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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 558 में से

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पृष्ठ 266

विष्कम्भो द्वितीयो जलधिरिति । द्विद्विविष्कम्भो येषां ते द्विद्विविष्कम्भाः । पूर्वपूर्वपरिक्षेपिवचनं
ग्रामनगरादिवद्विनिवेशो मा विज्ञायीति । वलयाकृतिवचनं चतुरस्रादिसंस्थानान्तरनिवृत्त्यर्थम् ।
§ ३८२. अत्राह, जम्बूद्वीपस्य प्रदेशसंस्थानविष्कम्भा वक्तव्यास्तन्मूलत्वादितरविष्कम्भा-
दिविज्ञानस्येत्युच्यते—
तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥६॥
§ ३८३. तेषां मध्ये तन्मध्ये । केषाम् । पूर्वोक्तानां द्वीपसमुद्राणाम् । नाभिरिव नाभिः२ ।
मेरुर्नाभिर्यस्य स मेरुनाभिः । वृत्त आदित्यमण्डलोपमानः । शतानां सहस्रं शतसहस्रम् । योजनानां
शतसहस्रं, योजनशतसहस्रम् । योजनशतसहस्रं विष्कम्भो यस्य सोऽयं योजनशतसहस्रविष्कम्भः ।
कोऽसौ । जम्बूद्वीपः । कथं जम्बूद्वीपः । जम्बूवृक्षोपलक्षितत्वात् । उत्तरकुरूणां मध्ये जम्बूवृक्षोऽना-
दिनिधनः पृथिवीपरिणामो ३ऽकृत्रिमः सपरिवारस्तदुपलक्षितोऽयं द्वीपः ।
उससे दूना है । तथा दूसरे द्वीपका विस्तार इससे दूना है और दूसरे समुद्रका इससे दूना है । इस
प्रकार उत्तरोत्तर दूना-दूना विस्तार है । तात्पर्य यह है कि इन द्वीप-समुद्रोंका विस्तार दूना-दूना
है इसलिए सूत्रमें उन्हें दूने-दूने विस्तारवाला कहा है । ग्राम और नगरादिकके समान इन द्वीप-
समुद्रोंकी रचना न समझी जाये इस बातके बतलानेके लिए सूत्रमें ‘पूर्वपूर्वपरिक्षेपिणः’ यह वचन
दिया है । अर्थात् वे द्वीप और समुद्र उत्तरोत्तर एक दूसरेको घेरे हुए हैं । सूत्रमें जो ‘वलयाकृतयः’
वचन दिया है वह चौकोर आदि आकारोंके निराकरण करनेके लिए दिया है ।
§ ३८२. अब पहले जम्बू द्वीपका आकार और विस्तार कहना चाहिए, क्योंकि दूसरे द्वीप
समुद्रोंका विस्तार आदि तन्मूलक है, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन सबके बीचमें गोल और एक लाख योजन विष्कम्भवाला जम्बूद्वीप है । जिसके मध्य-
में मेरु पर्वत है ॥ ९ ॥
§ ३८३. ‘तन्मध्ये’ पदका अर्थ है ‘उनके बीचमें’ । शंका—किनके बीचमें ? समाधान—
पूर्वोक्त द्वीप समुद्रोंके बीचमें । नाभिस्थानीय होनेसे नाभि कहा है । जिसका अर्थ मध्य है । अभि-
प्राय यह है कि जिसके मध्यमें मेरु पर्वत है, जो सूर्यके मण्डलके समान गोल है और जिसका एक
लाख योजन विस्तार है ऐसा यह जम्बूद्वीप है । शंका—इसे जम्बूद्वीप क्यों कहते हैं ? समाधान—
जम्बूवृक्षसे उपलक्षित होनेके कारण इसे जम्बूद्वीप कहते हैं । उत्तरकुरुमें अनादिनिधन, पृथिवी
से बना हुआ, अकृत्रिम और परिवार वृक्षोंसे युक्त जम्बूवृक्ष है जिसके कारण यह जम्बूद्वीप
कहलाता है ।
विशेषार्थ—अधोलोकका विवेचन कर आये हैं इसके बाद मध्यलोक है । यह रत्नप्रभा
पृथिवीके ऊपरी भागपर अवस्थित है । इसमें गोल आकारको लिये हुए और एकके बाद एकको
घेरे हुए असंख्यात द्वीप और समुद्र हैं । इन सबके बीचमें जम्बूद्वीप है । इसके बीचमें और दूसरा
द्वीप समुद्र नहीं है । यद्यपि गोल तो सब द्वीप और समुद्र हैं पर वे सब चूड़ीके समान गोल हैं और
यह थालीके समान गोल है । इसका व्यास एक लाख योजन है । इसके ठीक बीचमें मेरु पर्वत है ।
यह एक लाख चालीस योजन ऊँचा है । इसमेंसे एक हजार योजन जमीनमें है । चालीस योजनकी
आखीरमें चोटी है और शेष निन्यानबे हजार योजनका समतलसे चूलिका तक है । प्रारम्भमें
जमीनपर मेरु पर्वतका व्यास दस हजार योजन है । ऊपर क्रमसे घटता गया है । जिस हिसाबसे
ऊपर घटा है उसी हिसाबसे जमीनमें उसका व्यास बढ़ा है । मेरु पर्वतके तीन काण्ड हैं । पहला
काण्ड जमीनसे पाँच सौ योजनका, दूसरा साढ़े बासठ हजार योजनका और तीसरा छत्तीस हजार
१. पूर्वोक्तद्वीप—आ०, दि० १, दि० २, मु० । २. नाभिर्मध्यम । मेरु-आ०, दि० १, दि० २, मु० ।
३. परिणामोऽकृ-मु० ।