सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ सर्वार्थसिद्धौ [ २।३३ § ३२५ -
'णिच्चिदरधादु सत्त य तरु दस वियलिंदिएसु छच्चेव ।
सुरणिरयतिरिय चउरो चोद्दस मणुए सदसहस्सा१ ॥'
§ ३२५. एवमेतस्मिन्नवयोनिभेदसंकटे त्रिविधजन्मनि सर्वप्राणभृतामनियमेन प्रसक्ते तदव-
धारणार्थमाह—
जरायुजाण्डजपोतानां गर्भः ॥३३॥
§ ३२६. यज्जालवत्प्राणिपरिवरणं विततमांसशोणितं तज्जरायुः । यन्नखत्वक्सदृशमुपात्त-
काठिन्यं शुक्रशोणितपरिवरणं परिमण्डलं तदण्डम् । किंचित्परिवरणमन्तरेण परिपूर्णावयवो योनि-
निर्गतमात्र एव परिस्पन्दादिसामर्थ्योपेतः पोतः । जरायो जातां जरायुजाः । अण्डे जाता अण्डजाः ।
जरायुजाश्च अण्डजाश्च पोताश्च जरायुजाण्डजपोता गर्भोयोनयः ।
§ ३२७. यद्यमीषां जरायुजाण्डजपोतानां गर्भोऽवध्रियते, अथोपपादः केषां भवतीत्यत आह—
देवनारकाणामुपपादः ॥३४॥
देवानां नारकाणां चोपपादो जन्म वेदितव्यम् ।
§ ३२८. अथान्येषां किं जन्मेत्यत आह—
शेषाणां संमूर्च्छनम् ॥३५॥
§ ३२९. गर्भजेभ्य औपपादिकेभ्यश्चान्ये शेषाः । संमूर्च्छनं जन्मेति । एते त्रयोऽपि योगा
नियमार्थाः । उभयतो नियमश्च द्रष्टव्यः । जरायुजाण्डजपोतानामेव गर्भः । गर्भ एव च जरायु-
'नित्यनिगोद, इतरनिगोद, पृथिवीकायिक जलकायिक, अग्निकायिक, और वायुकायिक
जीवोंकी सात-सात लाख योनियां हैं । वृक्षोंको दस लाख योनियाँ हैं । विकलेन्द्रियोंकी मिलाकर
छह लाख योनियाँ हैं । देव, नारकी और तिर्यंचोंकी चार-चार लाख योनियाँ हैं तथा मनुष्योंकी
चौदह लाख योनियाँ हैं ।'
§ ३२५. इस प्रकार नौ योनियोंसे युक्त तीन जन्म सब जीवोंके अनियमसे प्राप्त हुए अतः
निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जरायुज, अण्डज और पोत जीवोंका गर्भजन्म होता है ॥३३॥
§ ३२६. जो जालके समान प्राणियोंका आवरण है और जो मांस और शोणितसे बना है
उसे जरायु कहते हैं। जो नखकी त्वचाके समान कठिन है, गोल है और जिसका आवरण शुक्र
और शोणितसे बना है उसे अण्ड कहते हैं । जिसके सब अवयव बिना आवरणके पूरे हुए हैं और
जो योनिसे निकलते ही हलन-चलन आदि सामर्थ्यसे युक्त है उसे पोत कहते हैं । इनमें जो जरसे
पैदा होते हैं वे जरायुज कहलाते हैं। जो अण्डोंसे पैदा होते हैं वे अण्डज कहलाते हैं। सूत्रमें
जरायुज, अण्डज और पोत इनका द्वन्द्व समास है । ये सब गर्भकी योनियां हैं ।
§ ३२७. यदि इन जरायुज, अण्डज और पोत जीवोंका गर्भ जन्म निर्णीत होता है तो अब
यह बतलाइए कि उपपाद जन्म किन जीवोंके होता है, अतः इस बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
देव और नारकियोंका उपपाद जन्म होता है ॥३४॥
§ ३२८. इनसे अतिरिक्त अन्य जीवोंके कौन-सा जन्म होता है । अब इस बातका ज्ञान
करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शेष सब जीवोंका सम्मूर्च्छन जन्म होता है ॥३५॥
§ ३२९. इस सूत्रमें 'शेष' पदसे वे जीव लिये गये हैं जो गर्भ और उपपाद जन्मसे नहीं
पैदा होते । इनके संमूर्च्छन जन्म होता है । ये तीनों ही सूत्र नियम करते हैं । और यह नियम
१. मूलाचा० गा० । गो० जी० गा० ।
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