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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 558 में से

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पृष्ठ 263
  • ३५५ § ३७५ ] तृतीयोऽध्यायः १५१
    § ३७२. किमेतेषां नारकाणां शीतोष्णजनितमेव दुःखमुतान्यथापि भवतीत्यत आह—
    परस्परोदीरितदुःखाः ॥४॥
    § ३७३. कथं परस्परोदीरितदुःखत्वम् । नारकाः¹ भवप्रत्ययेनावधिना मिथ्यादर्शनोदयाद्वि-
    भङ्गव्यपदेशभाजा च दूरादेव दुःखहेतूनवगम्योत्पन्नदुःखाः प्रत्यासत्तौ परस्परालोकनाच्च प्रज्वलित-
    कोपाग्नयः पूर्वभवानुस्मरणाच्चातितीव्रानुबद्धवैराश्च श्वशृगालादिवत्स्वाभिघाते प्रवर्तमानाः ५
    स्वविक्रियाकृतासिवासीपरशुभिण्डिमालशक्तितोमरकुन्तायोधनादिभिरायुधैः स्वकरचरणदशनैश्च
    छेदनभेदनतक्षणदंशनादिभिः परस्परस्यातितीव्रं दुःखमुत्पादयन्ति ।
    § ३७४. किमेतावानेव दुःखोत्पत्तिकारणप्रकार उतान्योऽपि कश्चिदस्तीत्यत आह—
    संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक् चतुर्थ्याः ॥५॥
    § ३७५. देवगतिनामकर्मविकल्पस्यासुरत्वसंवर्तकस्य कर्मण उदयादस्यन्ति परानित्यसुराः । १०
    पूर्वजन्मनि² भावितेनातितीव्रेण संक्लेशपरिणामेन यदुपार्जितं पापकर्म तस्योदयात्सततं क्लिष्टाः³
    संक्लिष्टाः, संक्लिष्टा असुराः, संक्लिष्टासुराः । संक्लिष्टा इति विशेषणान्न सर्वे असुरा नारकाणां
    दुःखमुत्पादयन्ति । किं तर्हि । अम्बावरीषादय एव केचनेति । अवधिप्रदर्शनार्थं 'प्राक्चतुर्थ्याः' इति
    योगप्रवृत्तिका नाम लेश्या है अतः योग और कषायके बदलनेसे वह भी बदल जाती है । मात्र जहाँ
    कापोत लेश्याका जघन्य अंश कहां है वहाँ वही रहता है वह बदलकर कापोत लेश्याका मध्यम १५
    और उत्कृष्ट अंश नहीं होता या जहाँ परम कृष्ण लेश्या कही है वहाँ वही रहती है वह बदल कर
    अन्य लेश्या नहीं होती । शेष कथन सुगम है ।
    § ३७२. क्या इन नारकियोंके शीतोष्णजनित ही दुःख है या दूसरे प्रकारका भी दुःख है, इस
    बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    तथा वे परस्पर उत्पन्न किये गये दुःखवाले होते हैं ॥ ४ ॥ २०
    § ३७३. शंका—नारकी परस्पर एक-दूसरेको कैसे दुःख उत्पन्न करते हैं ? समाधान—नार-
    कियोंके भवप्रत्यय अवधिज्ञान है जिसे मिथ्यादर्शनके उदयसे विभंगज्ञान कहते हैं । इस ज्ञानके कारण
    दूरसे ही दुःखके कारणोंको जानकर उनको दुःख उत्पन्न हो जाता है और समीपमें आनेपर एक-
    दूसरेको देखनेसे उनकी क्रोधाग्नि भभक उठती है । तथा पूर्वभवका स्मरण होनेसे उनकी वैरकी गांठ
    और दृढ़तर हो जाती है । जिससे वे कुत्ता और गीदड़के समान एक-दूसरे का घात करनेके लिए २५
    प्रवृत्त होते हैं। वे अपनी विक्रियासे तलवार, बसूला, फरसा, हाथसे चलानेका तीर, बर्छी, तोमर
    नामका अस्त्र विशेष, बरछा और हथोड़ा आदि अस्त्र-शस्त्र बनाकर उनसे तथा अपने हाथ, पांव
    और दांतोंसे छेदना, भेदना, छीलना और काटना आदिके द्वारा परस्पर अतितीव्र दुःखको उत्पन्न
    करते हैं ।
    § ३७४. जिन कारणोंसे दुःख उत्पन्न होता है वे इतने ही हैं या और भी हैं ? अब इस बात- ३०
    का ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    और चौथी भूमिसे पहले तक वे संक्लिष्ट असुरोंके द्वारा उत्पन्न किये गये दुःखवाले भी
    होते हैं ॥५॥
    § ३७५. देवगति नामक नामकर्मके भेदोंमें एक असुर नामकर्म है जिसके उदयसे 'परान्
    अस्यन्ति' जो दूसरोंको फेंकते हैं उन्हें असुर कहते हैं। पूर्व जन्ममें किये गये अतितीव्र संक्लेशरूप ३५
    परिणामोंसे इन्होंने जो पापकर्म उपार्जित किया उसके उदयसे ये निरन्तर क्लिष्ट रहते हैं इसलिए
    संक्लिष्ट असुर कहलाते हैं। सूत्रमें यद्यपि असुरोंको संक्लिष्ट विशेषण दिया है पर इसका यह अर्थ
    १. नारकाणाम् ? भव-मु०, ता०, ना० । २. जन्मनि संभावि-मु० । ३. क्लिष्टाः संक्लिष्टा असुराः मु० ।