सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- २।१० § २७९ ] द्वितीयोऽध्यायः ११९
“णिरयादिजहण्णादिसु जाव दु उबरिल्लया दु गेवज्जा ।
मिच्छत्तसंसिदेण दु बहुसो वि भवट्ठिदी भमिदा ॥”
§ २७९. भावपरिवर्तनमुच्यते—पञ्चेन्द्रियः संज्ञी पर्याप्तको मिथ्यादृष्टिः कश्चिज्जीवः स
सर्वजघन्यां स्वयोग्यां ज्ञानावरणप्रकृतेः स्थितिमन्तःकोटीकोटीसंज्ञिकामपद्यते । तस्य कषायाध्यव-
सायस्थानान्यसंख्येयलोकप्रमितानि षट्स्थानपतितानि तत्स्थितियोग्यानि भवन्ति । तत्र सर्वजघन्य-
कषायाध्यवसायस्थाननिमित्तान्यनु२भागाध्यवसायस्थानान्यसंख्येयलोकप्रमितानि भवन्ति । एवं सर्व-
जघन्यां स्थितिं सर्वजघन्यं च कषायाध्यवसायस्थानं सर्वजघन्यमेवानुभागबन्धस्थानमास्कन्दतस्त-
द्योग्यं सर्वजघन्यं योगस्थानं भवति । तेषामेव स्थितिकषायानुभागस्थानानां द्वितीयमसंख्येयभाग-
वृद्धियुक्तं योगस्थानं भवति । एवं च तृतीयादिषु४ चतुःस्थानपतितानि श्रेण्यसंख्येयभागप्रमितानि
योगस्थानानि भवन्ति । तथा तामेव स्थितिं तदेव कषायाध्यवसायस्थानं च प्रतिपद्यमानस्य द्वितीय-
मनुभवाध्यवसायस्थानं भवति । तस्य च योगस्थानानि पूर्ववद्वेदितव्यानि । एवं तृतीयादिष्वपि
अनुभवाध्यवसायस्थानेषु आ असंख्येयलोकपरिसमाप्तेः । एवं तामेव स्थितिमापद्यमानस्य द्वितीयं
कषायाध्यवसायस्थानं भवति । तस्याप्यनुभवाध्यवसायस्थानानि योगस्थानानि च पूर्ववद्वेदित-
·'इस जीवने मिथ्यात्वके संसर्गसे उपरिम ग्रैवेयक तक नरक आदि गतियोंकी जघन्य आदि
स्थितियोंमें उत्पन्न हो-होकर अनेक बार परिभ्रमण किया।'
§ २७९. अब भावपरिवर्तनका कथन करते हैं—पंचेन्द्रिय संज्ञी पर्याप्तक मिथ्यादृष्टि कोई
एक जीव ज्ञानावरण प्रकृतिकी सबसे जघन्य अपने योग्य अन्तःकोड़ाकोड़ी प्रमाण स्थितिको प्राप्त
होता है। उसके उस स्थितिके योग्य षट्स्थानपतित असंख्यात लोकप्रमाण कषाय अध्यवसाय
स्थान होते हैं। और सबसे जघन्य इन कषाय अध्यवसाय स्थानोंके निमित्तसे असंख्यात लोक-
प्रमाण अनुभाग अध्यवसाय स्थान होते हैं। इस प्रकार सबसे जघन्य स्थिति, सबसे जघन्य कषाय
अध्यवसाय स्थान और सबसे जघन्य अनुभाग अध्यवसाय स्थानको धारण करनेवाले इस जीवके
तद्योग्य सबसे जघन्य योगस्थान होता है। तत्पश्चात् स्थिति, कषाय अध्यवसायस्थान और अनु-
भाग अध्यवसाय स्थान वही रहते हैं किन्तु योगस्थान दूसरा हो जाता है जो असंख्यात भागवृद्धि
संयुक्त होता है। इसी प्रकार तीसरे, चौथे आदि योगस्थानोंमें समझना चाहिए। ये सब योगस्थान
चार स्थान पतित होते हैं और इनका प्रमाण श्रेणीके असंख्यातवें भाग है। तदनन्तर उसी स्थिति
और उसी कषाय अध्यवसाय स्थानको धारण करनेवाले जीवके दूसरा अनुभाग अध्यवसाय स्थान
होता है। इसके योगस्थान पहलेके समान जानना चाहिए। तात्पर्य यह है कि यहाँ भी पूर्वोक्त
तीनों बातें ध्रुव रहती हैं किन्तु योगस्थान जगश्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण होते हैं। इस प्रकार
असंख्यात लोकप्रमाण अनुभाग अध्यवसाय स्थानोंके होने तक तीसरे आदि अनुभाग अध्यवसाय
स्थानोंमें जानना चाहिए। तात्पर्य यह है कि यहाँ स्थिति और कषाय अध्यवसाय स्थान तो जघन्य
ही रहते हैं। किन्तु अनुभाग अध्यवसायस्थान क्रमसे असंख्यात लोकप्रमाण हो जाते हैं और एक-
एक अनुभाग अध्यवसाय स्थानके प्रति जगश्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण योगस्थान होते हैं।
तत्पश्चात् उसो स्थितिको प्राप्त होनेवाले जीवके दूसरा कषाय अध्यवसाय स्थान होता है। इसके
भी अनुभाग अध्यवसाय स्थान और योगस्थान पहलेके समान जानना चाहिए। अर्थात् एक-एक
कषाय अध्यवसाय स्थानके प्रति असंख्यात लोकप्रमाण अनुभाग अध्यवसाय स्थान होते हैं और
एक-एक अनुभाग अध्यवसायस्थानके प्रति जगश्रेणीके असंख्यातवें भागप्रमाण योगस्थान होते हैं।
१. बा० अ० गा० २८ । २. -नुभवाध्य-दि० । ३. नुभवस्था-मु० । ४. -दिषु योगस्थानेषु चतुः
-मु०, ता० ।