सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- २।३७ § ३३३ ] द्वितीयोऽध्यायः १३७
जाण्डजपोतानाम् । देवनारकाणामेवोपपादः । उपपाद एव च देवनारकाणाम् । शेषाणामेव संमूर्च्छ-
नम् । संमूर्च्छनमेव शेषाणामिति ।
§ ३३०. तेषां पुनः संसारिणां त्रिविधजन्मनामाहितबहुविकल्पनवयोनिवेदानां शुभाशुभ-
नामकर्मविपाकनिर्वर्तितानि बन्धफलानुभवनाधिष्ठानानि शरीराणि कानीत्यत आह—
औदारिकवैक्रियिकाहारकतेजसकार्मणानि शरीराणि ॥३६॥ ५
§ ३३१. विशिष्टनामकर्मोदयापादितवृत्तीनि शीर्यन्त इति शरीराणि१। औदारिकादि-
प्रकृतिविशेषोदयप्राप्तवृत्तीनि औदारिकादीनि । उदारं स्थूलम् । उदारे२ भवं उदारं प्रयोजनमस्येति
वा, औदारिकम् । अष्टगुणैश्वर्ययोगादेकानेकाणुमहच्छरीरविविधकरणं विक्रिया, सा प्रयोजनमस्येति
वैक्रियिकम् । सूक्ष्मपदार्थनिर्ज्ञानार्थमसंयमपरिजिहीर्षया वा प्रमत्तसंयतेनाह्रियते निर्वर्त्यते
तदित्याहारकम् । यत्तेजोनिमित्तं तेजसि वा भवं तत्तैजसम् । कर्मणां कार्यं कार्मणम् । सर्वेषां १०
कर्मनिमित्तत्वेऽपि रूढिवशाद्विशिष्टविषये वृत्तिरवसेया ।
§ ३३२. यथौदारिकस्येन्द्रियैरुपलब्धिस्तथेतरेषां कस्मान्न भवतीत्यत आह—
परं परं सूक्ष्मम् ॥३७॥
§ ३३३. 'पर'शब्दस्यानेकार्थवृत्तित्वेऽपि विवक्षातो व्यवस्थार्थगतिः । पृथग्भूतानां शरीराणां
सूक्ष्मगुणेन वीप्सानिर्देशः क्रियते परम्परमिति । औदारिकं स्थूलम्, ततः सूक्ष्मं वैक्रियिकम्, ततः १५
दोनों ओरसे जानना चाहिए । यथा—गर्भ जन्म जरायुज, अण्डज और पोत जीवोंका ही होता है ।
या जरायुज, अण्डज और पोत जीवों के गर्भजन्म ही होता है। उपपाद जन्म देव और नारकियों
के ही होता है या देव और नारकियोंके उपपाद जन्म ही होता है सम्मूर्च्छन जन्म शेष जीवोंके ही
होता है या शेष जीवोंके संमूर्च्छन जन्म ही होता है ।
§ ३३०. जो तीन जन्मोंसे पैदा होते हैं और जिनके अपने अवान्तर भेदोंसे युक्त नौ योनियां २०
हैं उन संसारी जीवोंके शुभ और अशुभ नामकर्मके उदयसे निष्पन्न हुए और बन्धफलके अनुभव
करनेमें आधारभूत शरीर कितने हैं । अब इसी बातको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये पाँच शरीर हैं ॥३६॥
§ ३३१. जो विशेष नामकर्मके उदयसे प्राप्त होकर शीर्यन्ते अर्थात् गलते हैं वे शरीर हैं।
इसके औदारिक आदि पाँच भेद हैं। ये औदारिक आदि प्रकृति विशेषके उदयसे होते हैं। उदार २५
और स्थूल ये एकार्थवाची शब्द हैं। उदार शब्दसे होनेरूप अर्थमें या प्रयोजनरूप अर्थमें ठक्
प्रत्यय होकर औदारिक शब्द बनता है। अणिमा आदि आठ गुणोंके ऐश्वर्यके सम्बन्धसे एक,
अनेक, छोटा, बड़ा आदि नाना प्रकारका शरीर करना विक्रिया है। यह विक्रिया जिस शरीरका
प्रयोजन है वह वैक्रियिक शरीर है। सूक्ष्म पदार्थका ज्ञान करनेके लिए या असंयमको दूर करनेकी
इच्छासे प्रमत्तसंयत जिस शरीरको रचना करता है वह आहारक शरीर है । जो दीप्तिका कारण ३०
है या तेजमें उत्पन्न होता है उसे तैजस शरीर कहते हैं। कर्मोंका कार्य कार्मण शरीर है। यद्यपि
सब शरीर कर्मके निमित्तसे होते हैं तो भी रूढ़िसे विशिष्ट शरीरको कार्मण शरीर कहा है।
§ ३३२. जिस प्रकार इन्द्रियाँ औदारिक शरीरको जानती हैं उस प्रकार इतर शरीरोंको
क्यों नहीं जानतीं ? अब इस बातको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आगे-आगेका शरीर सूक्ष्म है ॥३७॥ ३५
§ ३३३. पर शब्दके अनेक अर्थ हैं तो भी यहाँ विवक्षासे व्यवस्थारूप अर्थका ज्ञान होता
है। यद्यपि शरीर अलग-अलग हैं तो भी उनमें सूक्ष्म गुणका अन्वय है यह दिखलानेके लिए
१. 'चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम् ।' न्या० सू० १, १, ११ । २. उदारे भवमौदारिकम् । उदारं मु० ।
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