सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदधिवलयप्रतिष्ठाः । घनोदधिवलयं घनवातवलयप्रतिष्ठम् । घनवातवलयं तनुवातवलयप्रतिष्ठम् ।
तनुवातवलयमाकाशप्रतिष्ठम् । आकाशमात्मप्रतिष्ठं, तस्यैवाधाराधेयत्वात् । त्रीण्यप्येतानि वलयानि
प्रत्येकं विंशतियोजनसहस्रबाहुल्यानि । 'सप्त'ग्रहणं संख्यान्तरनिवृत्त्यर्थम् । सप्त भूमयो नाष्टौ न नव
चेति 'अधोऽधः'वचनं तिर्यक्प्रचयनिवृत्त्यर्थम् ।
§ ३६८. किं ता भूमयो नारकाणां सर्वत्रावासा आहोस्वित्क्वचित्क्वचिदिति तन्निर्धार-
णार्थमाह—
तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरकशतसहस्राणि
पञ्च चैव यथाक्रमम् ॥२॥
य सब भूमियाँ घनोदधिवातवलयके आश्रयसे स्थित हैं । घनोदधिवातवलय घनवातवलयके आधार-
से स्थित है। घनवातवलय तनुवातवलयके आश्रयसे स्थित है। तनुवातवलय आकाशके आश्रयसे
स्थित है और आकाश स्वयं अपने आधारसे स्थित है; क्योंकि वह आधार और आधेय दोनों है ।
ये तीनों वातवलय प्रत्येक बीस-बीस हजार योजन मोटे हैं । सूत्रमें 'सप्त' पदका ग्रहण दूसरी
संख्याके निराकरण करनेके लिए किया है। भूमियाँ सात ही हैं, न आठ हैं और न नौ । ये भूमियाँ
तिर्यक् रूपसे अवस्थित नहीं हैं। इस बातको दिखानेके लिए सूत्रमें 'अधोऽधः' यह वचन दिया है।
विशेषार्थ—आकाशके दो भेद हैं—अलोकाकाश और लोकाकाश । लोकाकाश अलोका-
काशके बीचोबीच अवस्थित है । यह अकृत्रिम, अनादिनिधन स्वभावसे निर्मित और छह द्रव्योंसे
व्यास है। यह उत्तर-दक्षिण अधोभागसे लेकर ऊर्ध्वभाग तक विस्तारकी अपेक्षा सर्वत्र सात राजु
है। पूर्व पश्चिम नीचे सात राजु चौड़ा है। फिर दोनों ओरसे घटते-घटते सात राजुकी ऊँचाईपर
एक राजु चौड़ा है। फिर दोनों ओर बढ़ते-बढ़ते साढ़े दस राजुकी ऊँचाईपर पाँच राजु चौड़ा है।
फिर दोनों ओर घटते-घटते चौदह राजुकी ऊँचाईपर एक राजु चौड़ा है। पूर्व पश्चिमकी ओरसे
लोकका आकार कटिपर दोनों हाथ रखकर और पैरोंको फैलाकर खड़े हुए मनुष्यके आकारका
प्रतीत होता है । इससे अधोभाग वेतके आसनके समान, मध्यभाग झालरके समान और ऊर्ध्वभाग
मृदंगके समान दिखाई देता है। इसके तीन भाग हैं—अधोलोक, मध्यलोक और ऊर्ध्वलोक ।
मध्यलोकके बीचोबीच मेरु पर्वत है जो एक लाख चालीस योजन ऊँचा है । उसके नीचेका भाग
अधोलोक, ऊपरका भाग ऊर्ध्वलोक और बराबर रेखामें तिरछा फैला हुआ मध्यलोक है। मध्य-
लोकका तिरछा विस्तार अधिक होनेसे इसे तिर्यग्लोक भी कहते हैं। प्रकृत सूत्रमें अधोलोकका
विचार किया गया है। इसमें सात भूमियाँ हैं जो उत्तरोत्तर नीचे-नीचे हैं पर आपसमें
भिड़कर नहीं हैं। किन्तु एक दूसरी भूमिके बीचमें असंख्य योजनोंका अन्तर है। इन भूमियोंके
नाम सूत्रमें क्रमसे दिये ही हैं। ये इनके गुणनाम हैं । घम्मा, वंशा, मेघा, अंजना, अरिष्टा,
मघवा और माधवी ये इनके रौढिक नाम हैं। पहली पृथिवी एक लाख अस्सी हजार योजन
मोटी है। दूसरी बत्तीस हजार योजन मोटी है, तीसरी अट्ठाईस हजार योजन मोटी है, चौथी
चौबीस हजार योजन मोटी है, पाँचवीं बीस हजार योजन मोटो है, छठी सोलह हजार
योजन मोटी है, और सातवीं आठ हजार योजन मोटी है । ये सातों भूमियाँ घनोदधि, घनवात,
तनुवात और आकाशके आधारसे स्थित हैं। अर्थात् प्रत्येक पृथिवी घनोदधिके आधारसे स्थित है,
घनोदधि घनवातके आधारसे स्थित है, घनवात तनुवातके आधारसे स्थित है, तनुवात आकाशके
आधारसे स्थित है और आकाश अपने आधारसे स्थित है ।
§ ३६८. क्या इन भूमियोंमें सर्वत्र नारकियोंके निवास-स्थान हैं या कहीं-कहीं, इस बातका
निश्चय करनेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
उन भूमियोंमें क्रमसे तीस लाख, पचीस लाख, पन्द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पाँच
कम एक लाख और पाँच नरक हैं ॥२॥