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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 558 में से

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पृष्ठ 254

१४२ ] सर्वार्थसिद्धौ [ २।४६ § ३५१ –

औपपादिकं वैक्रियिकम् ॥४६॥
§ ३५१. उपपादे भवमौपपादिकम् । तत्सर्वं वैक्रियिकं वेदितव्यम् ।
§ ३५२. यद्यौपपादिकं वैक्रियिकम्, अनौपपादिकस्य वैक्रियिकत्वाभाव इत्यत आह—
लब्धिप्रत्ययं च ॥४७॥
§ ३५३. ‘च’ शब्देन वैक्रियिकमभिसंबध्यते । तपोविशेषादृद्धिप्राप्तिर्लब्धिः । लब्धिः प्रत्ययः
कारणमस्य लब्धिप्रत्ययम् । वैक्रियिकं लब्धिप्रत्ययं च भवतीत्यभिसंबध्यते ।
§ ३५४. किमेतदेव लब्ध्यपेक्षमुतान्यदप्यस्तीत्यत आह—
तैजमपि ॥४८॥
§ ३५५. ‘अपि’शब्देन लब्धिप्रत्ययमभिसंबध्यते । तैजमपि लब्धिप्रत्ययं भवतीति ।
§ ३५६. वैक्रियिकानन्तरं यदुपदिष्टं तस्य स्वरूपनिर्धारणार्थं स्वामिनिर्देशार्थं चाह—
शुभं विशुद्धमव्याघाति चाहारकं प्रमत्तसंयतस्यैव ॥४६॥
§ ३५७. शुभकारणत्वाच्छुभव्यपदेशः । शुभकर्मण आहारककाययोगस्य कारणत्वाच्छुभ-
मित्युच्यते अन्नस्य प्राणव्यपदेशवत् । विशुद्धकार्यत्वाद्विशुद्धव्यपदेशः । विशुद्धस्य १पुण्यकर्मणः


वैक्रियिक शरीर उपपाद जन्मसे पैदा होता है ॥ ४६ ॥
§ ३५१. जो उपपादमें होता है उसे औपपादिक कहते हैं । इस प्रकार उपपाद जन्मसे पैदा
होनेवाले शरीरको वैक्रियिक जानना चाहिए ।
§ ३५२. यदि जो शरीर उपपाद जन्मसे पैदा होता है वह वैक्रियिक है तो जो शरीर उप-
पाद जन्मसे नहीं पैदा होता उसमें वैक्रियिकपन नहीं बन सकता । अब इसी बातका स्पष्टीकरण
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तथा लब्धिसे भी पैदा होता है ॥ ४७ ॥
§ ३५३. सूत्रमें ‘च’ शब्द आया है । उससे वैक्रियिक शरीरका सम्बन्ध करना चाहिए ।
तपविशेषसे प्राप्त होनेवाली ऋद्धिको लब्धि कहते हैं । इस प्रकारको लब्धिसे जो शरीर उत्पन्न होता
है वह लब्धिप्रत्यय कहलाता है । वैक्रियिक शरीर लब्धिप्रत्यय भी होता है ऐसा यहाँ सम्बन्ध
करना चाहिए ।
§ ३५४. क्या यही शरीर लब्धिकी अपेक्षासे होता है या दूसरा शरीर भी होता है। अब
इसी बातका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
तैजस शरीर भी लब्धिसे पैदा होता है ॥ ४८ ॥
§ ३५५. सूत्रमें ‘अपि’ शब्द आया है । उससे ‘लब्धिप्रत्ययम्’ पदका ग्रहण होता है । तैजस
शरीर भी लब्धिप्रत्यय होता है यह इस सूत्रका भाव है ।
§ ३५६. वैक्रियिक शरीरके पश्चात् जिस शरीरका उपदेश दिया है उसके स्वरूपका निश्चय
करनेके लिए और उसके स्वामीका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आहारक शरीर शुभ, विशुद्ध और व्याघात रहित है और वह प्रमत्तसंयतके ही होता है ॥४९॥
§ ३५७. शुभकर्मका कारण होनेसे इसे शुभ कहा है । यह शरीर आहारक काययोग रूप
शुभकर्मका कारण है, इसलिए आहारक शरीर शुभ कहलाता है । यहाँ कारणमें कार्यका उपचार
है । जैसे अन्नमें प्राणका उपचार करके अन्नको प्राण कहते हैं । विशुद्ध कर्मका कार्य होनेसे आहारक
शरीरको विशुद्ध कहा है । तात्पर्य यह है कि जो चित्र-विचित्र न होकर निर्दोष है ऐसे विशुद्ध


१. पुण्यस्य कर्मणः मु० ।