सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 253, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 253
- २४५ § ३५० ] द्वितीयोऽध्यायः १४१
भोगः । तदभावान्निरुपभोगम् । विग्रहगतौ सत्यामपि इन्द्रियलब्धौ द्रव्येन्द्रियनिर्वृत्त्यभावाच्छब्दा-
द्युपभोगाभाव इति । ननु तैजसमपि निरुपभोगम् । तत्र किमुच्यते निरुपभोगमन्त्यमिति । तैजसं
शरीरं योगनिमित्तमपि न भवति, ततोऽस्योपभोगविचारेऽनधिकारः ।१
§ ३४८. एवं तत्रोक्तलक्षणेषु जन्मसु अमूनि शरीराणि प्रादुर्भावमापद्यमानानि किमविशेषेण
भवन्ति, उत कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आह—
गर्भसंमूर्च्छनजमाद्यम् ॥४५॥
§ ३४९. सूत्रक्रमापेक्षया आदौ भवमाद्यम् । औदारिकमित्यर्थः । यद् गर्भजं यच्च संमूर्च्छनजं
तत्सर्वमौदारिकं द्रष्टव्यम् ।
§ ३५०. तदनन्तरं यन्निर्दिष्टं तत्कस्मिन् जन्मनीत्यत आह—
समाधान—कार्मण । इन्द्रियरूप नालियोंके द्वारा शब्दादिके ग्रहण करनेको उपभोग कहते हैं। यह
बात अन्तके शरीरमें नहीं पायी जाती; अतः वह निरुपभोग है । विग्रहगतिमें लब्धिरूप भावेन्द्रिय-
के रहते हुए भो वहाँ द्रव्येन्द्रियको रचना न होनेसे शब्दादिकका उपभोग नहीं होता । शंका—
तैजस शरीर भी निरुपभोग है इसलिए वहाँ यह क्यों कहते हो कि अन्तका शरीर निरुपभोग है ?
समाधान—तैजस शरीर योगमें निमित्त भी नहीं होता, इसलिए इसका उपभोगके विचारमें
अधिकार नहीं है ।
विशेषार्थ—औदारिक, वैक्रियिक और आहारक इन तीन शरीरोंमें इन्द्रियोंकी रचना
होकर उन द्वारा अपने-अपने विषयोंका ग्रहण होता है इसलिए ये तीनों शरीर सोपभोग माने
गये हैं । यद्यपि कार्मण काययोग केवली जिनके प्रतर और लोकपूरण समुद्घातके समय तथा
विग्रहगतिमें होता है । पर इनमें-से प्रतर और लोकपूरण समुद्घातके समय केवलज्ञान होनेसे वहाँ
उपभोगका प्रश्न ही नहीं उठता । मात्र विग्रहगतिमें कार्मण काययोगके रहते हुए उपभोग होता है
या नहीं यह प्रश्न होता है और इसी प्रश्नका उत्तर देनेके लिए 'निरुपभोगमन्त्यम्' यह सूत्र रचा
गया है । अन्तका शरीर उपभोगरहित क्यों है इस बातका खुलासा करते हुए बतलाया है कि
विग्रहगतिमें भावेन्द्रियाँ तो होती हैं पर द्रव्येन्द्रियाँ नहीं होतीं इसलिए यहाँ शब्दादि विषयोंका
ग्रहण नहीं होता । यही कारण है कि अन्तके शरीरको निरुपभोग कहा है । रहा तैजस शरीर सो
अन्य चार शरीरोंके समान इसका स्वतन्त्र अधिकार नहीं है। अनिःसृत तैजस शरीर सब संसारी
जीवोंके सदा होता है और निःसृत तैजस शरीर कादाचित्क होता है । इस प्रकार तैजस शरीर
पाया तो जाता है सब संसारी जीवोंके, पर आत्मप्रदेश परिस्पन्दमें यह शरीर कारण नहीं है इस-
लिए इन्द्रियों-द्वारा विषयोंके ग्रहण करनेमें इस शरीरको उपयोगी नहीं माना गया है। यही कारण
है कि तैजस शरीर निरुपभोग है कि सोपभोग यह प्रश्न ही नहीं उठता ।
§ ३४८. इस प्रकार पूर्वोक्त लक्षणवाले इन जन्मोंमें क्या सामान्यसे सब शरीर उत्पन्न होते
हैं या इसमें कुछ विशेषता है । इस बातको बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
पहला शरीर गर्भ और संमूर्च्छन जन्मसे पैदा होता है ॥ ४५ ॥
§ ३४९. सूत्रमें जिस क्रमसे निर्देश किया है तदनुसार यहाँ आद्यपदसे औदारिक शरीरका
ग्रहण करना चाहिए। जो शरीर गर्भजन्मसे और संमूर्च्छन जन्मसे उत्पन्न होता है वह सब औदा-
रिक शरीर है यह इस सूत्रका तात्पर्य है ।
§ ३५०. इसके अनन्तर जिस शरीरका निर्देश किया है उसकी उत्पत्ति किस जन्मसे होती
है अब इस बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
१. -नधिकारः । तत्रोक्त-ता०, ना० ।