सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।६ § ३७६ –
विशेषणम्। उपरि तिसृषु पृथिवीषु संक्लिष्टासुरा बाधाहेतवो नातः परमिति प्रदर्शनार्थम्। ‘च’-
शब्दः पूर्वोक्तदुःखहेतुसमुच्चयार्थः। सुतप्तायोरसपायननिष्ठप्तायस्तम्भालिङ्गनकूटशाल्मल्यारोहणाव-
तरणायोधनाभिघातवासीक्षुरतक्षणक्षारतप्ततैलावसेचनायःकुम्भीपाकाम्बरीषभर्जनवैतरणीमज्जन -
यन्त्रनिष्पीडनादिभिर्नारकाणां दुःखमुत्पादयन्ति। एवं छेदनभेदनादिभिः शकलीकृतमूर्तीनामपि तेषां
न मरणमकाले भवति। कुतः। अनपवर्त्यायुष्कत्वात् १।
§ ३७६. यद्येवं, तदेव तावदुच्यतां नारकाणामायुःपरिमाणमित्यत आह—
तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां
परा स्थितिः ॥६॥
§ ३७७. यथाक्रममित्यनुवर्तते । तेषु नरकेषु भूमिक्रमेण यथासंख्यमेकादयः स्थितयोऽभि-
संबध्यन्ते। रत्नप्रभायामुत्कृष्टा स्थितिरेकसागरोपमा। शर्कराप्रभायां त्रिसागरोपमा। वालुका-
प्रभायां सप्तसागरोपमा। पङ्कप्रभायां दशसागरोपमा। धूमप्रभायां सप्तदशसागरोपमा। तमःप्रभायां
नहीं कि सब असुर नारकियोंको दुःख उत्पन्न कराते हैं। किन्तु अम्बावरीष आदि कुछ असुर ही
दुःख उत्पन्न कराते हैं। मर्यादाके दिखलानेके लिए सूत्रमें ‘प्राक् चतुर्थ्याः' यह विशेषण दिया है।
इससे यह दिखलाया है कि ऊपरकी तीन पृथिवियोंमें ही संक्लिष्ट असुर बाधाके कारण हैं इससे
आगे नहीं। सूत्रमें ‘च’ शब्द पूर्वोक्त दुःखके कारणोंका समुच्चय करनेके लिए दिया है। परस्पर
खूब तपाया हुआ लोहेका रस पिलाना, अत्यन्त तपाये गये लौहस्तम्भका आलिंगन, कूट और
सेमरके वृक्षपर चढ़ाना-उतारना, लोहेके घनसे मारना, वसूला और छुरासे तरासना, तपाये गये
खारे तेलसे सींचना, तेलकी कढ़ाईमें पकाना, भाड़में भूंजना, वैतरणीमें डुबाना, यन्त्रसे पेलना
आदिके द्वारा नारकियोंके परस्पर दुःख उत्पन्न कराते हैं। इस प्रकार छेदन, भेदन आदिके द्वारा
उनका शरीर खण्ड-खण्ड हो जाता है तो भी उनका अकालमें मरण नहीं होता है, क्योंकि उनको
आयु घटती नहीं।
विशेषार्थ—नारक जीव स्वभावसे क्रूर स्वभाववाले होते हैं। एक-दूसरेको देखते ही उनका
क्रोध भभक उठता है और वे एक-दूसरेको मारने काटने लगते हैं। उनका शरीर वैक्रियिक होता है
इसलिए उससे वे नाना प्रकारके आयुध आदिका आकार धारण कर उनसे दूसरे नारकियोंको पीड़ा
पहुँचाते हैं। तीसरे नरक तक देवोंका भी गमन होता है, इसलिए ये भी कुतूहल वश उन्हें आपसमें
भिड़ा देते हैं और उनका घात-प्रत्याघात देखकर मजा लूटते हैं। पर यह काम सब देव नहीं करते
किन्तु अम्बावरीष आदि जातिके कुछ ही असुर कुमार देव करते हैं। इतना सब होते हुए भी उन
नारकियोंका अकाल मरण नहीं होता इतना यहाँ विशेष जानना चाहिए।
§ ३७६. यदि ऐसा है तो यह कहिए कि उन नारकियोंकी कितनी आयु है ? इसी बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन नरकोंमें जीवोंकी उत्कृष्ट स्थिति क्रमसे एक, तीन, सात, दस, सत्रह, बाईस और
तैंतीस सागर है ॥६॥
§ ३७७. इस सूत्रमें ‘यथाक्रमम्’ इस पदकी अनुवृत्ति होती है। जिससे उन नरकोंमें भूमिके क्रमसे
एक सागर आदि स्थितियोंका क्रमसे सम्बन्ध हो जाता है। रत्नप्रभामें एक सागर उत्कृष्ट स्थिति
है। शर्कराप्रभामें तीन सागर उत्कृष्ट स्थिति है। वालुकाप्रभामें सात सागर उत्कृष्ट स्थिति है।
पंकप्रभामें दस सागर उत्कृष्ट स्थिति है। धूमप्रभामें सत्रह सागर उत्कृष्ट स्थिति है। तमःप्रभामें
१. –युषत्वात् आ० दि० १, दि० २ ।
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