमें शुक्र और शोणितके परस्पर गरण अर्थात् मिश्रणको गर्भ कहते हैं । अथवा
माताके द्वारा उपभुक्त आहारके गरण होनेको गर्भ कहते हैं । प्राप्त होकर जिसमें जीव हलन-चलन
करता है उसे उपपाद कहते हैं। उपपाद यह देव और नारकियोंके उत्पत्तिस्थान विशेषकी संज्ञा
है। संसारी जीवोंके ये तीनों जन्मके भेद हैं, जो शुभ और अशुभ परिणामोंके निमित्तसे अनेक
प्रकारके कर्म बँधते हैं, उनके फल हैं।
२५ § ३२३. यहाँ तक संसारी विषयोंके उपभोगकी प्राप्तिमें आधारभूत जन्मोंका अधिकार
था। अब इनकी योनियोंके भेद कहने चाहिए, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सचित्त, शीत और संवृत तथा इनकी प्रतिपक्षभूत अचि उष्ण और विवृत तथा मिश्र
अर्थात् सचित्ताचित्त, शोतोष्ण और संवृतविवृत ये उसकी अर्थात् जन्मकी योनियाँ हैं ॥३२॥
§ ३२४. आत्माके चैतन्यविशेषरूप परिणामको चित्त कहते हैं। जो उसके साथ रहता है
३० वह सचित्त कहलाता है। शीत यह स्पर्शका एक भेद है। शुक्ल आदिके समान यह द्रव्य और
गुण दोनोंका वाची है अतः शीतगुणवाला द्रव्य भो शीत कहलाता है। जो भले प्रकार ढका हो
वह संवृत कहलाता है। यहाँ संवृत ऐसे स्थानको कहते हैं जो देखनेमें न आवे। इतरका अर्थ अन्य
है और इनके साथ रहनेवाले सेतर कहे जाते हैं। शंका-वे इतर कौन हैं ? समाधान-अचित्त,
उष्ण और विवृत । जो उभयरूप होते हैं वे मिश्र कहलाते हैं। यथा-सचित्ताचित्त, शीतोष्ण
३५ १. -निर्वृत्तिजन्मप्रका-मु० । २. शुक्लशोणित-ता०, ना०, दि० १, मु० । ३. मात्रोपभुक्त-मु० । मात्रो-
पयुक्त -दि० १, दि० २ । ४. उपेत्योत्पद्य-मु० । ५. -लब्ध्याधिष्ठा-आ०, दि० १, दि० २ । ६. -कल्पो
वक्तव्यः आ० ता०, ना० । ७. सम्यग्वृतः संवृत इति आ० दि० १, दि० २ ।
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इति वीप्सार्थः । तस्य ग्रहणं क्रममिश्रप्रतिपत्त्यर्थम् । यथैवं विज्ञायेत—सचित्तश्च अचित्तश्च,
शीतश्च उष्णश्च, संवृतश्च विवृतश्चेति । मैवं विज्ञायि—सचित्तश्च शीतश्चेत्यादि । 'तद्ग्रहणं
जन्मप्रकारप्रतिनिर्देशार्थम् । तेषां संमूर्च्छनादीनां जन्मनां योनय इति । त एते नव योनयो वेदि-
तव्याः । योनिजन्मनोरविशेष इति चेत् । न; आधाराधेयभेदात्तद्भेदः । त एते सचित्तादयो योनय
आधाराः । आधेया जन्मप्रकाराः । यतः सचित्तादियोन्यधिष्ठाने आत्मा संमूर्च्छनादिना जन्मना
शरीराहारेन्द्रियादियोग्यान्पुद्गलानुपादत्ते । देवनारका अचित्तयोनयः । तेषां हि योनिरुपपाददेश-
पुद्गलप्रचयोऽचित्तः । गर्भजा मिश्रयोनयः । तेषां हि मातुरुदरे शुक्रशोणितमचित्तम्, तदात्मना
चित्तवता मिश्रणान्मिथयोनिः१। संमूर्च्छनजास्त्रिविकल्पयोनयः । केचित्सचित्तयोनयः । अन्ये
अचित्तयोनयः । अपरे मिश्रयोनयः । सचित्तयोनयः साधारणशरीराः । कुतः । परस्पराश्रयत्वात् ।
इतरे अचित्तयोनयो मिश्रयोनयश्च । शीतोष्णयोनयो देवनारकाः । तेषां हि उपपादस्थानानि
कानिचिच्छीतानि कानिचिदुष्णानीति । उष्णयोनयस्तैजस्कायिकाः । इतरे त्रिविकल्पयोनयः ।
केचिच्छीतयोनयः । केचिदुष्णयोनयः । अपरे मिश्रयोनय इति । देवनारकैकेन्द्रियाः संवृतयोनयः ।
विकलेन्द्रिया विवृतयोनयः । गर्भजाः मिश्रयोनयः । तद्भेदाश्चतुरशीतिशतसहस्रसंख्या आगमतो
वेदितव्याः । उक्तं च—
और संवृतविवृत । सूत्रमें 'च' शब्द समुच्चयवाची है । जिससे योनियां मिश्र भी होती हैं' इसका
समुच्चय हो जाता है । यदि 'च' पदका यह अर्थ न लिया जाय तो मिश्रपद पूर्वोक्त पदोंका ही
विशेषण हो जाता । 'एकशः' यह पद वीप्सावाची है । सूत्रमें इस पदका ग्रहण क्रम और मिश्रका
ज्ञान करानेके लिए किया है । जिससे यह ज्ञान हो कि सचित्त, अचित्त, शीत, उष्ण, संवृत, विवृत
इस क्रमसे योनियाँ ली हैं । यह ज्ञान न हो कि सचित्त, शीत इत्यादि क्रमसे योनियाँ ली हैं ।
जन्मके भेदोंके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'तत्' पदका ग्रहण किया है । उन संमूर्च्छन आदि जन्मोंकी
ये नौ योनियां हैं यह इसका भाव है । शंका—योनि और जन्ममें कोई भेद नहीं ? समाधान—
नहीं, क्योंकि आधार और आधेयके भेदसे उनमें भेद हैं । ये सचित्त आदिक योनियाँ आधार हैं
ओर जन्मके भेद आधेय हैं, क्योंकि सचित्त आदि योनिरूप आधारमें संमूर्च्छन आदि जन्मके द्वारा
आत्मा, शरीर, आहार और इन्द्रियोंके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करता हैं । देव और नारकियोंकी
अचित्त योनि होती है, क्योंकि उनके उपपाददेशके पुद्गलप्रचयरूप योनि अचित्त है । गर्भजोंकी
मिश्र योनि होती है, क्योंकि उनकी माताके उदरमें शुक्र और शोणित अचित्त होते हैं जिनका
सचित्त माताकी आत्मासे मिश्रण है इसलिए वह मिश्रयोनि है । संमूर्च्छनोंकी तीन प्रकारकी
योनियाँ होती हैं । किन्हींकी सचित्त योनि होती है, किन्हींको अचित्तयोनि होती है और किन्हींकी
मिश्रयोनि होतो है । साधारण शरीरवाले जीवोंकी सचित्त योनि होती है क्योंकि ये एक-दूसरेके
आश्रयसे रहते हैं । इनमें अतिरिक्त शेष संमूर्च्छन जीवोंके अचित्त और मिश्र दोनों प्रकारकी
योनियाँ होती हैं । देव और नारकियोंकी शीत और उष्ण दोनों प्रकारकी योनियाँ होती हैं;
क्योंकि इनके कुछ उपपादस्थान शीत हैं और कुछ उष्ण । तेजस्कायिक जीवोंकी उष्णयोनि होती
है । इनसे अतिरिक्त जीवोंकी योनियाँ तीन प्रकारकी होती हैं । किन्हींकी शीत योनियाँ होती हैं,
किन्हींको उष्णयोनियाँ होती हैं और किन्हींकी मिश्रयोनियाँ होती हैं । देव, नारकी और एके-
न्द्रियोंकी संवृत योनियाँ होती हैं । विकलेन्द्रियोंकी विवृत योनियाँ होती हैं । तथा गर्भजोंकी मिश्र
योनियाँ होती हैं । इन सब योनियोंके चौरासी लाख भेद हैं यह बात आगमसे जाननी चाहिए ।
कहा भी है—

१. –मिश्रं मिश्रयोनिः आ०, दि० १, दि० २ ।