सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[header] १३८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।३८ § ३३४ - [/header]
सूक्ष्मं आहारकम्, ततः सूक्ष्मं तैजसम्, तैजसात्कार्मणं सूक्ष्ममिति ।
§ ३३४. यदि परम्परं सूक्ष्मम्, प्रदेशतोऽपि¹ न्यूनं परम्परं हीनमिति विपरीतप्रतिपत्ति-
निवृत्त्यर्थमाह—
प्रदेशतोऽसंख्येयगुणं प्राक्तैजसात् ॥३८॥
§ ३३५. प्रदिश्यन्त इति प्रदेशाः परमाणवः । संख्यामतीतोऽसंख्येयः । असंख्येयो गुणोऽस्य
तदिदमसंख्येयगुणम् । कुतः । प्रदेशतः । नावगाहतः । परम्परमित्यनुवृत्तेरा कार्मणात्प्रसङ्गे तन्नि-
वृत्त्यर्थमाह प्राक्तैजसादिति । औदारिकादसंख्येयगुणप्रदेशं वैक्रियिकम् । वैक्रियिकादसंख्येयगुण-
प्रदेशमाहारकमिति । को गुणकारः । पल्योपमासंख्येयभागः । यद्येवम्, परम्परं महापरिमाणं
प्राप्नोति²। नैवम्; बन्धविशेषात्परिमाणभेदाभावस्तूलनिचय्यायःपिण्डवत् ।
§ ३३६. अथोत्तरयोः किं समप्रदेशत्वमुतास्ति कश्चिद्विशेष इत्यत आह--
अनन्तगुणे परे ॥३६॥
§ ३३७. प्रदेशत इत्यनुवर्तते, तेनैवमभिसंबन्धः क्रियते—आहारकात्तैजसं प्रदेशतोऽनन्त-
गुणम्, तैजसात्कार्मणं प्रदेशतोऽनन्तगुणमिति । को गुणकारः । अभव्यानामनन्तगुणः सिद्धानाम-
नन्तभागः³ ।
'परम्परम्' इस प्रकार वीप्सा निर्देश किया है । औदारिक शरीर स्थूल है । इससे वैक्रियिक शरीर
सूक्ष्म है । इससे आहारक शरीर सूक्ष्म है । इससे तैजस शरीर सूक्ष्म है और इससे कार्मण
शरीर सूक्ष्म है ।
§ ३३४. यदि ये शरीर उत्तरोत्तर सूक्ष्म हैं तो प्रदेशोंकी अपेक्षा भी उत्तरोत्तर हीन होंगे ।
इस प्रकार विपरीत ज्ञानका निराकरण करने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तैजससे पूर्व तीन शरीरोंमें आगे-आगेका शरीर प्रदेशों की अपेक्षा असंख्यातगुणा है ॥३८॥
§ ३३५. प्रदेश शब्दकी व्युत्पत्ति 'प्रदिश्यन्ते' होती है । इसका अर्थ परमाणु है । संख्यातीत-
को असंख्येय कहते हैं । जिसका गुणकार असंख्यात है वह असंख्येयगुणा कहलाता है । शंका—
किसकी अपेक्षा ? समाधान—प्रदेशोंकी अपेक्षा, अवगाहनकी अपेक्षा नहीं । पूर्व सूत्रमें 'परम्परम्'
इस पदकी अनुवृत्ति होकर असंख्येयगुणत्वका प्रसंग कार्मण शरीर तक प्राप्त होता है अतः उसकी
निवृत्तिके लिए सूत्रमें 'प्राक् तैजसात्' पद रखा है । अर्थात् तैजस शरीरसे पूर्ववर्ती शरीर तक ये
शरीर उत्तरोत्तर असंख्यातगुणे हैं । औदारिक शरीरसे वैक्रियिक शरीर असंख्यातगुणे प्रदेशवाला
हैं। शंका—गुणकारका प्रमाण क्या है ? समाधान—पल्यका असंख्यातवाँ भाग । शंका—यदि
ऐसा है तो उत्तरोत्तर एक शरीरसे दूसरा शरीर महापरिमाणवाला प्राप्त होता है ? समाधान—
यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, बन्धविशेषके कारण परिमाणमें भेद नहीं होता । जैसे रूईका ढेर
और लोहेका गोला ।
§ ३३६. आगेके दो शरीरोंके प्रदेश क्या समान हैं या उनमें भी कुछ भेद है । इस बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
परवर्ती दो शरीर प्रदेशोंकी अपेक्षा उत्तरोत्तर अनन्तगुणे हैं ॥ ३९ ॥
§ ३३७. पूर्व सूत्रसे 'प्रदेशतः' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। जिससे इस प्रकार सम्बन्ध
करना चाहिए कि आहारक शरीरसे तैजस शरीरके प्रदेश अनन्तगुणे हैं और तैजस शरीरसे कार्मण
शरीरके प्रदेश अनन्तगुणे हैं । शंका—गुणकार क्या है ? समाधान—अभव्योंसे अनन्तगुणा और
सिद्धोंका अनन्तवाँ भाग गुणकार है ।
[footnotes]
१. -प्रदेशतः । परस्पर-ता०, ना० । २. प्राप्नोति । बन्ध-ता० । ३. -मनन्तो भागः ता०, ना० ।
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