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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 239, कुल 558 में से

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पृष्ठ 239
  • २।२० § ३०० ] द्वितीयोऽध्यायः १२७
    क्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलाभावष्टम्भादात्मना ^१स्पृश्यतेऽनेनेति स्पर्शनम् । रस्यतेऽनेनेति रसनम् ।
    घ्रायतेऽनेनेति घ्राणम् । चक्षेरनेकार्थत्वाद्दर्शनार्थविवक्षायां चष्टे अर्थान्पश्यत्यनेनेति चक्षुः । श्रूयते-
    ऽनेनेति श्रोत्रम् । स्वातन्त्र्यविवक्षा च दृश्यते । इदं ^२ मे अक्षि सुष्ठु पश्यति । अयं मे कर्णः सुष्ठु
    शृणोति । ततः स्पर्शनादीनां कर्तरि निष्पत्तिः । स्पृशतीति स्पर्शनम् । रसतीति रसनम् । जिघ्र-
    तीति घ्राणम् । चष्टे इति चक्षुः । शृणोतीति श्रोत्रम् । एषां निर्देशक्रमः एकैकवृद्धिक्रमप्रज्ञापनार्थः । ५
    § २९९. तेषामिन्द्रियाणां विषयप्रदर्शनार्थमाह—
    ^३ स्पर्शरसगन्धवर्णशब्दास्तदर्थाः ॥२०॥
    § ३००. द्रव्यपर्याययोः प्राधान्यविवक्षायां कर्मभावसाधनत्वं स्पर्शादिशब्दानां वेदितव्यम् ।
    द्रव्यप्राधान्यविवक्षायां कर्मनिर्देशः । स्पृश्यत इति स्पर्शः । रस्यत इति रसः । गन्ध्यत इति गन्धः । १०
    वर्ण्यत इति वर्णः । शब्दयत इति शब्दः । पर्यायप्राधान्यविवक्षायां भावनिर्देशः । स्पर्शनं स्पर्शः ।
    रसनं रसः । गन्धनं गन्धः । वर्णनं वर्णः । शब्दनं शब्द ^४ इति । एषां क्रम इन्द्रियक्रमेणैव व्याख्यातः ।
    करणपना बन जाता है । वीर्यान्तराय और मतिज्ञानावरणकर्मके क्षयोपशमसे तथा अंगोपांग नाम-
    कर्मके आलम्बनसे आत्मा जिसके द्वारा स्पर्श करता है वह स्पर्शन इन्द्रिय है, जिसके द्वारा स्वाद
    लेता है वह रसन इन्द्रिय है, जिसके द्वारा सूंघता है वह घ्राण इन्द्रिय है । चक्षि धातुके अनेक १५
    अर्थ हैं । उनमें-से यहाँ दर्शनरूप अर्थ लिया गया है इसलिए जिसके द्वारा पदार्थोंको देखता है
    वह चक्षु इन्द्रिय है तथा जिसके द्वारा सुनता है वह श्रोत्र इन्द्रिय है । इसीप्रकार इन इन्द्रियोंकी
    स्वातन्त्र्य विवक्षा भी देखी जाती है । जैसे यह मेरी आँख अच्छी तरह देखती है, यह मेरा कान
    अच्छी तरह सुनता है । और इसलिए इन स्पर्शन आदि इन्द्रियोंकी कर्ताकारकमें सिद्धि होती है ।
    यथा—जो स्पर्श करती है वह स्पर्शन इन्द्रिय है, जो स्वाद लेती है वह रसन इन्द्रिय है, जो सूंघती
    है वह घ्राण इन्द्रिय है, जो देखती है वह चक्षु इन्द्रिय है और जो सुनती है वह कर्ण इन्द्रिय है । २०
    सूत्रमें इन इन्द्रियोंका जो स्पर्शनके बाद रसना और उसके बाद घ्राण इत्यादि क्रमसे निर्देश किया
    है वह एक-एक इन्द्रियकी इस क्रमसे वृद्धि होती है यह दिखलानेके लिए किया है ।
    § २९९. अब उन इन्द्रियोंका विषय दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    स्पर्शन, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द ये क्रमसे उन इन्द्रियोंके विषय हैं ॥२०॥ २५
    § ३००. द्रव्य और पर्यायकी प्राधान्य विवक्षामें स्पर्शादि शब्दोंकी क्रमसे कर्मसाधन अरौ
    भावसाधनमें सिद्धि जानना चाहिए । जब द्रव्यकी अपेक्षा प्रधान रहती है तब कर्मनिर्देश होता
    है । जैसे—जो स्पर्श किया जाता है वह स्पर्श है, जो स्वादको प्राप्त होता है वह रस है, जो सूंघा
    जाता है वह गन्ध है, जो देखा जाता है वह वर्ण है और जो शब्दरूप होता है वह शब्द है । इस
    व्युत्पत्तिके अनुसार ये सब स्पर्शादिक द्रव्य ठहरते हैं । तथा जब पर्यायकी विवक्षा प्रधान रहती ३०
    है तब भावनिर्देश होता है । जैसे—स्पर्शन स्पर्श है, रसन रस है, गन्धन गन्ध है, वर्णन वर्ण है
    और शब्दन शब्द है । इस व्युत्पत्तिके अनुसार ये सब स्पर्शादिक धर्म निश्चित होते हैं । इन
    १. जिघ्रत्यनेन घ्राणं गन्धं गृह्णातीति । रसयत्यनेनेति रसनं रसं गृह्णातीति । चष्टेऽनेनेति चक्षू रूपं
    पश्यतीति × × शृणोत्यनेनेति श्रोत्रं शब्दं गृह्णातीति । —वा० भा० १, १, १२ । २. इमानीन्द्रियाणि
    कदाचित्स्वातन्त्र्येण विवक्षितानि भवन्ति । तद्यथा—इदं मे अक्षि सुष्ठु पश्यति, अयं मे कर्णः सुष्ठु शृणोतीति । ३५
    कदाचित्पारतन्त्र्येण विवक्षितानि भवन्ति—अनेनाक्ष्णा सुष्ठु पश्यामि । अनेन कर्णेन सुष्ठु शृणोमि इति ।
    —पा० म० भा० १।२।२।५९ । ३. गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः । —वा० भा० १,
    १, ४१ । ४. -शब्दः । एषां मु० ता० । -शब्दः । तेषां मु० ।