सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११६ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१०.§ २७४ -
वरणेषु युगपत् । पूर्वकालभाविनोऽपि दर्शनाज्ज्ञानस्य प्रागुपन्यासः; अभ्यर्हितत्वात् । सम्यग्ज्ञान-
प्रकरणात्पूर्वं पञ्चविधो ज्ञानोपयोगो व्याख्यातः । इह पुनरुपयोगग्रहणाद्विपर्ययोऽपि गृह्यते इत्यष्ट-
विध¹ इति उच्यते ।
§ २७४. यथोक्तेनानेनाभिहितपरिणामेन सर्वात्मसाधारणेनोपयोगेन ये उपलक्षिता उप-
योगिनस्ते द्विविधाः—
संसारिणो मुक्ताश्च ॥ १० ॥
§ २७५. संसरणं संसारः परिवर्तनमित्यर्थः । स एषामस्ति ते संसारिणः । तत्परिवर्तनं
पञ्चविधं द्रव्यपरिवर्तनं क्षेत्रपरिवर्तनं कालपरिवर्तनं भवपरिवर्तनं भावपरिवर्तनं चेति । तत्र
छद्मस्थोंके क्रमसे होते हैं और आवरणरहित जीवोंके युगपत् होते हैं । यद्यपि दर्शन पहले होता है
तो भी श्रेष्ठ होनेके कारण सूत्रमें ज्ञानको दर्शनसे पहले रखा है । सम्यग्ज्ञानका प्रकरण होनेके
कारण पहले पांच प्रकारके ज्ञानोपयोगका व्याख्यान कर आये हैं । परन्तु यहाँ उपयोगका ग्रहण
करनेसे विपर्ययका भी ग्रहण होता है इसलिए वह आठ प्रकारका कहा है ।
विशेषार्थ—यहाँ जीवका लक्षण उपयोग बतलाकर उसके भेदोंकी परिगणना की गयी है ।
उपयोगके मुख्य भेद दो हैं—ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । ये दोनों प्रकारके उपयोग सब जीवोंके
पाये जाते हैं । इनके अवान्तर भेद कई हैं जो निमित्तविशेषसे होते हैं । ज्ञानावरण और दर्शनावरणके
अवान्तर भेदोंका यथायोग्य क्षयोपशम और क्षय तथा दर्शनमोहनीयका उदय ये प्रधान निमित्त हैं ।
इनके कारण दोनों प्रकारके उपयोग बारह भेदोंमें विभक्त हो जाते हैं । इस प्रकार ज्ञानोपयोगके
आठ और दर्शनोपयोगके चार भेद प्राप्त होते हैं । मुख्यतया संसारी जीवके एक कालमें एक
उपयोग और केवलीके दो उपयोग होते हैं । पर नाना जीवोंकी अपेक्षा परिगणना करनेपर वे
बारह होते हैं । यद्यपि प्रथम अध्यायमें एक जीवके एक साथ चार ज्ञान बतला आये हैं और जिसके
एक साथ चार ज्ञान होंगे उसके उसी समय तीन दर्शन भी पाये जायेंगे, पर यह कथन क्षयोपशमकी
प्रधानतासे किया गया जानना चाहिए । एक जीवके एक कालमें मतिज्ञानावरण आदि चार ज्ञाना-
वरण और चक्षुदर्शनावरण आदि तीन दर्शनावरण इन सात कर्मोंका क्षयोपशम हो सकता है पर
तत्त्वतः उनके उस समय उपयोग एक ही होगा । क्षयोपशम ज्ञानोत्पत्ति और दर्शनोत्पत्तिमें
निमित्त है और उपयोग ज्ञान दर्शनकी प्रवृत्ति है । जीवमें ज्ञान और दर्शन गुणकी धारा निरन्तर
प्रवर्तित होती रहती है । वह जिस समय बाह्य और अन्तरंग जैसा निमित्त मिलता है उसके अनु-
सार काम करने लगती है । इतना अवश्य है कि संसार अवस्थामें वह मलिन, मलिनतर और
मलिनतम रहती है और कैवल्य लाभ होनेपर वह विशुद्ध हो जाती है फिर उसकी प्रवृत्तिके लिए
अन्तरंग व बाह्य कारण अपेक्षित नहीं रहते । यही कारण है कि यहाँ जीवका लक्षण उपयोग
कहा है ।
§ २७४. सब आत्माओंमें साधारण उपयोगरूप जिस आत्मपरिणामका पहले व्याख्यान
किया है उससे उपलक्षित सब उपयोगवाले जीव दो प्रकारके हैं, इस बातका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
जीव दो प्रकारके हैं—संसारी और मुक्त ॥ १० ॥
§ २७५. संसरण करनेको संसार कहते हैं जिसका अर्थ परिवर्तन है । यह जिन जीवोंके
पाया जाता है वे संसारी हैं । परिवर्तनके पाँच भेद हैं—द्रव्यपरिवर्तन, क्षेत्रपरिवर्तन, कालपरि-
१. -विध उच्यते दि० २, मु० ।