सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें.१२० सर्वार्थसिद्धौ [ २।१० § २८० –
व्वानि । एवं तृतीयादिष्वपि कषायाध्यवसायस्थानेषु आ असंख्येयलोकपरिसमाप्तेर्वृद्धिक्रमो
वेदितव्यः । उक्ताया जघन्यायाः स्थितेः समयाधिकायाः कषायादिस्थानानि पूर्ववत्¹ । एवं
समयाधिकक्रमेण आ उत्कृष्टस्थितेस्त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोटीपरिमितायाः कषायादिस्थानानि²
वेदितव्यानि । अनन्तभागवृद्धिः असंख्येयभागवृद्धिः संख्येयभागवृद्धिः संख्येयगुणवृद्धिः असंख्येयगुण-
५ वृद्धिः अनन्तगुणवृद्धिः इमानि षट् वृद्धिस्थानानि । हानिरपि तथैव । अनन्तभागवृद्ध्यनन्तगुणवृद्धि-
रहितानि चत्वारि स्थानानि । एवं सर्वेषां कर्मणां मूलप्रकृतीनामुत्तरप्रकृतीनां च परिवर्तनक्रमो
वेदितव्यः । तदेतत्सर्वं समुदितं भावपरिवर्तनम् । उक्तं च—
³“सव्वा पयडिट्ठिदीओ अणुभागपदेसबंधठाणानि ।
मिच्छत्तसंसिदेण य भमिदा पुण भावसंसारे ॥”
१० § २८०. उक्तात्पञ्चविधात्संसारान्निवृत्ता ये ते मुक्ताः । संसारिणां प्रागुपादानं तत्पूर्वक-
त्वान्मुक्तव्यपदेशस्य ।
इस प्रकार असंख्यात लोकप्रमाण कषाय अध्यवसाय स्थानोंके होने तक तीसरे आदि कषाय अध्य-
वसाय स्थानोंमें वृद्धिका क्रम जानना चाहिए । जिस प्रकार सबसे जघन्य स्थितिके कषायादि स्थान
कहे हैं उसी प्रकार एक समय अधिक जघन्य स्थितिके भी कषायादि स्थान जानना चाहिए और
१५ इसी प्रकार एक-एक समय अधिकके क्रमसे तीस कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण उत्कृष्ट स्थिति तक
प्रत्येक स्थिति विकल्पके भी कषायादि स्थान जानना चाहिए । अनन्त भागवृद्धि, असंख्यात भाग-
वृद्धि, संख्यात भागवृद्धि, संख्यात गुणवृद्धि, असंख्यातगुणवृद्धि और अनन्त गुणवृद्धि इस प्रकार ये
वृद्धिके छह स्थान हैं तथा इसी प्रकार हानि भी छह प्रकारकी है। इनमें-से अनन्त भागवृद्धि और
अनन्त गुणवृद्धि इन दो स्थानोंके कम कर देनेपर चार स्थान होते हैं । इसी प्रकार सब मूल प्रकृ-
२० तियोंका और उनकी उत्तर प्रकृतियोंके परिवर्तनका क्रम जानना चाहिए । यह सब मिलकर एक
भावपरिवर्तन होता है। कहा भी है—
'इस जीवने मिथ्यात्वके संसर्गसे सब प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्धके स्थानोंको
प्राप्त कर भावसंसारमें परिभ्रमण किया।'
§ २८०. जो उक्त पाँच प्रकारके संसारसे निवृत्त हैं वे मुक्त हैं। सूत्रमें 'संसारि' पदका
२५ पहले ग्रहण किया, क्योंकि 'मुक्त' यह संज्ञा संसारपूर्वक प्राप्त होती है ।
विशेषार्थ—जीवके मुख्य भेद दो हैं—संसारी और मुक्त । ये भेद जीवकी बद्ध और अबद्ध
अवस्थाको ध्यानमें रखकर किये गये हैं । वस्तुतः ये जीवकी दो अवस्थाएँ हैं। पहले जीव बद्ध
अवस्थामें रहता है इसलिए उसे संसारी कहते हैं और बादमें उसके मुक्त होनेपर वही मुक्त कह-
लाता है । जीवका संसार निमित्त-सापेक्ष होता है, इसलिए इस अपेक्षासे संसारके पाँच भेद किये
३० गये हैं—द्रव्यसंसार, क्षेत्रसंसार, कालसंसार, भवसंसार और भावसंसार । इनका दूसरा नाम परि-
वर्तन भी है। द्रव्य पदसे कर्म और नोकर्म लिये गये हैं, क्षेत्र पद से आकाशके प्रदेशों का ग्रहण
किया है, काल पदसे समयका ग्रहण किया है, भव पदसे जीवकी नर नारक आदि अवस्थाओंका
ग्रहण किया है और भाव पदसे जीवके योग और कषायस्थान विवक्षित हैं। इन द्रव्यादिके निमित्त-
से संसारमें जीवका परिभ्रमण किस प्रकार होता रहता है यही यहाँ बतलाया गया है । इन परि-
३५ वर्तनोंके होनेमें उत्तरोत्तर अधिक-अधिक काल लगता है। मुख्य रूपसे जीवका संसार सम्यग्दर्शन-
के प्राप्त होनेके पूर्वतक माना गया है, इससे ये परिवर्तन जीवकी मिथ्यात्व अवस्थामें होते हैं यह
सिद्ध होता है । सम्यग्दर्शनके होनेपर जीवका ईषत् संसार शेष रहनेपर भी वह इन परिवर्तनोंसे
१. पूर्ववदेकसम-मु० । २. -स्थानानि (पूर्ववत्) वेदि-मु० । ३. बा० अणु० गा० २९ ।