सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११८ सर्वार्थसिद्धौ [ २।१० § २७७ –
"सव्वम्हि लोयखेत्ते कमसो तं णत्थि जं ण उप्पण्णं ।
ओगाहणाए² बहुसो परिब्भमिदो खेत्तसंसारे ॥"
§ २७७. कालपरिवर्तनमुच्यते—उत्सर्पिण्याः प्रथमसमये जातः कश्चिज्जीवः स्वायुषः
परिसमाप्तौ मृतः । स एव ³पुनर्द्वितीयाया उत्सर्पिण्या द्वितीयसमये जातः स्वायुषः क्षयान्मृतः । स
एव पुनस्तृतीयाया उत्सर्पिण्यास्तृतीयसमये जातः । एवमनेन क्रमेणोत्सर्पिणी परिसमाप्ता । तथा-
वसर्पिणी च । एवं जन्मनैरन्तर्यमुक्तम् । ⁴मरणस्यापि नैरन्तर्यं तथैव ग्राह्यम् । एतावत्कालपरि-
वर्तनम् । उक्तं च—
"⁵उस्सप्पिणिअवसप्पिणिसमयावलियासु णिरवसेसासु ।
जादो मुदो य बहुसो भमणेण दु कालसंसारे ॥"
§ २७८. भवपरिवर्तनमुच्यते—नरकगतौ सर्वजघन्यमायुर्दशवर्षसहस्राणि । तेनायुषा तत्रो-
त्पन्नः पुनः परिभ्रम्य तेनैवायुषा जातः । एवं दशवर्षसहस्राणां यावन्तः समयास्तावत्कृत्वस्तत्रैव
जातो मृतः । पुनरेकैकसमयाधिकभावेन त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणि परिसमापितानि । ततः प्रच्युत्य
तिर्यग्गतावन्तर्मुहूर्तायुः समुत्पन्नः । पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त्रीणि पल्योपमानि तेन परिसमापितानि ।
एवं मनुष्यगतौ च⁶ । देवगतौ च नारकवत् । अयं तु विशेषः—एकत्रिंशत्सागरोपमाणि परिसमा-
पितानि यावत्तावद् भवपरिवर्तनम् । उक्तं च—
'सब लोक क्षेत्रमें ऐसा एक प्रदेश नहीं है जहाँ यह अवगाहनाके साथ क्रमसे नहीं उत्पन्न
हुआ । इस प्रकार इस जीवने क्षेत्र संसारमें अनेक बार परिभ्रमण किया ।'
§ २७७. अब कालपरिवर्तनका कथन करते हैं—कोई जीव उत्सर्पिणीके प्रथम समयमें
उत्पन्न हुआ और आयुके समाप्त हो जानेपर मर गया । पुनः वही जीव दूसरी उत्सर्पिणीके दूसरे
समयमें उत्पन्न हुआ और अपनी आयुके समाप्त होनेपर मर गया । पुनः वही जीव तीसरी
उत्सर्पिणीके तीसरे समयमें उत्पन्न हुआ । इस प्रकार इसने क्रमसे उत्सर्पिणी समाप्त की और इसी
प्रकार अवसर्पिणी भी । यह जन्मका नैरन्तर्य कहा । तथा इसी प्रकार मरण का भी नैरन्तर्य लेना
चाहिए । इस प्रकार यह सब मिलकर एक कालपरिवर्तन है । कहा भी है—
'कालसंसारमें परिभ्रमण करता हुआ यह जीव उत्सर्पिणी और अवसर्पिणीके सब समयोंमें
अनेक बार जन्मा और मरा ।'
§ २७८. अब भवपरिवर्तनका कथन करते हैं—नरकगतिमें सबसे जघन्य आयु दस हजार
वर्षकी है । एक जीव उस आयुसे वहाँ उत्पन्न हुआ पुनः घूम-फिरकर उसी आयुसे वहीं उत्पन्न
हुआ । इस प्रकार दस हजार वर्षके जितने समय हैं उतनी बार वहीं उत्पन्न हुआ और मरा ।
पुनः आयुमें एक-एक समय बढ़ाकर नरककी तैंतीस सागर आयु समाप्त की । तदनन्तर नरकसे
निकलकर अन्तर्मुहूर्त आयुके साथ तिर्यंचगतिमें उत्पन्न हुआ । और पूर्वोक्त क्रमसे उससे तिर्यंच-
गतिकी तीन पल्य आयु समाप्त की । इसी प्रकार मनुष्यगतिमें अन्तर्मुहूर्तसे लेकर तीन पल्य आयु
समाप्त की । तथा देवगतिमें नरकगतिके समान आयु समाप्त की । किन्तु देवगतिमें इतनी विशे-
षता है कि यहाँ इकतीस सागर आयु समाप्त होने तक कथन करना चाहिए । इस प्रकार यह सब
मिलकर एक भवपरिवर्तन है । कहा भी है—
१. बा० अणु०, गा० २६ । २. -हणेण बहुसो मु०, ना० । ३. एव तृती-आ०, दि० १, दि० २ ।
४. मरणमपि तथैव ग्रा-ता० । मरणस्यापि तथैव ग्रा-ना० । ५. बा० अणु० गा० २७ । ६. च तिर्यञ्चवत् । देव-मु०, ता० ।