सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें– २४२ § ३४२ ] द्वितीयोऽध्यायः १३९
§ ३३८. तत्रैतत्स्याच्छल्यकवन्मूर्तिमद्द्रव्योपचितत्वात्संसारिणो जीवस्याभिप्रेतगतिनिरोध-
प्रसङ्ग इति । तन्न; किं कारणम् । यस्मादुभे अप्येते—
अप्रतीघाते ॥४०॥
§ ३३९. मूर्तिमतो मूर्त्यन्तरेण व्याघातः प्रतीघातः । स नास्त्यनयोरित्यप्रतीघाते; सूक्ष्म-
१परिणामात् । अयःपिण्डे तेजोऽनुप्रवेशवत्तैजसकार्मणयोर्नास्ति वज्रपटलादिषु व्याघातः । ननु च ५
वैक्रियिकाहारकयोरपि नास्ति प्रतीघातः । सर्वत्राप्रतीघातोऽत्र विवक्षितः । यथा तैजसकार्मणयोरा-
लोकान्तात् सर्वत्र नास्ति प्रतीघातः, न तथा वैक्रियिकाहारकयोः ।
§ ३४०. आह किमेतावानेव विशेषः उत कश्चिदन्योऽप्यस्तीत्याह—
अनादिसंबन्धे च ॥४१॥
§ ३४१. 'च' शब्दो विकल्पार्थः । अनादिसंबन्धे सादिसंबन्धे चेति । कार्यकारणभावसंतत्या १०
अनादिसंबन्धे, विशेषापेक्षया सादिसंबन्धे २ च बीजवृक्षवत् । यथौदारिकवैक्रियिकाहारकाणि
जीवस्य कदाचित्कानि, न तथा तैजसकार्मणे । नित्यसंबन्धिनी हि ते आ संसारक्षयात् ।
– § ३४२. त एते तैजसकार्मणे किं कस्यचिदेव भवत उताविशेषेणेत्यत आह—
सर्वस्य ॥४२॥
§ ३३८. शंका—जिस प्रकार कील आदिके लग जानेसे कोई भी प्राणी इच्छित स्थानको १५
नहीं जा सकता उसी प्रकार मूर्तिक द्रव्यसे उपचित होनेके कारण संसारी जीवकी इच्छित गतिके
निरोधका प्रसंग प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि ये दोनों शरीर—
प्रतीघातरहित हैं ॥ ४० ॥
§ ३३९. एक मूर्तिक पदार्थका दूसरे मूर्तिक पदार्थके द्वारा जो व्याघात होता है उसे
प्रतीघात कहते हैं। इन दोनों शरीरोंका इस प्रकारका प्रतीघात नहीं होता इसलिए ये प्रतीघात २०
रहित हैं। जिस प्रकार सूक्ष्म होनेसे अग्नि लोहेके गोलेमें प्रवेश कर जाती है। उसी प्रकार तैजस
और कार्मण शरीरका वज्रपटलादिकमें भी व्याघात नहीं होता । शंका—वैक्रियिक और आहारक
शरीरका भी प्रतीघात नहीं होता फिर यहाँ तैजस और कार्मण शरीरको ही अप्रतीघात क्यों
कहा ? समाधान—इस सूत्रमें सर्वत्र प्रतीघातका अभाव विवक्षित है। जिस प्रकार तैजस और
कार्मण शरीरका लोक पर्यन्त सर्वत्र प्रतीघात नहीं होता वह बात वैक्रियिक और आहारक २५
शरीरकी नहीं है।
§ ३४०. इन दोनों शरीरोंमें क्या इतना ही विशेषता है या और भी कोई विशेषता है।
इसी बातको बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
आत्माके साथ अनादि सम्बन्धवाले हैं ॥ ४१ ॥
§ ३४१. सूत्रमें 'च'शब्द विकल्पको सूचित करनेके लिए दिया है। जिससे यह अर्थ हुआ ३०
कि तैजस और कार्मण शरीरका अनादि सम्बन्ध है और सादि सम्बन्ध भी है। कार्यकारणभावकी
परम्पराकी अपेक्षा अनादि सम्बन्ध है और विशेषकी अपेक्षा सादि सम्बन्ध है। यथा बीज और
वृक्ष । जिस प्रकार औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर जीवके कदाचित् होते हैं उस प्रकार
तैजस और कार्मण शरीर नहीं हैं। संसारका क्षय होने तक उनका जीवके साथ सदा सम्बन्ध है।
§ ३४२. ये तैजस और कार्मण शरीर क्या किसी जीवके ही होते हैं या सामान्यरूपसे ३५
सबके होते हैं । इसी बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा सब संसारी जीवोंके होते हैं ॥ ४२ ॥
१. -परिमाणात् मु० । २. -सम्बन्धेऽपि च मु० ।