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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 558 में से

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पृष्ठ 261

§ ३६९. तासु रत्नप्रभादिषु भूमिषु नरकाण्यनेन संख्यायन्ते यथाक्रमम् । रत्नप्रभायां
त्रिंशन्नरकशतसहस्राणि, शर्कराप्रभायां पञ्चविंशतिर्नरकतसहस्राणि, वालुकाप्रभायां पञ्चदश
नरकशतसहस्राणि, पङ्कप्रभायां दश नरकशतसहस्राणि, धूमप्रभायां त्रीणि नरकशतसहस्राणि,
तमःप्रभायां पञ्चोनमेकं नरकशतसहस्रं, महातमःप्रभायां पञ्च नरकाणि । रत्नप्रभायां नरकप्रस्ता-
रास्त्रयोदश । ततोऽध आ सप्तम्या द्वौ¹ द्वौ नरकप्रस्तारौ² हीनौ । इतरो विशेषो लोकानुयोगतो
वेदितव्यः ।
§ ३७०. अथ तासु भूमिषु नारकाणां कः प्रतिविशेष इत्यत आह—
नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रियाः ॥३॥
§ ३७१. लेश्यादयो व्याख्यातार्थाः । अशुभतरा इति प्रकर्षनिर्देशः तिर्यग्गतिविषयाशुभ-
लेश्याद्यपेक्षया, अधोऽधः स्वगत्यपेक्षया च वेदितव्यः । 'नित्य'शब्द³ आभीक्ष्ण्यवचनः । नित्य-
§ ३६९. उन रत्नप्रभा आदि भूमियोंमें, इस सूत्र-द्वारा क्रमसे नरकोंकी संख्या बतलायी
गयी है । रत्नप्रभामें तीस लाख नरक हैं। शर्कराप्रभामें पचीस लाख नरक हैं । वालुकाप्रभामें
पन्द्रह लाख नरक हैं। पंकप्रभामें दश लाख नरक हैं। धूमप्रभामें तीन लाख नरक हैं। तमःप्रभामें
पाँच कम एक लाख नरक हैं और महातमःप्रभामें पाँच नरक हैं। रत्नप्रभामें तेरह नरक पटल हैं ।
इससे आगे सातवीं भूमि तक दो-दो नरक पटल कम हैं। इसके अतिरिक्त और विशेषता लोकानु-
योगसे जान लेनी चाहिए।
विशेषाथ—पहले सात पृथिवियोंका निर्देश किया ही है। उनमेंसे पहली पृथिवीके तीन
भाग हैं—खरभाग, पंकभाग और अब्बहुल भाग । खर भाग सबसे ऊपर है। इसमें रत्नोंकी
बहुतायत है और यह सोलह हजार योजन मोटा है। दूसरा पंकभाग है, इसकी मोटाई चौरासी
हजार योजन है। तथा तीसरा अब्बहुल भाग है। इसकी मोटाई अस्सी हजार योजन है।
नारकियोंके रहनेके आवासको नरक कहते हैं। रत्नप्रभा भूमिके प्रथम भाग और दूसरे भाग
में नरक नहीं हैं। तीसरे भागमें हैं। इस प्रकार प्रथम भूमिके तीसरे भागकी और शेष छह भूमियों
को जितनी-जितनी मोटाई बतलायी है उसमें से ऊपर और नीचे एक-एक हजार योजन भूमिको
छोड़कर सातों भूमियोंके बाकीके मध्य भागमें नरक हैं। इनका आकार विविध प्रकारका है। कोई
गोल हैं, कोई त्रिकोण हैं, कोई चौकोण हैं और कोई अनिश्चित आकारवाले हैं। ये सब नरकपटल
क्रमसे अवस्थित हैं। जिस प्रकार पत्थर या मिट्टीके एक थरपर दूसरा थर अवस्थित होता है उसी
प्रकार ये पटल हैं। पहली भूमिमें ये पटल तेरह हैं और आगेकी भूमियोंमें दो-दो पटल कम होते
गये हैं। एक पटल दूसरे पटलसे सटा हुआ है। इनमें नरक हैं। नरक जमीनके भीतर कुएँके
समान पोलका नाम है। यह ऊपर, नीचे, चारों ओर जमीनसे घिरी रहती है। इन्हीं नरकोंमें
नारकी जीव अपनी आयुके अन्तिम समय तक रहते हैं और वहां नाना प्रकारके दुःख भोगते हैं।
§ ३७०. उन भूमियोंमें रहनेवाले नारकियोंमें क्या विशेषता है इस बातको बतलानेके लिए
अब आगे का सूत्र कहते हैं—
नारकी निरन्तर अशुभतर लेश्या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रियावाले हैं ॥३॥
§ ३७१. लेश्यादिकका पहले व्याख्यान कर आये हैं। 'अशुभतर' इस पद के द्वारा तिर्यंचगति-
में प्राप्त होनेवाली अशुभ लेश्या आदिककी अपेक्षा और नीचे-नीचे अपनी गतिकी अपेक्षा लेश्यादिक-
१. –सप्तम्या द्वं द्वं नरक-आ० दि० १, दि० २ । २. -प्रस्तारा हीनाः । इतरो आ०, दि० १, दि० २ ।
२. लोकनियोगतो दि० १, दि० २। ३. 'अर्थ खलु नित्यशब्दो नावश्यं कूटस्थेष्वविचालिषु भावेषु वर्तते ।
किं तर्हि ? आभीक्ष्ण्येऽपि वर्तते । तद्यथा-नित्यप्रहसितो नित्यप्रजल्पित इति ।' पा० म० भा०, पृ० ५७ ।