सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- २।१० § २७६ ] द्वितीयोऽध्यायः १९७
द्रव्यपरिवर्तनं द्विविधम्—नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनं कर्मद्रव्यपरिवर्तनं चेति । तत्र नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनं
नाम त्रयाणां शरीराणां षण्णां पर्याप्तीनां च योग्या ये पुद्गला एकेन जीवेन एकस्मिन्समये गृहीताः
स्निग्धरूक्षवर्णगन्धादिभिस्तीव्रमन्दमध्यमभावेन च यथावस्थिता द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णा
अगृहीतानन्तवारानतीत्य मिश्रकांश्चानन्तवारानतीत्य मध्ये गृहीतांश्चानन्तवारानतीत्य त एव
तेनैव प्रकारेण तस्यैव जीवस्य नोकर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्समुदितं नोकर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । ५
कर्मद्रव्यपरिवर्तनमुच्यते—एकस्मिन्समये एकेन जीवेनाष्टविधकर्मभावेन ये गृहीताः पुद्गलाः
समयाधिकामावलिकामतीत्य द्वितीयादिषु समयेषु निर्जीर्णाः, पूर्वोक्तेनैव क्रमेण त एव तेनैव
प्रकारेण तस्य जीवस्य कर्मभावमापद्यन्ते यावत्तावत्कर्मद्रव्यपरिवर्तनम् । उक्तं च—
"सव्वे वि पुग्गला खलु कमसो भुत्तुज्झिया य जीवेणं ।
१असइं अणंतखुत्तो पुग्गलपरियट्टसंसारे२ ॥" १०
§ २७६. क्षेत्रपरिवर्तनमुच्यते—सूक्ष्मनिगोदजीवोऽपर्याप्तकः सर्वजघन्यप्रदेशशरीरो लोकस्या-
ष्टमध्यप्रदेशान्स्वशरीरमध्ये३ कृत्वोत्पन्नः क्षुद्रभवग्रहणं जीवित्व़ा मृतः । स एव पुनस्तेनैवावगाहेन
द्विरुत्पन्नस्तथा त्रिस्तथा चतुरित्येवं यावद् ४घनाङ्गुलस्यासंख्येयभागप्रमिताकाशप्रदेशास्तावत्कृत्व-
स्तत्रैव जनित्वा पुनरेकैकप्रदेशाधिकभावेन सर्वो लोक आत्मनो जन्मक्षेत्रभावमुपनीतो भवति याव-
त्तावत्क्षेत्रपरिवर्तनम् । उक्तं च— १५
वर्तन, भवपरिवर्तन और भावपरिवर्तन । द्रव्यपरिवर्तनके दो भेद हैं—नोकर्म द्रव्यपरिवर्तन और
कर्म द्रव्यपरिवर्तन । अब नोकर्म द्रव्य परिवर्तनका स्वरूप कहते हैं—किसी एक जीवने तीन शरीर
और छह पर्याप्तियोंके योग्य पुद्गलोंको एक समयमें ग्रहण किया। अनन्तर वे पुद्गल स्निग्ध या
रूक्ष स्पर्श तथा वर्ण और गन्ध आदिके द्वारा जिस तीव्र, मन्द और मध्यम भावसे ग्रहण किये थे
उस रूपसे अवस्थित रहकर द्वितीयादि समयोंमें निर्जीर्ण हो गये। तत्पश्चात् अगृहीत परमाणुओंको २०
अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा, मिश्र परमाणुओंको अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा और बीचमें
गृहीत परमाणुओंको अनन्त बार ग्रहण करके छोड़ा। तत्पश्चात् जब उसी जीवके सर्व प्रथम ग्रहण
किये गये वे ही कर्म परमाणु उसी प्रकारसे नोकर्म भावको प्राप्त होते हैं तब यह सब मिलकर एक
नोकर्म द्रव्यपरिवर्तन होता है। अब कर्मद्रव्यपरिवर्तनका कथन करते हैं—एक जीवने आठ प्रकारके
कर्मरूपसे जिन पुद्गलोंको ग्रहण किया वे समयाधिक एक आवलिकालके बाद द्वितीयादिक समयोंमें २५
झर गये। पश्चात् जो क्रम नोकर्म द्रव्यपरिवर्तनमें बतलाया है उसी क्रमसे वे ही पुद्गल उसी
प्रकारसे उस जीवके जब कर्मभावको प्राप्त होते हैं तब यह सब एक कर्म द्रव्यपरिवर्तन कहलाता
है। कहा भी है—
'इस जीवने सभी पुद्गलोंको क्रमसे भोगकर छोड़ दिया। और इस प्रकार यह जीव
अनन्तबार पुद्गल परिवर्तनरूप संसारमें घूमता है।' ३०
§ २७६. अब क्षेत्रपरिवर्तनका कथन करते हैं—जिसका शरीर आकाशके सबसे कम प्रदेशों-
पर स्थित है ऐसा एक सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव लोकके आठ मध्य प्रदेशोंको अपने शरीरके
मध्यमें करके उत्पन्न हुआ और क्षुद्रभवग्रहण काल तक जीकर मर गया। पश्चात् वही जीव पुनः
उसी अवगाहनासे वहाँ दूसरी बार उत्पन्न हुआ, तीसरी बार उत्पन्न हुआ, चौथी बार उत्पन्न
हुआ। इस प्रकार अंगुलके असंख्यातवें भागमें आकाशके जितने प्रदेश प्राप्त हों उतनी बार वहीं ३५
उत्पन्न हुआ। पुनः उसने आकाशका एक-एक प्रदेश बढ़ाकर सब लोकको अपना जन्मक्षेत्र बनाया।
इस प्रकार यह सब मिलकर एक क्षेत्रपरिवर्तन होता है। कहा भी है—
१. अच्छइ अणं-दि० १, दि० २, आ०, मु० । २. बा० अणु०, गा० २५ । ३. शरीरमध्यप्रदेशान् कृत्वा
मु० । ४. यावदङ्गुलस्या-दि० १, दि० २, आ० ।