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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 558 में से

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पृष्ठ 238

१२६ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१९ § २९७ –
§ २९७. उक्तानामिन्द्रियाणां संज्ञानुपूर्वीप्रतिपादनार्थमाह—
'स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राणि ॥१९॥
§ २९८. लोके इन्द्रियाणां पारतन्त्र्यविवक्षा दृश्यते । अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि, अनेन
कर्णेन सुष्ठु शृणोमीति । ततः पारतन्त्र्यात्स्पर्शनादीनां करणत्वम् । वीर्यान्तरायमतिज्ञानावरण-
५ उपयोग है ऐसा वचन है अतः उपयोगको इन्द्रिय मानना उचित है ।
विशेषार्थ—ज्ञानकी अमुक पर्यायको प्रकट न होने देना विवक्षित ज्ञानावरणके सर्वघाती
स्पर्धकोंके उदयका काम है । किन्तु जिस जीवके विवक्षित ज्ञानावरणका क्षयोपशम होता है उसके
उस ज्ञानावरणके सर्वघाती स्पर्धकोंका उदय न होनेसे विवक्षित ज्ञानके प्रकाशमें आनेकी योग्यता
होती है और इसी योग्यताका नाम लब्धि है । ऐसी योग्यता एक साथ सभी क्षायोपशमिक
१० ज्ञानोंकी हो सकती है किन्तु उपयोगमें एक कालमें एक ही ज्ञान आता है । इसका अभिप्राय यह है
कि क्षायोपशमिक ज्ञानकी पर्यायका नाम लब्धि न होकर क्षयोपशमविशेषका नाम लब्धि है और
उपयोग ज्ञानकी पर्यायका नाम है । यही कारण है कि लब्धि एक साथ अनेक ज्ञानोंकी हो सकती
है पर उपयोग एक कालमें एक ही ज्ञानका होता है । पहले प्रथम अध्याय सूत्र १४ में यह कह
आये हैं कि मतिज्ञान इन्द्रिय और मनके निमित्तसे होता है इससे ज्ञात होता है कि उपयोग स्वरूप
१५ ज्ञानकी इन्द्रिय संज्ञा न होकर जो उपयोगरूप मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके होनेमें साधकतम करण है
उसीकी इन्द्रिय संज्ञा है इसलिए वहाँ निर्वृत्ति, उपकरण और लब्धिको इन्द्रिय कहना तो ठीक है,
क्योंकि ये उपयोगरूप मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके होनेमें साधकतम करण हैं पर स्वयं उपयोगको
इन्द्रिय कहना ठीक नहीं है, क्योंकि वह इन्द्रिय व्यापारका फल है । यह एक शंका है जिसका
समाधान पूज्यपाद स्वामीने दो प्रकारसे किया है । प्रथम तो यह बतलाया है कि कारणके धर्म
२० इन्द्रियत्वका कार्यमें उपचार करके उपयोगको भी इन्द्रिय कहा है । अर्थात् उपयोग स्वयं इन्द्रिय
नहीं है किन्तु इन्द्रियके निमित्तसे वह होता है इसलिए यहाँ उपचारसे उसे इन्द्रिय कहा है । यह
प्रथम समाधान है । दूसरा समाधान करते हुए उन्होंने जो कुछ लिखा है उसका भाव यह है कि
जिससे इन्द्र अर्थात् आत्माकी पहचान हो वह इन्द्रिय कहलाती है और ऐसी पहचान करानेवाली
वस्तु निज अर्थ होनी चाहिए । यदि इस दृष्टिसे देखा जाता है तो इन्द्रिय शब्दका मुख्य वाच्य
२५ उपयोग ही ठहरता है, क्योंकि वह आत्माका निज अर्थ है । यही कारण है कि यहाँ उपयोगको
भी इन्द्रिय कहा है । तात्पर्य यह है कि निमित्तकी अपेक्षा विचार करनेपर निर्वृत्ति, उपकरण और
लब्धिको इन्द्रिय संज्ञा प्राप्त होती है और स्वार्थकी अपेक्षा विचार करनेपर उपयोगको इन्द्रिय संज्ञा
प्राप्त होतो है । पहले प्रथम अध्यायमें केवल निमित्तकी अपेक्षा इन्द्रिय शब्दका व्यवहार किया
गया था और यहाँ निमित्त और मुख्यार्थ दोनोंको ध्यानमें रखकर इन्द्रियके भेद दिखलाये गये हैं
३० इसलिए कोई विरोध नहीं है ।
§ २९७. अब उक्त इन्द्रियोंके क्रमसे संज्ञा दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र ये इन्द्रियाँ हैं ॥१९॥
§ २९८. लोकमें इन्द्रियोंकी पारतन्त्र्य विवक्षा देखी जाती है । जैसे इस आँखसे मैं अच्छा
देखता हूँ, इस कानसे मैं अच्छा सुनता हूँ । अतः पारतन्त्र्य विवक्षामें स्पर्शन आदि इन्द्रियोंका
३५ १. 'बुद्धीन्द्रियाणि चक्षुःश्रोत्रघ्राणरसनत्वगाख्यानि ।' सां० कौ०, श्लो० ६ । घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्राणीन्द्रि-
याणि भूतेभ्यः ।' –न्या० सू० १, १, १२ ।