सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- २।१८ § २९६ ] द्वितीयोऽध्यायः १२५
§ २९४. निर्वर्त्यते ¹इति निर्वृत्तिः । केन निर्वर्त्यते । कर्मणा । सा द्विविधा; बाह्याभ्यन्तर-
भेदात् । उत्सेधाङ्गुलासंख्येयभागप्रमितानां शुद्धानामात्मप्रदेशानां प्रतिनियतचक्षुरादीन्द्रियसंस्थाने-
नावस्थितानां वृत्तिराभ्यन्तरा निर्वृत्तिः । तेष्वात्मप्रदेशेष्विन्द्रियव्यपदेशभाक्षु यः प्रतिनियतसंस्थानो
नामकर्मोदयापादितावस्थाविशेषः पुद्गलप्रचयः सा बाह्या निर्वृत्तिः । येन निर्वृत्तेरुपकारः क्रियते
तदुपकरणम् । पूर्ववत्तदपि द्विविधम् । तत्राभ्यन्तरं कृष्णशुक्लमण्डलं बाह्यमक्षिपत्रपक्ष्मद्वयादि । ५
एवं ²शेषेष्वपीन्द्रियेषु ज्ञेयम् ।
§ २९५. भावेन्द्रियमुच्यते--
लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् ॥ १८ ॥
§ २९६. लम्भनं लब्धिः । का पुनरसौ । ज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमविशेषः । यत्संनिधा-
नादात्मा द्रव्येन्द्रियनिर्वृत्ति प्रति व्याप्रियते तन्निमित्त आत्मनः परिणाम उपयोगः । तदुभये भावे- १०
न्द्रियम् । इन्द्रियफलमुपयोगः, तस्य कथमिन्द्रियत्वम् । कारणधर्मस्य कार्ये दर्शनात् । यथा घटा-
कारपरिणतं विज्ञानं घट इति । स्वार्थस्य तत्र मुख्यत्वाच्च । इन्द्रस्य लिङ्गमिन्द्रियमिति यः स्वार्थः
स उपयोगे³ मुख्यः, उपयोगलक्षणो जीव इति वचनात् । अत उपयोगस्येन्द्रियत्वं न्याय्यम् ।
§ २९४. रचनाका नाम निर्वृत्ति है। शंका—यह रचना कौन करता है ? समाधान—
कर्म । निर्वृत्ति दो प्रकार की है—बाह्यनिर्वृत्ति और आभ्यन्तर निर्वृत्ति । उत्सेधांगुलके असंख्यातवें १५
भागप्रमाण और प्रतिनियत चक्षु आदि इन्द्रियोंके आकाररूपसे अवस्थित शुद्ध आत्मप्रदेशोंकी रचना-
को आभ्यन्तर निर्वृत्ति कहते हैं। तथा इन्द्रिय नामवाले उन्हीं आत्मप्रदेशोंमें प्रतिनियत आकाररूप
और नामकर्मके उदयसे विशेष अवस्थाको प्राप्त जो पुद्गलप्रचय होता है उसे बाह्यनिर्वृत्ति कहते
हैं। जो निर्वृत्तिका उपकार करता है उसे उपकरण कहते हैं। निर्वृत्तिके समान यह भी दो प्रकार-
का है—आभ्यन्तर और बाह्य । नेत्र इन्द्रियमें कृष्ण शुक्लमण्डल आभ्यन्तर उपकरण है तथा २०
पलक और दोनों बरोनी आदि बाह्य उपकरण हैं। इसी प्रकार शेष इन्द्रियोंमें भी जानना चाहिए ।
विशेषार्थ—आगममें संसारी जीवके प्रदेश चलाचल बतलाये हैं। मध्यके आठ प्रदेश अचल
होते हैं और शेष प्रदेश चल । ऐसी अवस्थामें नियत आत्म प्रदेश ही सदा विवक्षित इन्द्रियरूप बने
रहते हैं यह नहीं कहा जा सकता, किन्तु प्रदेश परिस्पन्दके अनुसार प्रति समय अन्य-अन्य प्रदेश
आभ्यन्तर निर्वृत्तिरूप होते रहते हैं ऐसा यहाँ समझना चाहिए। जिसके जितनी इन्द्रियां होती हैं उसके २५
उतने इन्द्रियावरण कर्मोंका क्षयोपशम सर्वांग होता है, इसलिए आभ्यन्तर निर्वृत्तिकी उक्त प्रकारसे
व्यवस्था माननेमें कोई बाधा नहीं आती। यह उक्त कथनका तात्पर्य है। शेष कथन सुगम है।
§ २९५. अब भावेन्द्रियका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
लब्धि और उपयोगरूप भावेन्द्रिय है ॥१८॥
§ २९६. लब्धि शब्दका व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ है—लम्भनं लब्धिः—प्राप्त होना । शंका— ३०
लब्धि किसे कहते हैं ? समाधान—ज्ञानावरण कर्मके क्षयोपशम विशेषको लब्धि कहते हैं। जिसके
संसर्गसे आत्मा द्रव्येन्द्रियकी रचना करनेके लिए उद्यत होता है तन्निमित्तक आत्माके परिणामको
उपयोग कहते हैं। लब्धि और उपयोग ये दोनों भावेन्द्रियाँ हैं। शंका—उपयोग इन्द्रियका फल है,
वह इन्द्रिय कैसे हो सकता है ? समाधान—कारणका धर्म कार्यमें देखा जाता है। जैसे घटाकार
परिणत हुआ ज्ञान भी घट कहलाता है, अतः इन्द्रियके फलको इन्द्रिय माननेमें कोई आपत्ति नहीं ३५
है । दूसरे इन्द्रियका जो अर्थ है वह मुख्यतासे उपयोगमें पाया जाता है। तात्पर्य यह है कि 'इन्द्रके
लिंगको इन्द्रिय कहते हैं' यह जो इन्द्रिय शब्दका अर्थ है वह उपयोगमें मुख्य है, क्योंकि जीवका लक्षण
१. निर्वर्त्यत इति मु० । २. शेषेष्विन्द्रि-मु० । ३. -योगो मुख्यः दि० १, दि० २, मु० ।