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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 558 में से

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पृष्ठ 259

अथ तृतीयोऽध्यायः
§ ३६६. 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इत्यादिषु नारकाः श्रुतास्ततः पृच्छति के ते
नारका इति । तत्प्रतिपादनार्थं तदधिकरणनिर्देशः क्रियते—
रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतममोमहातमःप्रभा भूमयो
घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोधः ॥१॥ ५
§ ३६७. रत्नं च शर्करा च वालुका च पङ्कश्च धूमश्च तमश्च महातमश्च रत्नशर्करावालु-
कापङ्कधूमतममोमहातमांसि । 'प्रभा' शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । साहचर्यात्ताच्छब्द्यम् । चित्रादि-
रत्नप्रभासहचरिता भूमिः रत्नप्रभा, शर्कराप्रभासहचरिता भूमिः शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभासह-
चरिता भूमिर्वालुकाप्रभा, पङ्कप्रभासहचरिता भूमिः पङ्कप्रभा, धूमप्रभासहचरिता भूमिर्धूमप्रभा,
तमःप्रभासहचरिता भूमिस्तमःप्रभा, महातमःप्रभासहचरिता भूमिर्महातमःप्रभा इति । एताः संज्ञा १०
अनेनोपायेन व्युत्पाद्यन्ते । 'भूमि'ग्रहणमधिकरणविशेषप्रतिपत्त्यर्थम् । यथा स्वर्गपटलानि भूमिमना-
श्रित्य व्यवस्थितानि न तथा नारकावासाः । किं र्तहि। भूमिमाश्रिता इति¹ । आसां भूमीनामा-
लम्बननिर्ज्ञानार्थं घनाम्बुवातादिग्रहणं क्रियते । घनाम्बु च वातश्च आकाशं च घनाम्बुवाता-
काशानि । तानि प्रतिष्ठा आश्रयो यासां ता घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः² । सर्वा एता भूमयो घनो-
§ ३६६. 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इत्यादिक सूत्रोंमें नारक शब्द सुना है इसलिए १५
पूछते हैं कि वे नारकी कौन हैं ? अतः नारकियोंका कथन करनेके लिए उनकी आधारभूत पृथि-
वियोंका निर्देश करते हैं—
रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा और महातमःप्रभा ये
सात भूमियाँ घनाम्बु, वात और आकाशके सहारे स्थित हैं तथा क्रमसे नीचे-नीचे हैं ॥१॥
§ ३६७. 'रत्नशर्करावालुकापङ्कधूमतममोमहातमाः' इसमें सब पदोंका परस्पर द्वन्द्व समास २०
है । प्रभा शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । पृथिवियोंकी प्रभा क्रमसे रत्न आदिके
समान होनेसे इनके रत्नप्रभा आदि नाम पड़े हैं । यथा—जिसकी प्रभा चित्र आदि रत्नोंकी प्रभाके
समान है वह रत्नप्रभा भूमि है। जिसकी प्रभा शर्कराके समान है वह शर्कराप्रभा भूमि है । जिसकी
प्रभा बालुकाकी प्रभाके समान है वह वालुकाप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा कीचड़के समान है वह
पंकप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा धुँवाके समान है वह धूमप्रभा भूमि है । जिसकी प्रभा अन्धकारके २५
समान है वह तमःप्रभा भूमि है और जिसकी प्रभा गाढ अन्धकारके समान है वह महातमःप्रभा
भूमि है । इस प्रकार इन नामोंकी व्युत्पत्ति कर लेनी चाहिए । सूत्रमें भूमि पदका ग्रहण अधिकरण
विशेषका ज्ञान करानेके लिए किया है । तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार स्वर्गपटल भूमिके बिना
स्थित है उस प्रकार नारकियोंके निवासस्थान नहीं हैं । किन्तु वे भूमिके आश्रयसे अवस्थित हैं ।
इन भूमियोंके आलम्बनका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें 'घनाम्बुवात' आदि पदका ग्रहण किया है । ३०
अभिप्राय यह है कि ये भूमियाँ क्रमसे घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुवातवलय और आकाश-
के आश्रयसे स्थित हैं इस बातके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः' पद दिया है ।
१. -इति । तासां भूमी-मु०, ता०, ना० । २. प्रतिष्ठाः । घनं च घनो मन्दो महान् आयत, इत्यर्थः । अम्बु
च जलम् उदकमित्यर्थः । वात-शब्दोऽन्त्यदीपकः । तत एवं संबन्धनीयः । घनो घनवातः । अम्बु अम्बुवातः ।
वातस्तनुवातः । इति महदपेक्षया तनुरिति सामर्थ्यगम्यः । अन्यः पाठः । सिद्धान्तपाठस्तु घनाम्बु च वातश्चेति । ३५
वातशब्दः सोपस्क्रियते । वातस्तनुवात इति वा । सर्वा एता मु०, ता०, ना० ।