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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 558 में से

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पृष्ठ 234

वशवर्तिनः स्थावराः । त्रस्यन्तीति त्रसाः, स्थानशीलाः स्थावरा इति चेत् । न; आगमविरोधात् ।
आगमे हि कायानुवादेन त्रसा द्वीन्द्रियादारभ्य आ अयोगकेवलिन इति । तस्मान्न चलनाचलनापेक्षं
त्रसस्थावरत्वम् । कर्मोदयापेक्षमेव । त्रसग्रहणमादौ क्रियते; अल्पाच्तरत्वादभ्यर्हितत्वाच्च । सर्वो-
प्रयोगसंभवादभ्यर्हितत्वम् ।
§ २८५. एकेन्द्रियाणामतिबहुवक्तव्याभावादुल्लङ्घ्यानुपूर्वी स्थावरभेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः ॥१३॥
§ २८६. स्थावरनामकर्मभेदाः पृथिवीकायादयः सन्ति । तदुदयनिमित्ता¹ जीवेषु पृथिव्यादयः
संज्ञा वेदितव्याः । प्रथनादिप्रकृतिनिष्पन्ना अपि रूढिवशात्प्रथनाद्यनपेक्षा वर्तन्ते । एषां पृथिव्यादी-
नामार्षे चातुर्विध्यमुक्तं प्रत्येकम् । तत्कथमिति चेद् । उच्यते—पृथिवी पृथिवीकायः पृथिवीकायिकः
पृथिवीजीव इत्यादि । तत्र अचेतना वैश्रसिकपरिणामनिर्वृत्ता काठिन्यगुणात्मिका पृथिवी । अचेतन-
त्वादसत्यपि पृथिवीकायनामकर्मोदये प्रथनक्रियोपलक्षितैवेयम् । अथवा पृथिवीति सामान्यम्;
उत्तरत्रयेऽपि सद्भावात् । कायः शरीरम् । पृथिवीकायिकजीवपरित्यक्तः पृथिवीकायो मृतमनुष्यादि-
सूत्रके लिए भी हो जाता है । यथा—वे संसारी जीव दो प्रकारके हैं त्रस और स्थावर । जिनके
त्रस नामकर्मका उदय है वे त्रस कहलाते हैं और जिनके स्थावर नाम कर्मका उदय है उन्हें स्थावर
कहते हैं। शंका—'त्रस्यन्ति' अर्थात् जो चलते-फिरते हैं वे त्रस हैं और जो स्थिति स्वभाववाले हैं
वे स्थावर हैं, क्या त्रस और स्थावरका यह लक्षण ठीक है ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं,
क्योंकि ऐसा माननेमें आगमसे विरोध आता है । क्योंकि कायानुवादकी अपेक्षा कथन करते हुए
आगम में बतलाया है कि द्वीन्द्रिय जीवोंसे लेकर अयोग केवली तकके सब जीव त्रस हैं । इसलिए
गमन करने और न करनेकी अपेक्षा त्रस और स्थावर यह भेद नहीं है किन्तु त्रस और स्थावर
कर्मोंके उदयकी अपेक्षासे ही है । सूत्रमें त्रसपदका प्रारम्भमें ग्रहण किया है क्योंकि स्थावर पदसे
इसमें कम अक्षर हैं और यह श्रेष्ठ है । त्रस श्रेष्ठ इसलिए हैं कि इनके सब उपयोगोंका पाया जाना
सम्भव है ।
§ २८५. एकेन्द्रियोंके विषयमें अधिक वक्तव्य नहीं है इसलिए आनुपूर्वीको छोड़कर पहले
स्थावरके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक ये पाँच
स्थावर हैं ॥ १३ ॥
§ २८६. पृथिवीकाय आदि स्थावर नामकर्मके भेद हैं । उनके उदयके निमित्तसे जीवोंके
पृथिवी आदिक नाम जानने चाहिए । यद्यपि ये नाम प्रथन आदि धातुओंसे बने हैं तो भी ये रूढिक
हैं इसलिए इनमें प्रथन आदि धर्मोंकी अपेक्षा नहीं है । शंका—आर्षमें ये पृथिवी आदिक अलग-
अलग चार प्रकारके कहे हैं सो ये चार-चार भेद किस प्रकार प्राप्त होते हैं ? समाधान—
पृथिवी, पृथिवीकाय, पृथिवीकायिक और पृथिवीजीव ये पृथिवीके चार भेद हैं । इनमेंसे जो
अचेतन है, प्राकृतिक परिणमनोंसे बनी है और कठिन गुणवाली है वह पृथिवी है । अचेतन होनेसे
यद्यपि इसमें पृथिवी नामकर्मका उदय नहीं है तो भी प्रथनक्रियासे उपलक्षित होनेके कारण अर्थात्
विस्तार आदि गुणवाली होनेके कारण यह पृथिवी कहलाती है । अथवा पृथिवी यह सामान्य भेद
है क्योंकि आगेके तीन भेदोंमें भी यह पाया जाता है । कायका अर्थ शरीर है, अतः पृथिवीकायिक
जीवके द्वारा जो शरीर छोड़ दिया जाता है वह पृथिवीकाय कहलाता है । यथा मरे हुए मनुष्य


१. –निमित्ता अमी इति जीवेषु मु० ना० ।