सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३ § ३७१ -
मशुभतरा लेश्यादयो येषां ते नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदनाविक्रिया नारकाः । प्रथमा-
द्वितीययोः कापोती लेश्या, तृतीयायामुपरिष्टात्कापोती अधो नीला, चतुर्थ्यां नीला, पञ्चम्यामुपरि
नीला अधः कृष्णा, षष्ठ्यां कृष्णा, सप्तम्यां परमकृष्णा । स्वायुः१प्रमाणावधृता२ द्रव्यलेश्या उक्ताः ।
भावलेश्यास्तु अन्तर्मुहूर्तपरिवर्तिन्यः । परिणामाः स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दाः क्षेत्रविशेषनिमित्तवशादति-
दुःखहेतवोऽशुभतराः । देहाश्च तेषामशुभनामकर्मोदयादत्यन्ताशुभतरा विकृताकृतयो हुण्डसंस्थाना४
दुर्दर्शनाः । तेषामुत्सेधः प्रथमायां सप्त धनूंषि त्रयो हस्ताः षडङ्गुलयः । अधोऽधो—द्विगुणद्विगुणं ५
उत्सेधः । अभ्यन्तरासद्वेद्योदये सति अनादिपारिणामिकशीतोष्णबाह्यनिमित्तजनिता६ अतितीव्रा
वेदना भवन्ति नारकाणाम् । प्रथमाद्वितीयातृतीयाचतुर्थीषु उष्णवेदनान्येव नरकाणि । पञ्चम्यामू-
परि उष्णवेदने द्वे नरकशतसहस्रे । अधः शीतवेदनेमेकं७ शतसहस्रम् । षष्ठीसप्तम्योः शीतवेदनान्येव ।
शुभं८ विकरिष्याम इति अशुभतरमेव विकुर्वन्ति, सुखहेतूनुत्पादयाम इति दुःखहेतूनेवोत्पादयन्ति ।
त एते भावा अधोऽधोऽशुभतरा वेदितव्याः ।
की प्रकर्षता बतलायी गयी है। अर्थात् तिर्यंचोंमें जो लेश्यादिक हैं उनसे प्रथम नरकके नारकियोंके
अधिक अशुभ हैं आदि । नित्य शब्द आभीक्ष्ण्य अर्थात् निरन्तरवाची है । तात्पर्य यह है कि नार-
कियोंकी लेश्या, परिणाम, देह, वेदना और विक्रिया निरन्तर अशुभ होती है। यथा, प्रथम और
दूसरी पृथिवीमें कापोत लेश्या है। तीसरी पृथिवीमें ऊपरके भागमें कापोत लेश्या है और नीचेके
भागमें नील लेश्या है। चौथी पृथिवीमें नील लेश्या है। पांचवीं पृथिवीमें ऊपरके भागमें नील
लेश्या है और नीचेके भागमें कृष्ण लेश्या है। छठी पृथिवीमें कृष्ण लेश्या है। और सातवीं पृथिवी
में परम कृष्ण लेश्या है। द्रव्य लेश्याएँ अपनी आयु तक एक सी कही गयी हैं। किन्तु भावलेश्याएँ
अन्तर्मुहूर्तमें बदलती रहती हैं। परिणामसे यहाँ स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द लिये गये हैं।
ये क्षेत्रविशेषके निमित्तसे अत्यन्त दुःखके कारण अशुभतर हैं। नारकियोंके शरीर अशुभ नामकर्मके
उदयसे होनेके कारण उत्तरोत्तर अशुभ हैं। उनकी विकृत आकृति है, हुंड संस्थान है और देखनेमें
बुरे लगते हैं। उनकी ऊँचाई प्रथम पृथिवीमें सात धनुष, तीन हाथ और छह अंगुल है। तथा
नीचे-नीचे प्रत्येक पृथिवीमें वह दूनी-दूनी है। नारकियोंके अभ्यन्तर कारण असाता वेदनीयका
उदय रहते हुए अनादिकालीन शीत और उष्णरूप बाह्य निमित्तसे उत्पन्न हुई अति तीव्र वेदना
होती है। पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी पृथिवीमें मात्र उष्ण वेदनावाले नरक हैं। पाँचवीं
पृथिवीमें ऊपरके दो लाख नरक उष्ण वेदनावाले हैं। और नीचेके एक लाख नरक शीत वेदनावाले
हैं। तथा छठी और सातवीं पृथिवीके नरक शीत वेदनावाले ही हैं। नारकी 'शुभ विक्रिया करेंगे'
ऐसा विचार करते हैं पर उत्तरोत्तर अशुभ विक्रियाको ही करते हैं। 'सुखकर हेतुओंको उत्पन्न
करेंगे' ऐसा विचार करते हैं परन्तु वे दुःखकर हेतुओंको ही उत्पन्न करते हैं। इस प्रकार ये भाव
नीचे-नीचे अशुभतर जानने चाहिए।
विशेषार्थ—यहाँ टीकामें लेश्याके दो भेद करके भावलेश्या अन्तर्मुहूर्तमें बदलती रहती है
यह कहा है। सो इसका तात्पर्य यह है कि जहाँ जो भावलेश्या कही है उसमें परिवर्तन नहीं होता।
मात्र उसमें योग और कषायके अनुसार तरतमभाव होता रहता है; क्योंकि प्रत्येक नारकीके वही
योग और वही कषाय रहनी चाहिए ऐसा नियम नहीं है। किन्तु अपने-अपने जघन्य, मध्यम या
उत्कृष्ट कालके अनुसार योग और कषायका परिवर्तन नियमसे होता है। यतः कषायानुरंजित
१. स्वायुधः प्रभा-मु०, ता०, ना० । २.-माणेऽववृता आ०, दि० १, दि० २। ३. नामोदया-आ०, दि०१,
दि० २ । ४. संस्थापना । तेषां० आ०, दि० १, दि० २ । ५. द्विगुणो द्विगुण आ०, दि० १, दि० २ । ६.
जनिताः सुतीव्रा मु०, दि० १, दि० २, आ०, ता० । ७. -वेदनानामेकं आ०, दि० १, दि० २ । ८. शुभं
करि-मु०, आ०, दि० १, दि० २ ।