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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 558 में से

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पृष्ठ 265

द्वाविंशतिसागरोपमा । महातमःप्रभायां त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा इति । परा उत्कृष्टेत्यर्थः । 'सत्त्वानाम्'
इति वचनं भूमिनिवृत्त्यर्थम् । भूमिषु सत्त्वानामिदं स्थितिः, न भूमीनामिति ।
§ ३७८. उक्तः सप्तभूमिविस्तीर्णोऽधोलोकः । इदानीं तिर्यग्लोको वक्तव्यः । कथं पुनस्तिर्य-
ग्लोकः । यतोऽसंख्येयाः स्वयंभूरमणपर्यन्तास्तिर्यक्प्रचयविशेषेणावस्थिता द्वीपसमुद्रास्ततस्तिर्यग्लोक
इति । के¹ पुनस्तिर्यग्व्यवस्थिता इत्यत आह—
जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥
§ ३७९. जम्बूद्वीपाद‌यो द्वीपाः । लवणोदादयः समुद्राः । यानि लोके शुभानि नामानि
तन्नामानस्ते । तद्यथा—जम्बूद्वीपो द्वीपः । लवणोदः समुद्रः । घातकीखण्डो द्वीपः । कालोदः समुद्रः ।
पुष्करवरो द्वीपः । पुष्करवरः समुद्रः । ' वारुणीवरो द्वीपः । वारुणीवरः समुद्रः । क्षीरवरो द्वीपः ।
क्षीरवरः समुद्रः । घृतवरो द्वीपः । घृतवरः समुद्रः । इक्षुवरो द्वीपः । इक्षुवरः समुद्रः । नन्दीश्वरवरो
द्वीपः । नन्दीश्वरवरः समुद्रः । ' अरुणवरो द्वीपः । अरुणवरः समुद्रः । इत्येवमसंख्येया द्वीपसमुद्राः
स्वयंभूरमणपर्यन्ता वेदितव्याः ।
§ ३८०. अमीषां विष्कम्भसंनिवेशसंस्थानविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
द्विर्द्विर्विष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणो वलयाकृतयः ॥८॥
§ ३८१. द्विर्द्विरिति ²वीप्साभ्यावृत्तिवचनं विष्कम्भद्विगुणत्वव्याप्त्यर्थम् । आद्यस्य द्वीपस्य
यो विष्कम्भः तद्द्विगुणविष्कम्भो लवणजलधिः । तद्द्विगुणविष्कम्भो द्वितीयो द्वीपः । तद्द्विगुण-
बाईस सागर उत्कृष्ट स्थिति है और महातमःप्रभामें तैंतीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । 'परा' शब्द-
का अर्थ 'उत्कृष्ट' है । और 'सत्त्वानाम्' पद भूमियोंके निराकरण करनेके लिए दिया है । अभिप्राय
यह है कि भूमियोंमें जीवोंकी यह स्थिति है भूमियोंकी नहीं ।
§ ३७८. सात भूमियोंमें बंटे हुए अधोलोकका वर्णन किया । अब तिर्यग्लोकका कथन
करना चाहिए । शंका—तिर्यग्लोक यह संज्ञा क्यों है ? समाधान—चूँकि स्वयम्भूरमण समुद्र पर्यन्त
असंख्यात द्वीप-समुद्र तिर्यक् प्रचयविशेषरूपसे अवस्थित हैं इसलिए तिर्यग्लोक संज्ञा है । वे तिर्यक्
रूपसे अवस्थित क्या हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जम्बूद्वीप आदि शुभ नामवाले द्वीप और लवणोद आदि शुभ नामवाले समुद्र हैं ॥७॥
§ ३७९. जम्बूद्वीप आदिक द्वीप हैं और लवणोद आदिक समुद्र हैं। तात्पर्य यह है कि
लोकमें जितने शुभ नाम हैं उन नामवाले वे द्वीप समुद्र हैं। यथा-जम्बूद्वीप नामक द्वीप, लवणोद
समुद्र, घातकीखण्ड द्वीप, कालोद समुद्र, पुष्करवर द्वीप, पुष्करवर समुद्र, वारुणोवर द्वीप, वारुणी-
वर समुद्र, क्षीरवर द्वीप, क्षीरवर समुद्र, घृतवर द्वीप, घृतवर समुद्र, इक्षुवर द्वीप, इक्षुवर समुद्र,
नन्दीश्वरवर द्वीप, नन्दीश्वरवर समुद्र, अरुणवर द्वीप और अरुणवर समुद्र, इस प्रकार स्वयंभूरमण
पर्यन्त असंख्यात द्वीप-समुद्र जानने चाहिए ।
§ ३८०. अब इन द्वीप-समुद्रोंके विस्तार, रचना और आकारविशेषका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
वे सभी द्वीप और समुद्र दूने-दूने व्यासवाले, पूर्व-पूर्व द्वीप और समुद्रको वेष्टित करनेवाले
और चूड़ीके आकारवाले हैं ॥ ८ ॥
§ ३८१. द्वीप-समुद्रोंका विस्तार दूना-दूना है इस बातको दिखलानेके लिए सूत्रमें 'द्विर्द्विः'
इस प्रकार वीप्सा अर्थमें अभ्यावृत्ति वचन है । प्रथम द्वीपका जो विस्तार है लवणसमुद्रका विस्तार
१. के पुनस्ते तिर्य-आ०, दि० १ । २. वीप्सायां वृत्तिवचनं आ०, दि० १, दि० २, मु० ।
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