सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 247, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंइति वीप्सार्थः । तस्य ग्रहणं क्रममिश्रप्रतिपत्त्यर्थम् । यथैवं विज्ञायेत—सचित्तश्च अचित्तश्च,
शीतश्च उष्णश्च, संवृतश्च विवृतश्चेति । मैवं विज्ञायि—सचित्तश्च शीतश्चेत्यादि । 'तद्ग्रहणं
जन्मप्रकारप्रतिनिर्देशार्थम् । तेषां संमूर्च्छनादीनां जन्मनां योनय इति । त एते नव योनयो वेदि-
तव्याः । योनिजन्मनोरविशेष इति चेत् । न; आधाराधेयभेदात्तद्भेदः । त एते सचित्तादयो योनय
आधाराः । आधेया जन्मप्रकाराः । यतः सचित्तादियोन्यधिष्ठाने आत्मा संमूर्च्छनादिना जन्मना
शरीराहारेन्द्रियादियोग्यान्पुद्गलानुपादत्ते । देवनारका अचित्तयोनयः । तेषां हि योनिरुपपाददेश-
पुद्गलप्रचयोऽचित्तः । गर्भजा मिश्रयोनयः । तेषां हि मातुरुदरे शुक्रशोणितमचित्तम्, तदात्मना
चित्तवता मिश्रणान्मिथयोनिः१। संमूर्च्छनजास्त्रिविकल्पयोनयः । केचित्सचित्तयोनयः । अन्ये
अचित्तयोनयः । अपरे मिश्रयोनयः । सचित्तयोनयः साधारणशरीराः । कुतः । परस्पराश्रयत्वात् ।
इतरे अचित्तयोनयो मिश्रयोनयश्च । शीतोष्णयोनयो देवनारकाः । तेषां हि उपपादस्थानानि
कानिचिच्छीतानि कानिचिदुष्णानीति । उष्णयोनयस्तैजस्कायिकाः । इतरे त्रिविकल्पयोनयः ।
केचिच्छीतयोनयः । केचिदुष्णयोनयः । अपरे मिश्रयोनय इति । देवनारकैकेन्द्रियाः संवृतयोनयः ।
विकलेन्द्रिया विवृतयोनयः । गर्भजाः मिश्रयोनयः । तद्भेदाश्चतुरशीतिशतसहस्रसंख्या आगमतो
वेदितव्याः । उक्तं च—
और संवृतविवृत । सूत्रमें 'च' शब्द समुच्चयवाची है । जिससे योनियां मिश्र भी होती हैं' इसका
समुच्चय हो जाता है । यदि 'च' पदका यह अर्थ न लिया जाय तो मिश्रपद पूर्वोक्त पदोंका ही
विशेषण हो जाता । 'एकशः' यह पद वीप्सावाची है । सूत्रमें इस पदका ग्रहण क्रम और मिश्रका
ज्ञान करानेके लिए किया है । जिससे यह ज्ञान हो कि सचित्त, अचित्त, शीत, उष्ण, संवृत, विवृत
इस क्रमसे योनियाँ ली हैं । यह ज्ञान न हो कि सचित्त, शीत इत्यादि क्रमसे योनियाँ ली हैं ।
जन्मके भेदोंके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'तत्' पदका ग्रहण किया है । उन संमूर्च्छन आदि जन्मोंकी
ये नौ योनियां हैं यह इसका भाव है । शंका—योनि और जन्ममें कोई भेद नहीं ? समाधान—
नहीं, क्योंकि आधार और आधेयके भेदसे उनमें भेद हैं । ये सचित्त आदिक योनियाँ आधार हैं
ओर जन्मके भेद आधेय हैं, क्योंकि सचित्त आदि योनिरूप आधारमें संमूर्च्छन आदि जन्मके द्वारा
आत्मा, शरीर, आहार और इन्द्रियोंके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करता हैं । देव और नारकियोंकी
अचित्त योनि होती है, क्योंकि उनके उपपाददेशके पुद्गलप्रचयरूप योनि अचित्त है । गर्भजोंकी
मिश्र योनि होती है, क्योंकि उनकी माताके उदरमें शुक्र और शोणित अचित्त होते हैं जिनका
सचित्त माताकी आत्मासे मिश्रण है इसलिए वह मिश्रयोनि है । संमूर्च्छनोंकी तीन प्रकारकी
योनियाँ होती हैं । किन्हींकी सचित्त योनि होती है, किन्हींको अचित्तयोनि होती है और किन्हींकी
मिश्रयोनि होतो है । साधारण शरीरवाले जीवोंकी सचित्त योनि होती है क्योंकि ये एक-दूसरेके
आश्रयसे रहते हैं । इनमें अतिरिक्त शेष संमूर्च्छन जीवोंके अचित्त और मिश्र दोनों प्रकारकी
योनियाँ होती हैं । देव और नारकियोंकी शीत और उष्ण दोनों प्रकारकी योनियाँ होती हैं;
क्योंकि इनके कुछ उपपादस्थान शीत हैं और कुछ उष्ण । तेजस्कायिक जीवोंकी उष्णयोनि होती
है । इनसे अतिरिक्त जीवोंकी योनियाँ तीन प्रकारकी होती हैं । किन्हींकी शीत योनियाँ होती हैं,
किन्हींको उष्णयोनियाँ होती हैं और किन्हींकी मिश्रयोनियाँ होती हैं । देव, नारकी और एके-
न्द्रियोंकी संवृत योनियाँ होती हैं । विकलेन्द्रियोंकी विवृत योनियाँ होती हैं । तथा गर्भजोंकी मिश्र
योनियाँ होती हैं । इन सब योनियोंके चौरासी लाख भेद हैं यह बात आगमसे जाननी चाहिए ।
कहा भी है—
१. –मिश्रं मिश्रयोनिः आ०, दि० १, दि० २ ।