सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 242, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंइति विशेषणमनर्थकम्¹ । यतो मनोव्यापारो हिताहितप्राप्तिपरिहारपरीक्षा । संज्ञापि सैवेति ।
नैतद्युक्तम्, संज्ञाशब्दार्थव्यभिचारात् । संज्ञा नामेत्युच्यते । तद्वन्तः संज्ञिन इति सर्वेषामतिप्रसङ्गः ।
संज्ञा ज्ञानमिति चेत्; सर्वेषां प्राणिनां ज्ञानात्मकत्वादतिप्रसङ्गः । आहारादिविषयाभिलाषः संज्ञेति
चेत् । तुल्यम् । तस्मात्समनस्का इत्युच्यते । एवं च कृत्वा गर्भाण्डजमूर्च्छितसुषुप्त्याद्यवस्थासु
५ हिताहितपरीक्षाभावेऽपि मनःसंनिधानात्संज्ञित्वमुपपन्नं भवति ।
§ ३०९. यदि हिताहितादिविषयपरिस्पन्दः प्राणिनां मनःप्रणिधानपूर्वकः । अथाभिनव-
शरीरग्रहणं प्रत्यागूर्णस्य विशीर्णपूर्वमूर्तेर्निर्मनस्कस्य यत्कर्म तत्कृत इत्युच्यते—
विग्रहगतौ कर्मयोगः ॥२५॥
§ ३१०. विग्रहो देहः । विग्रहार्था गतिर्विग्रहगतिः । अथवा विरुद्धो ग्रहो विग्रहो व्याघातः² ।
१० कर्मादानेऽपि नोकर्मपुद्गलादाननिरोध इत्यर्थः । विग्रहेण गतिर्विग्रहगतिः । सर्वशरीरप्ररोहणबीज-
और उन्हें ही संज्ञी कहते हैं । परिशेष न्यायसे यह सिद्ध हुआ कि इनसे अतिरिक्त जितने संसारी
जीव होते हैं वे सब असंज्ञी होते हैं । शंका—सूत्रमें 'संज्ञिनः' इतना पद देनेसे ही काम चल जाता
है, अतः 'समनस्काः' यह विशेषण देना निष्फल है, क्योंकि हितकी प्राप्ति और अहितके त्यागकी
परीक्षा करनेमें मनका व्यापार होता है और यही संज्ञा है ? समाधान—यह कहना उचित नहीं,
१५ क्योंकि संज्ञा शब्दके अर्थमें व्यभिचार पाया जाता है । अर्थात् संज्ञा शब्दके अनेक अर्थ हैं । संज्ञा-
का अर्थ नाम है । यदि नामवाले जीव संज्ञी माने जायें तो सब जीवोंको संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त
होता है । संज्ञाका अर्थ यदि ज्ञान लिया जाता है तो भी सभी प्राणी ज्ञान स्वभाव होनेसे सबको
संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त होता है । यदि आहारादि विषयोंकी अभिलाषाको संज्ञा कहा जाता है तो
भी पहलेके समान दोष प्राप्त होता है । अर्थात् आहारादि विषयक अभिलाषा सबके पायी जाती
२० है इसलिए भी सबको संज्ञीपनेका प्रसंग प्राप्त होता है । चूंकि ये दोष न प्राप्त हों अतः सूत्रमें
'समनस्काः' यह पद रखा है । इससे यह लाभ है कि गर्भज, अण्डज, मूर्च्छित और सुषुप्ति आदि
अवस्थाओंमें हिताहितकी परीक्षाके न होनेपर भो मनके सम्बन्धसे संज्ञीपना बन जाता है ।
विशेषार्थ—प्रायः एकेन्द्रिय आदि प्रत्येक जीव अपने इष्ट विषयमें प्रवृत्ति करता है और
अनिष्ट विषयसे निवृत्त होता है, फिर भो मनकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की गयी है सो इसका
२५ कारण यह है कि तुलनात्मक अध्ययन, लोक-परलोकका विचार, हिताहितका विवेक आदि कार्य
ऐसे हैं जो मनके बिना नहीं हो सकते । इसीसे मनकी स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार की गयी है । यह
मन जिनके होता है वे संज्ञी होते हैं अन्य नहीं । जीवोंका संज्ञी और असंज्ञी यह भेद पंचेन्द्रिय
जीवोंमें ही पाया जाता है । अन्य एकेन्द्रियसे लेकर चतुरिन्द्रिय तकके जीव तो असंज्ञी ही होते
हैं । अर्थात् उनके मन न होनेसे उक्त प्रकारके ज्ञानसे वंचित रहते हैं ।
३० § ३०९. यदि जीवोंके हित और अहित आदि विषयके लिए क्रिया मनके निमित्तसे होती
है तो जिसने पूर्व शरीरको छोड़ दिया है और जो मनरहित है ऐसा जीव जब नूतन शरीरको
ग्रहण करनेके लिए उद्यत होता है तब उसके जो क्रिया होती है वह किस निमित्तसे होती है यही
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विग्रहगतिमें कर्मयोग होता है ॥२५॥
३५ § ३१०. विग्रहका अर्थ देह है । विग्रह अर्थात् शरीरके लिए जो गति होती है वह विग्रह-
गति है । अथवा विरुद्ध ग्रहको विग्रह कहते हैं जिसका अर्थ व्याघात है । तात्पर्य यह है कि जिस
अवस्था में कर्मके ग्रहण होनेपर भी नोकर्मरूप पुद्गलोंका ग्रहण नहीं होता वह विग्रह है और
१. -नर्थकम् । मनो- ता०, मु० । २. नोकर्म- ता०, ना० ।