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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 240, कुल 558 में से

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पृष्ठ 240

१२८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।२१ § ३०१ -
§ ३०१. अत्राह, यत्तावन्मनोऽनवस्थानादिन्द्रियं न भवतीति प्रत्याख्यातं तत्किमुपयोग-
स्योपकारि उत नेति । तदप्युपकार्य्येव । तेन विनेन्द्रियाणां विषयेषु स्वप्रयोजनवृत्त्यभावात् । किम-
स्यैषां सहकारित्वमात्रमेव प्रयोजनमुतान्यदपीत्यत आह--
श्रुतमनिन्द्रियस्य ॥ २१ ॥
§ ३०२. श्रुतज्ञानविषयोऽर्थः श्रुतम् । स विषयोऽनिन्द्रियस्य; परिप्राप्तश्रुतज्ञानावरणक्षयो-
पशमस्यात्मनः १श्रुतार्थेऽनिन्द्रियालम्बनज्ञानप्रवृत्तेः । अथवा श्रुतज्ञानं श्रुतम्, तदनिन्द्रियस्यार्थः
प्रयोजनमिति यावत् । स्वातन्त्र्यसाध्यमिदं प्रयोजनमनिन्द्रियस्य ।
§ ३०३. उक्तानामिन्द्रियाणां प्रतिनियतविषयाणां स्वामित्वनिर्देशे कर्तव्ये यत्प्रथमं गृहीतं
स्पर्शनं तस्य तावत्स्वामित्वावधारणार्थमाह--
वनस्पत्यन्तानामेकम् ॥२२॥
§ ३०४. एकं प्रथममित्यर्थः । किं तत् । स्पर्शनम् । तत्केषाम् । पृथिव्यादीनां वनस्पत्यन्तानां
वेदितव्यम् । तस्योत्पत्तिकारणमुच्यते--वीर्यान्तरायस्पर्शनैन्द्रियावरणक्षयोपशमे सति शेषेन्द्रिय-
स्पर्शादिकका क्रम इन्द्रियोंके क्रमसे ही व्याख्यात है । अर्थात् इन्द्रियोंके क्रमको ध्यानमें रखकर
इनका कथन किया है ।
§ ३०१. आगे कहते हैं कि मन अनवस्थित है इसलिए वह इन्द्रिय नहीं । इस प्रकार जो
मनके इन्द्रियपनेका निषेध किया है, सो यह मन उपयोगका उपकारी है या नहीं ? मन भी उप-
कारी है, क्योंकि मनके बिना स्पर्शादि विषयोंमें इन्द्रियाँ अपने-अपने प्रयोजनकी सिद्धि करनेमें
समर्थ नहीं होतीं । तो क्या इन्द्रियोंकी सहायता करना ही मनका प्रयोजन है या और भी इसका
प्रयोजन है ? इसी बातको बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
श्रुत मनका विषय है ॥२१॥
§ ३०२. श्रुतज्ञानका विषयभूत अर्थ श्रुत है वह अनिन्द्रिय अर्थात् मनका विषय है, क्योंकि
श्रुतज्ञानावरणके क्षयोपशमको प्राप्त हुए जीवके श्रुतज्ञानके विषयमें मनके आलम्बनसे ज्ञान होता
है । अथवा श्रुत शब्दका अर्थ श्रुतज्ञान है। और वह मनका अर्थ अर्थात् प्रयोजन है। यह प्रयो-
जन मनके स्वतः आधीन है इसमें उसे दूसरेके साहाय्यकी आवश्यकता नहीं लेनी पड़ती ।
विशेषार्थ-यहाँ श्रुत शब्दका अर्थ श्रुतज्ञानका विषय या श्रुतज्ञान किया है और उसे
अनिन्द्रियका विषय बतलाया है । आशय यह है कि श्रुतज्ञानकी उपयोग दशा पाँच इन्द्रियोंके
निमित्तसे न होकर केवल अनिन्द्रियके निमित्तसे होती है। इसका यह अभिप्राय नहीं कि अनि-
न्द्रियके निमित्तसे केवल श्रुतज्ञान ही होता है, किन्तु इसका यह अभिप्राय है कि जिस प्रकार
मतिज्ञान इन्द्रिय और अनिन्द्रिय दोनोंके निमित्तसे होता है उस प्रकार श्रुतज्ञान इन दोनोंके
निमित्तसे न होकर केवल अनिन्द्रियके निमित्तसे होता है।
§ ३०३. किस इन्द्रियका क्या विषय है यह बतला आये । अब उनके स्वामियोंका कथन
करना है अतः सर्व प्रथम जो स्पर्शन इन्द्रिय कही है उसके स्वामीका निश्चय करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं-
वनस्पतिकायिक तकके जीवोंके एक अर्थात् प्रथम इन्द्रिय होती है ॥ २२ ॥
३०४. सूत्रमें आये हुए 'एक' शब्दका अर्थ प्रथम है। शंका-यह कौन है ? समाधान-
स्पर्शन । शंका-वह किन जीवोंके होतो है ? समाधान-पृथिवीकायिक जीवोंसे लेकर वनस्पति-
कायिक तकके जीवोंके जानना चाहिए । अब उसकी उत्पत्तिके कारणका कथन करते हैं-वीर्या-
१. श्रुतस्यार्थे मु०, ता०, ना० ।