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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 558 में से

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पृष्ठ 252

१४० सर्वार्थसिद्धौ [ २।४३ § ३४३ -
§ ३४३. 'सर्वं' शब्दो निरवशेषवाची । निरवशेषस्य संसारिणो जीवस्य ते द्वे अपि शरीरे
भवत इत्यर्थः ।
§ ३४४. अविशेषाभिधानात्तैरोदारिकादिभिः सर्वस्य संसारिणो यौगपद्येन संबन्धप्रसङ्गे
संभवशरीरप्रदर्शनार्थमिदमुच्यते—
तदादीनि भाज्यानि युगपदेकस्या¹ चतुर्भ्यः ॥४३॥
§ ३४५. 'तत्' शब्दः प्रकृततैजसकार्मणप्रतिनिर्देशार्थः । ते तैजसकार्मणे आदिर्येषां तानि
तदादीनि । भाज्यानि विकल्प्यानि । आ कुतः । आ चतुर्भ्यः । युगपदेकस्यात्मनः । कस्यचिद् द्वे
तैजसकार्मणे । अपरस्य त्रीणि औदारिकतैजसकार्मणानि वैक्रियिकतैजसकार्मणानि वा । अन्यस्य
चत्वारि औदारिकाहारकतैजसकार्मणानीति विभागः क्रियते ।
§ ३४६. पुनरपि तेषां विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
निरुपभोगमन्त्यम् ॥४४॥
§ ३४७. अन्ते भवमन्त्यम् । किं । तत् कार्मणम् । इन्द्रियप्रणालिकया शब्दादीनामुपलब्धिरूप-
§ ३४३. यहाँ 'सर्व' शब्द निरवशेषवाची है । वे दोनों शरीर सब संसारी जीवोंके होते हैं
यह इस सूत्रका तात्पर्य है ।
§ ३४४. सामान्य कथन करनेसे उन औदारिकादि शरीरों के साथ सब संसारी जीवोंका
एक साथ सम्बन्ध प्राप्त होता है अतः एक साथ कितने शरीर सम्भव है इस बातको दिखलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
एक साथ एक जीवके तैजस और कार्मणसे लेकर चार शरीर तक विकल्पसे होते हैं ॥४३॥
§ ३४५. सूत्रमें प्रकरणप्राप्त तैजस और कार्मण शरीरका निर्देश करनेके लिए 'तत्' शब्द
दिया है । तदादि शब्दका समास लभ्य अर्थ है—तैजस और कार्मण शरीर जिनके आदिमें हैं वे ।
भाज्य और विकल्प्य ये पर्यायवाची नाम हैं । तात्पर्य यह है कि एक साथ एक आत्माके पूर्वोक्त
दो शरीरसे लेकर चार शरीर तक विकल्पसे होते हैं । किसीके तैजस और कार्मण ये दो शरीर
होते हैं । अन्यके औदारिक तैजस और कार्मण या वैक्रियिक, तैजस और कार्मण ये तीन शरीर होते
हैं । किसी दूसरेके औदारिक, आहारक, तैजस और कार्मण ये चार शरीर होते हैं । इस प्रकार यह
विभाग यहाँ किया गया है ।
विशेषार्थ—आगे ४७वें सूत्रमें तपोविशेषके बलसे वैक्रियिक शरीरकी उत्पत्तिका निर्देश
किया है इसलिए प्रश्न होता है कि किसी ऋद्धिधारी साधुके एक साथ पाँच शरीरका सद्भाव
माननेमें क्या हानि है ? समाधान यह है कि एक साथ वैक्रियिक और आहारक ऋद्धिकी प्रवृत्ति
नहीं होती इसलिए एक तो एक साथ आहारक शरीरके साथ वैक्रियिक शरीरका अवस्थान नहीं
बन सकता । दूसरे तपोविशेषसे जो विक्रिया प्राप्त होती है वह औदारिक शरीर सम्बन्धी ही
विक्रिया है । उसे स्वतन्त्र वैक्रियिक शरीर मानना उचित नहीं है । कर्मसाहित्यमें वैक्रियिक शरीर
नामकर्मके उदयसे जो शरीर प्राप्त होता है उसकी परिगणना ही वैक्रियिक शरीरमें की गयी है ।
इसलिए अधिकारी भेद होनेसे औदारिक और आहारक शरीरके साथ वैक्रियिक शरीर नहीं बन
सकता । यही कारण है कि एक साथ अधिकसे अधिक चार शरीर बतलाये हैं ।
§ ३४६. फिर भी उन शरीरोंका विशेष ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अन्तिम शरीर उपभोगरहित है ॥४४॥
§ ३४७. जो अन्तमें होता है वह अन्त्य कहलाता है । शंका—अन्तका शरीर कौन है ?
१. -देकस्मिन्ना च-म० ।