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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 246, कुल 558 में से

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पृष्ठ 246

१३४ सर्वार्थसिद्धौ [ २।३१ § ३२१ –
§ ३२१. एवं गच्छतोऽभिनवमूर्त्यन्तरनिर्वृत्तिप्रकारप्रतिपादनार्थमाह—
सम्मूर्च्छनगर्भोषपादा जन्म ॥३१॥
§ ३२२. त्रिषु लोकेषूर्ध्वमधस्तिर्यक् च देहस्य समन्ततो मूच्छनं संमूच्छनमवयवप्रकल्पनम् ।
स्त्रिया उदरे शुक्रशोणितयोर्गरणं मिश्रणं गर्भः । मात्रुपभुक्ताहारगरणाद्वा गर्भः । उपेत्य पद्य-
५ तेऽस्मिन्निति उपपादः । देवनारकोत्पत्तिस्थानविशेषसंज्ञा । एते त्रयः संसारिणां जीवानां जन्म-
प्रकाराः शुभाशुभपरिणामनिमित्तकर्मभेदविपाककृताः ।
§ ३२३. अथाधिकृतस्य संसारविषयोपभोगोपलब्ध्यधिष्ठानप्रवणस्य जन्मनो योनिविकल्पा
वक्तव्या इत्यत आह—
सचित्तशीतसंवृताः सेतरा मिश्राश्चैकशस्तद्योनयः ॥३२॥
१० § ३२४. आत्मनश्चैतन्यविशेषपरिणामश्चित्तम् । सह चित्तेन वर्तत इति सचित्तः । शीत
इति स्पर्शविशेषः; शुक्लादिवदुभयवचनत्वात्तद्युक्तं द्रव्यमप्याह सम्यग्वृतः संवृतः । संवृत इति
दुरुपलक्ष्यप्रदेश उच्यते । सह इतरैर्वर्तन्त इति सेतराः । सप्रतिपक्षा इत्यर्थः । के पुनरितरे । अचि-
तोष्णविवृताः । उभयात्मको मिश्रः । सचित्ताचित्तः शीतोष्णः संवृतविवृत इति । 'च'शब्दः
समुच्चयार्थः । मिश्राश्च योनयो भवन्तीति । इतरथा हि पूर्वोक्तानामेव विशेषणं स्यात् । 'एकशः'
१५ § ३२१. इस प्रकार अन्य गतिको गमन करनेवाले जीवके नूतन दूसरे पर्यायकी उत्पत्तिके
भेदोंको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सम्मूर्च्छन, गर्भ और उपपाद ये (तीन) जन्म हैं ॥३१॥
§ ३२२. तीनों लोकोंमें ऊपर, नीचे और तिरछे देहका चारों ओरसे मूच्छंन अर्थात् ग्रहण
होना संमूर्च्छन है। इसका अभिप्राय है चारों ओरसे पुद्गलोंको ग्रहण कर अवयवोंकी रचना
२० होना । स्त्रीके उदरमें शुक्र और शोणितके परस्पर गरण अर्थात् मिश्रणको गर्भ कहते हैं । अथवा
माताके द्वारा उपभुक्त आहारके गरण होनेको गर्भ कहते हैं । प्राप्त होकर जिसमें जीव हलन-चलन
करता है उसे उपपाद कहते हैं। उपपाद यह देव और नारकियोंके उत्पत्तिस्थान विशेषकी संज्ञा
है। संसारी जीवोंके ये तीनों जन्मके भेद हैं, जो शुभ और अशुभ परिणामोंके निमित्तसे अनेक
प्रकारके कर्म बँधते हैं, उनके फल हैं।
२५ § ३२३. यहाँ तक संसारी विषयोंके उपभोगकी प्राप्तिमें आधारभूत जन्मोंका अधिकार
था। अब इनकी योनियोंके भेद कहने चाहिए, इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सचित्त, शीत और संवृत तथा इनकी प्रतिपक्षभूत अचि उष्ण और विवृत तथा मिश्र
अर्थात् सचित्ताचित्त, शोतोष्ण और संवृतविवृत ये उसकी अर्थात् जन्मकी योनियाँ हैं ॥३२॥
§ ३२४. आत्माके चैतन्यविशेषरूप परिणामको चित्त कहते हैं। जो उसके साथ रहता है
३० वह सचित्त कहलाता है। शीत यह स्पर्शका एक भेद है। शुक्ल आदिके समान यह द्रव्य और
गुण दोनोंका वाची है अतः शीतगुणवाला द्रव्य भो शीत कहलाता है। जो भले प्रकार ढका हो
वह संवृत कहलाता है। यहाँ संवृत ऐसे स्थानको कहते हैं जो देखनेमें न आवे। इतरका अर्थ अन्य
है और इनके साथ रहनेवाले सेतर कहे जाते हैं। शंका-वे इतर कौन हैं ? समाधान-अचित्त,
उष्ण और विवृत । जो उभयरूप होते हैं वे मिश्र कहलाते हैं। यथा-सचित्ताचित्त, शीतोष्ण
३५ १. -निर्वृत्तिजन्मप्रका-मु० । २. शुक्लशोणित-ता०, ना०, दि० १, मु० । ३. मात्रोपभुक्त-मु० । मात्रो-
पयुक्त -दि० १, दि० २ । ४. उपेत्योत्पद्य-मु० । ५. -लब्ध्याधिष्ठा-आ०, दि० १, दि० २ । ६. -कल्पो
वक्तव्यः आ० ता०, ना० । ७. सम्यग्वृतः संवृत इति आ० दि० १, दि० २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri